कहीं “आज़ादी” एक ख़्वाब तो नहीं ?

media-fredom-200पत्रकारों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट की वेबसाइट पर जाइये तो वहां लिखा मिलेगा “जहां पत्रकार भ्रष्टाचार, डर और गरीबी में रह रहे हैं, वहां प्रेस की आज़ादी मुमकिन नहीं”। इस बात के मायने काफी बड़े हैं, खासतौर से आज के माहौल है। आज पूरी दुनिया में पत्रकार डराए धमकाए जा रहे हैं। मंदी के कारण नौकरियों पर तलवार लटक रही है। मैनेजमेंट उन्हें हटाने की धमकी दे रहा है। बेतुकी शर्तों को मानने पर मजबूर कर रहा है। तो कहीं आतंकी हमलों में उनकी जान जा रही है। कुछ जगहों पर सरकारी गुंडे उनका क़त्ल कर रहे हैं। भ्रष्टाचार, डर और गरीबी तीनों अपने चरम पर है।

श्रीलंका में बीते तीन साल में १४ पत्रकारों की हत्या कर दी गई है। पाकिस्तान में बीते दो महीने में तीन पत्रकारों का क़त्ल हुआ है। इनमें से ज्यादातर मामलों में इंसाफ़ की उम्मीद बेमानी है। भारत में पिछले महीने एक पत्रकार की हत्या कर दी गई। उत्तर पूर्वी राज्यों और जम्मू कश्मीर में पत्रकार पहले से ही ख़ौफ़ के माहौल में काम कर रहे हैं। लेकिन बाकी जगहों पर भी उन पर दबाव कम नहीं।

ये डर पहले भी था। पहले भी कई पत्रकार हिंसा के शिकार बने। मगर इससे पत्रकारों के हौसले कभी पस्त नहीं हुए। लेकिन अब हमला उनके जिस्म पर नहीं, दिल और दिमाग पर हो रहा है। ये हमला कर रहे हैं अख़बार और मीडिया संस्थानों के मालिक। मुनाफा कमाने की होड़ में वो खुद भ्रष्टाचार कर रहे हैं और पत्रकारों को भी नैतिक स्तर पर कमजोर बना रहे हैं। ईमानदार संस्थानों की संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है। ये चलन पूरी दुनिया का है और भारत भी इससे अछूता नहीं।

बीते कुछ महीनों में बड़े संस्थानों ने सैकड़ों पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया है। इनमें कुछ ऐसे संस्थान भी हैं जो नैतिकता की सबसे अधिक दुहाई देते थे। एनडीटीवी, आईएनएक्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स से लेकर ज्यादातर बड़े संस्थानों में छंटनी हुई है। कहीं मैनेजमेंट ने इमोशनली तो कहीं जबरन कर्मचारियों की तनख्वाह काट ली है। एनडीटीवी और टाइम्स ऑफ इंडिया इसके उदाहरण हैं। कुछ जगहों पर लोगों को मंदी तक छुट्टी पर जाने को कहा जा रहा है। ये सब तब है जब दो बड़े इवेंट, चुनाव और आईपीएल सिर पर हैं और विज्ञापनों की एक बड़ी सौगात उनके हिस्से आई है।

बात यहीं तक रहती तो भी चिंता नहीं होती। लेकिन अब तो मीडिया संस्थान ख़बरों का सौदा खुलेआम करने लगे हैं। इस सौदेबाजी में पत्रकारों को जरिया और औजार बनाया जा रहा है। जो पत्रकार ऐसा करने से इनकार कर रहे हैं उन्हें ठिकाने लगाया जा रहा है। न्यूज़ चैनल आधे-आधे और एक-एक घंटे के स्पॉन्सर्ड शो चला रहे हैं। कुछ तो रात में सिर्फ यही किया करते हैं। अख़बारों में विज्ञापन और पीआर को ख़बरों के रूप में पेश किया जा रहा है। सियासत की तरह प्रेस में भी वैचारिक पतन चरम पर है। इसमें मीडिया संस्थानों के साथ उन पत्रकारों का भी हाथ है जो भौतिक कामयाबी के लिए सबकुछ दांव लगाने को तैयार हैं। आज हालात हैं कि किस मीडिया हाउस का किस विचारधारा से रिश्ता है .. ये अंदाजा लगाना किसी के लिए मुमकिन नहीं। उदारण के तौर पर एनडीटीवी जैसे संगठन ने इस साल लालकृष्ण आडवाणी को लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड दिया। जब जूरी सदस्यों की सवाल उठाए तो ये कहा गया कि ये अवार्ड उनके संपादकों की पसंद पर दिया गया। अब उन संपादकों से पूछना चाहिये कि आडवाणी को किस काम के लिए सम्मानित किया गया है… बाबरी मस्जिद गिराने के लिए, नफ़रत फैलाने के लिए, गुजरात दंगों पर आंख मूंदने के लिए… आखिर किस उपलब्धी के लिए।

ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सच्चे पत्रकार किस मुश्किल दौर में काम कर रहे हैं। भ्रष्ट मालिकों और भ्रष्ट संपादकों की जद में फंसी पत्रकारिता कितनी आज़ाद है? और सत्ता को चुनौती देने वाली ख़बरों का अकाल क्यों है?

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Posted by on Apr 11 2009. Filed under खेल. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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