पूरे देश को “पप्पू” बना रहा है मीडिया

इस चुनाव में एक खास बात रही। मतदान को लेकर नेताओं और सियासी दलों से कहीं ज्यादा उत्साह मीडिया में नज़र आया। सभी चैनलों पर और अख़बारों में दिग्गज पत्रकार देश की जनता से वोट डालने की अपील करते नज़र आए। वोटरों को रिझाने के लिए हर तरकीब आजमाते दिखे। निजी कंपनियों के साथ मिल कर कुछ मीडिया संस्थानों ने वोटरों को ललकारा तो कुछ ने वोट ना देने का फैसला करने वालों का मजाक भी उड़ाया। ऐसा लग रहा था जैसे चुनाव आयोग ने इस बार मीडिया को अपना एजेंट नियुक्त कर लिया हो। सवाल उठता है कि क्या मतदान कराना मीडिया की जिम्मेदारी है? और क्या वोट नहीं देने वालों को मूर्ख (पप्पू) बताना मीडिया का हक़ है?

इन दोनों सवालों के जवाब बहुत सीधे और सरल हैं। ये मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि वो चुनाव आयोग के एजेंट की भूमिका निभाए। उसे ये हक़ भी नहीं है कि वो वोट नहीं देने वाले भारतीय नागरिकों को पप्पू (मूर्ख) कहे। उसका काम जनता तक सही ख़बरें पहुंचाना है। जनता को सूचनाओं से इस कदर लैस करना है कि वो सही और ग़लत का फ़ैसला ले सकें। अपने अधिकार का अपनी और देश की बेहतरी के लिए इस्तेमाल कर सकें। मीडिया का काम राजनीतिक दलों और नेताओं पर नज़र रखना था। ताकि कहीं कोई लोकतंत्र के महापर्व में गड़बड़ी फैलाने की साजिश ना करे। जनता के अधिकारों में सेंध लगाने की कोशिश ना करे। मगर इस चुनाव में ऐसा कुछ नहीं हुआ। मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लिया साथ ही अपने अधिकारों की सीमारेखा का उल्लंघन भी किया।

पूरे चुनाव के दौरान सभी बड़े चैनलों में मोटे-मोटे शब्दों में ये लिखा हुआ देखने को मिला कि “मत बनिये पप्पू, वोट दीजिये” या फिर “पप्पू फिर फेल हो गया” या “पप्पू पास हुआ, मगर कम नंबर से”. लेकिन किसी चैनल ने उतनी ही शिद्दत से चुनाव सुधारों के मुद्दे को नहीं उठाया। ये नहीं कहा कि हमारी चुनावी व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधारों का वक़्त आ गया है। वोटरों को वो तमाम अधिकार चाहिए, जिससे नेताओं की लगाम उनके हाथ में रहे। धांधली करने पर या फिर विश्वासघात करने पर नेता को सबक सिखाने के लिए उन्हें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करना पड़े। वोटरों को तमाम अधिकारों से लैस कराने के लिए बुनियादी सवाल उठाने जरूरी थे। सियासी दलों से पूछना था कि चुनाव सुधारों को वो क्यों टाल रहे हैं? लेकिन मीडिया नेताओं की नीयत पर सवाल उठाने की जगह वोटरों को ही पप्पू साबित करने में जुटा रहा।

मीडिया ने ये सब किया तो आखिर क्यों? इसकी दो वजहें हैं। अनिश्चितता का भय और सामंती सोच। आज मीडिया बीते कई दशकों में सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। कई बड़े संस्थान घाटे में हैं। बड़े पैमाने पर छंटनी हो रही है। हालात इतने बुरे हैं कि मीडिया संस्थान नेताओं के तलवे चाट रहे हैं। ख़बरों का सौदा कर रहे हैं। ईमान बेच रहे हैं। इन बुरे हालात में सबकी नज़रें चुनाव के नतीजों पर टिकी हैं। अगर सरकार कांग्रेस या बीजेपी की अगुवाई में बनी, तो कई मीडिया संस्थानों का काम भी बन जाएगा। चुनाव से ठीक पहले ही यूपीए सरकार ने विज्ञापनों का बजट बढ़ाकर मीडिया कंपनियों की मदद की है। सत्ता फिर से मनमोहन सिंह के हाथ लगी तो ये कंपनियां बेलआउट पैकेज के लिए दबाव बनाएंगी। इन्हें उम्मीद है कि आर्थिक उदारीकरण के प्रणेता और आज के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनकी मांग को मान लेंगे।

कांग्रेस के बाद इन मीडिया संस्थानों की दूसरी पसंद बीजेपी है। इस पसंद का सबसे बड़ा आधार ये है कि कांग्रेस की तरह बीजेपी भी आर्थिक उदारीकरण में यकीन रखती है। यहां तक कि स्वयंसेवक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कई सरकारी कंपनियां औने-पौने दामों पर बेच दी गईं। इसके अलावा बीजेपी का मीडिया से काफी गहरा रिश्ता रहा है। कई संपादक बीजेपी के सांसद हैं। बीजेपी चाहेगी कि ज्यादा से ज्यादा मीडिया कंपनियों को एहसान के बोझ तले दबा कर नैतिक तौर पर भ्रष्ट किया जा सके।

इससे मीडिया संस्थानों को एक नुकसान भी होगा। उनकी आज़ादी छिन जाएगी। सरकारी मदद लेने वाले अख़बार और न्यूज़ चैनल सरकार के किसी ग़लत फैसले को चुनौती देने का साहस नहीं कर सकेंगे। लेकिन आज के दौर में ये साहस कर भी कौन रहा है? अभी मीडिया संस्थान कांग्रेस और बीजेपी दोनों को साधने में जुटे हैं। अनिश्चितता का भय इतना अधिक है कि लम्बे समय से बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति की आलोचना करने वाले एक बड़े न्यूज़ चैनल ने आडवाणी को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। वो भी जूरी को भरोसे में लिये बगैर।

अब बात मीडिया की सामाजिक सोच की। आज ज्यादातर अख़बारों और न्यूज़ चैनलों में ऊंचे पदों पर बैठे पत्रकार ऊंची जाति से हैं। इनकी सोच सामंती है। यही सोच इन्हें व्यवस्था के तमाम अंगों का पिछलग्गू बना देती है। साथ ही व्यवस्था में किसी भी तरह के बुनियादी बदलाव का विरोधी भी। इनमें से ज्यादातर तीसरे और चौथे मोर्चे के घटकों को हिकारत की नज़र से देखते हैं। लेकिन ये जानते हैं कि उन दलों का खुलकर विरोध करने से नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए वो खुल कर छोटे दलों का विरोध करने की बजाय, दोनों बड़े दलों के समर्थन का रास्ता चुनते हैं। मतदान देने के लिए प्रेरित करने की मुहिम भी उसी समर्थन का हिस्सा है। उनकी कोशिश है कि वोटिंग के दिन घरों में दुबक कर बैठने वाले मध्य वर्ग को ज्यादा से ज्यादा संख्या में मतदान के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इससे सबसे अधिक फायदा कांग्रेस और बीजेपी को ही होगा। कुल मिला कर, आज अगर ये कहा जाए कि मीडिया अपने स्वार्थ के लिए पूरे देश को “पप्पू” बना रहा है तो ग़लत नहीं होगा।

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Posted by on May 11 2009. Filed under टेलीविजन, थियेटर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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