"हमारे जीवन का एक टुकड़ा मर गया है"
((हम सब जानते हैं ज़िंदगी अनिश्चित है, बावजूद इसके कोई भी असमय जाता है तो बहुत ठेस लगती है। बहुत दुख होता है। फिर शैलेंद्र तो अपने थे। विचारधाराओं के तमाम टकराव के बावजूद वो अपने थे। अभी उनकी उम्र जाने की तो नहीं थी। अभी तो उन्हें हम सबके साथ एक लंबा सफ़र तय करना था। हमारे बीच से उनका यूं अचानक चले जाना बहुत अखर रहा है। ज़िंदगी की ये अनिश्चितता डरा रही है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के मुताबिक शैलेंद्र का जाना कुछ ऐसा है जैसे हमारे भीतर एक टुकड़ा मर गया है। खालीपन का एहसास भर गया है। ये शब्द भले ही दिलीप जी के हैं मगर ये हम सब महसूस कर रहे हैं।))
शैलेंद्र सिंह का जाना ऐसे समय में एक भावुक इंसान का गुजर जाना है जब आपाधापी बहुत ज्यादा है। ठहरकर सोचने वाले इंसानों की जब दुनिया में और खासकर हमारे पेशे में कमी हो, तो शैलेंद्र का गुजर जाना ज्यादा ही तकलीफदेह है क्योंकि वो ठहरकर सोचना चाहते थे। सभी कहते हैं कि शैलेंद्र सिंह हमेशा खोए-खोए से रहते थे। उनकी उपस्थिति इतनी कम इंपोजिंग और कम इंटिमिडेटिंग होती थी कि कई बार पता भी नहीं चलता था कि वो आसपास हैं। आज तक और स्टार न्यूज के दफ्तर में मैने कई बार उन्हें किसी कोने में बैठे काम करते या यूं ही बैठे देखा। जिसे चैनल की मुख्यधारा कहते हैं, वो उन्हें रास नहीं आती थी। वो इसमें रमना चाहते भी नहीं थे।
भाई शैलेंद्र के साथ अपनी तीन संस्थानों में नौकरियां रहीं। इन तीन नौकरियों के बीच बहुत कुछ बदल गया। बदलाव का शिकार मैं खुद भी बना। लेकिन इस बीच शैंलेंद्र उन चंद इंसानों में रहे, जिनमें न्यूनतम बदलाव आए। शैलेंद्र को जानने वाले जानते हैं कि वो कभी भी पत्रकारिता नहीं करना चाहते थे। वो पत्रकारिता की दुनिया में एक भावुक इंसान, एक कलाकर्मी थे, एक शायर और एक मिसफिट पत्रकार थे। आजतक में पहली कुछ मुलाकातों में ही उन्होंने अपना इरादा साफ बता दिया था- मैं तो मुंबई का होना चाहता हूं। मुंबई में स्टार न्यूज के दिनों में भी वो बॉलीवुड में अपने लिए संभावनाएं तलाशते दिखे। महेश भट्ट समेत कई लोगों से वो मिलते भी रहते थे। इससे पहले वो कौन बनेगा करोड़पति के लिए काम कर चुके थे। लेकिन वो प्रोफेशन के मामले में वो अपने मन की जिंदगी भर कर नहीं पाए। नौकरियां बदलकर वो अपने लिए सुकून तलाशने की कोशिश करते रहे। लेकिन ये दुष्चक्र से निकलने का नहीं, उसमें और गहरे धंसने का रास्ता साबित हुआ।
टीवी न्यूज चैनलों की तेज बनने की होड़ और टीआरपी की खून पीने वाली जानलेवा दौड़ शैलेंद्र के मिजाज से मेल नहीं खाती थी। ये बात और है कि वो आखिर तक न्यूज चैनलों के ही बने रहे और इस विधा को भी ढंग से साधकर आगे बढ़ते रहे। हालांकि जब भी उनपर बेचैनी हावी होती थी, तो वो चैनल के दफ्तर से बाहर सड़क पर निकल आते थे। मेरे मन में उनकी जो छवि ज्यादा प्रमुखता से बसी है, वो काम में जुटे सिर झुकाए पत्रकार की नहीं, बल्कि सड़क पर चहलकदमी करते एक बेचैन इंसान की छवि है। एक ऐसे इंसान की छवि जो लगभग एक दशक ये सोचता रहा कि जो कर रहा हूं, वो निरर्थक है और यहां से आगे बढ़ जाना है।
ये एक बड़ा सवाल है कि किसी और ही धुन में रमने वाला ये भावुक इंसान न्यूज चैनलों के मारक वातावरण में क्यों बना रहा। डांट-डपट, तीखी तकरार, चैनलों के बीच और उससे कहीं ज्यादा चैनल में काम करने वालों के बीच निर्मम और गला काट होड़ में आप क्यों टिके रहे शैलेंद्र। आप तो खुद को कभी भी खिलाड़ी टाइप नहीं मानते थे। आप खिलाड़ी थे भी नहीं। आप तो लगभग 10 साल पहले ही ये जान चुके थे कि ये आपकी दुनिया नहीं है। हालांकि इस आपाधापी के बीच समय चुराकर शैलेंद्र अपने रचनाकर्म को भी अंजाम देते रहे। उनकी किताब कुछ छूट गया है और जानता हूं जिंदगी से शैलेंद्र को बेहतर तरीके से जाना जा सकता है। शैलेंद्र जानते थे कि वो दरअसल इसी तरह के काम के लिए बने हैं। लेकिन जिंदगी भर ज्यादातर समय वो ऐसा काम करते रहे, जो वो एक पल भी नहीं करना चाहते थे। ये अंतर्विरोध उन्हें परेशान करता था। इसे वो अपने मित्रों से शेयर भी करते थे। ये जानकर आश्चर्य होता है कि नून-तेल के चक्कर में एक भावुक कलाकार ने अपने 15 से ज्यादा साल बेमन से बिता दिए (क्या ये हममें में कई लोगों की अपनी कहानी नहीं है)।
ये दरअसल हमारे मीडियम में काम करने वाले हजारों लोगों की कहानी है, जिनमें शैलेंद्र जैसा एक भावुक इंसान या उसका कुछ हिस्सा बसता है। इसलिए शैलेंद्र की मौत एक सामूहिक दुख का कारण है। इस दुख में हम सब अपना दुख तलाश सकते हैं। शैलेंद्र के साथ दरअसल उनके जानने वाले मुझ जैसे लोगों के जीवन का एक टुकड़ा मर गया है। मेरे लिए ये निजी दुख का क्षण है। शैलेंद्र भाई, आपकी स्मृति आपकी रचनाओं की शक्ल में हमारे बीच रहेगी।
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