शैलेंद्र जाते-जाते हमें सोचने को मजबूर कर गए हैं
((पत्रकार शैलेंद्र के निधन से आहत एक शख़्स ने शुक्रवार शाम जनतंत्र के ई-मेल पर एक ख़त भेजा। ख़त भेजने वाले को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। मैंने फोन करके पूछा कि क्या ये ख़त जनतंत्र पर छाप दूं। उन्होंने मना कर दिया। कहा कि “ऐसा करके आप मेरा तनाव बढ़ा देंगे।” फिर मैंने उनसे पूछा कि क्या नाम जाहिर नहीं करें तो आप इसे छापने देंगे… “उन्होंने कहा कि सोचने का वक़्त दीजिये।” आज शाम मैंने उन्हें दोबारा फोन किया तो उन्होंने कहा कि “अगर किसी भी सूरत में मेरा नाम जाहिर नहीं हो, तो आप इसे छाप सकते हैं।” मैंने उनसे वादा किया और उनकी पहचान छिपाने के लिए ख़त को थोड़ा संपादित किया। अब मैं ये ख़त आपके सामने रख रहा हूं। आप सोचिये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिये। अपने-अपने दिल पर हाथ रख कर कहिये कि क्या ये ग़लत है?))
शुक्रवार, 19 जून 2009, सुबह 10 बज कर 30 मिनट …. दिल्ली का निगम बोध घाट… बड़ी संख्या में पत्रकार आईबीएन 7 के सीनियर एडिटर शैलेंद्र सिंह को अंतिम विदाई देने के लिए पहुंचे थे… वहां मौजूद सभी के चेहरों पर मातम की लकीरें पढ़ी जा सकती थीं… खुद को सांत्वना देने के लिए वहां मौजूद हर शख़्स यही कह रहा था कि शैलेंद्र को मौत खींच कर ले गई। वरना कोई दूसरी वजह नहीं थी कि वो रात डेढ़ बजे घर से दूर नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे पर लॉन्ग ड्राइव के लिए जाते।
मीडिया के साथियों से अपील
देश, दुनिया और समाज के बारे में तो हम हर रोज बहस करते हैं। एक बहस अपने बारे में भी होनी चाहिये। उस माहौल के बारे में जिसमें हम जी रहे हैं। इसलिए आज मीडिया के साथियों से जनतंत्र एक अपील कर रहा है। आइये कुछ पलों के लिए ही सही… थोड़ा ठहर कर हम अपने बारे में सोचें।…. ((READ MORE))
लॉन्ग ड्राइव… यही वो शब्द थे जो उन्होंने दफ़्तर से निकलते वक़्त साथियों से कहे थे। उनके साथी बताते हैं कि शैलेंद्र कभी-कभार लॉन्ग ड्राइव के लिए जाते थे। उन्हें इससे सुकून मिलता था। उस रात भी दफ़्तर से निकलने के बाद वो अपने एक साथी को उनके घर छोड़ने वसुंधरा गए और उसके बाद नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस की तरफ गाड़ी मोड़ दी। तब उन्हें अंदाजा नहीं रहा होगा उस रास्ते पर मौत ने जाल बिछा रखा है। ये अंदाजा किसी को भी नहीं होता है। कब और कहां… किस बहाने से मृत्यु खींच ले… ये कोई नहीं जानता।
शैलेंद्र तो चले गए … लेकिन अपने पीछे एक बड़ा सवाल छोड़ गए हैं। ये वो सवाल है जो हर वक़्त हमारी आंखों के सामने मंडराता रहता है, लेकिन हम सब उससे आंख चुराते हैं। उसे झुठलाने की कोशिश करते हैं और कहते हैं कि हमारी आंखों से तुम ओझल हो जाओ… हमारा पीछा छोड़ दो। वो सवाल है कि आखिर क्यों शैलेंद्र दिन भर की मेहनत के बाद रात डेढ़ बजे सीधे घर जाने से कतरा रहे थे? वो थोड़ी देर के लिए सही कहीं और क्यों जाना चाहते थे? यूं ही सड़कों पर इधर-उधर क्यों घूमना चाहते थे? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो तनाव में थे और घर जा कर बीवी-बच्चों पर तनाव जाहिर करने की जगह उसे दूर करने का बहाना ढूंढ रहे थे?
ये सवाल बहुत से लोगों को पसंद नहीं आएगा… बहुत से ऐसे भी होंगे जो इसे सीधे खारिज कर देंगे… वो कह देंगे कि ये बिल्कुल बेमानी है… लेकिन ऐसा कहने वाले भी जानते हैं कि ये सवाल उतना बेमानी भी नहीं। आज टेलीविजन न्यूज़ की दुनिया का ये बहुत बड़ा सच है… यहां काम करने वाले ज़्यादातर पत्रकार भारी तनाव से जूझ रहे हैं। काम को लेकर तनाव के साथ दफ़्तर का तनाव अलग है… ये वो तनाव है जो थोपा जाता है। कोई सनकी… झूठी सत्ता के नशे में चूर… आकंठ अहंकार में डूबा हुआ कोई शख्स ये तनाव दूसरों पर थोपता है। हम इसे काम का तनाव हरगिज नहीं कह सकते। सीनियर्स की बद्तमीजी… चीख चिल्लाहट और गाली गलौज न्यूज़रूम का आम हिस्सा है। मैंने खुद देखा है फ्लोर पर लोगों को एक-दूसरे पर चीखते हुए… मैंने देखा है फोन पर किसी को गाली देते हुए… रात में नशे की हालत में जूनियर कर्मचारियों को धमकाते हुए और कहते हुए कि साले मेरा कहा नहीं मानोगे तो नौकरी से निकाल बाहर करुंगा। मैं ऐसे कई समझदार, संवेदनशील और खुद्दार पत्रकारों को जानता हूं जिन्हें हाशिये पर ढकेल दिया गया। इसके लिए उनकी काबिलियत से इतर कोई और ब्रांडिंग की गई। जैसे अरे! उसे काम तो आता है मगर बहुत ढीला है… अरे! वो तो जूनियर्स से काम ले ही नहीं पाता। आखिर ये क्या है? क्या इसे आप काम का तनाव कहेंगे?
शैलेंद्र का सच क्या था? ये मैं दावे से नहीं कह सकता, लेकिन अंदाजा लगा सकता हूं। जब कोई पत्रकार उनके बारे में लिखता है कि वो टीवी के लिए फिट नहीं थी तो ये अकारण नहीं होगा… जब एक और पत्रकार उनके बारे में लिखता है कि वो टेलीविजन न्यूज़ की दुनिया से बाहर निकलना चाहते थे तो ये भी अकारण नहीं होगा। सिर्फ शैलेंद्र ही नहीं संवेदनशील पत्रकारों की एक लंबी फेहरिस्त है जो टीवी में फिट नहीं हैं और वो इससे दूर भागना चाहते हैं … बहुत दूर।
कुछ दिन पहले किसी से बात हो रही थी तो उन्होंने कहा कि टीवी के लड़के-लड़कियों को कोई अक्ल ही नहीं? उन्हें कुछ आता-जाता नहीं… बस स्क्रीन पर पटर-पटर बोलते रहते हैं? तब मैंने कहा था कि ऐसा नहीं है… मैं ऐसे बीसियों पत्रकारों को जानता हूं… जो अपने काम में बेहतरीन हैं… जो उच्च कोटि के रिपोर्टर हैं… तेरतर्रार संपादक हैं… जिनमें संवेदनाओं की कोई कमी नहीं… जो अन्याय और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना चाहते हैं… रीयल स्टोरीज़ पर काम करना चाहते हैं… जिन्हें किसी के ख़िलाफ़ लिखने से डर नहीं लगता… लेकिन इस नौकरी में मजबूरियां इतनी अधिक हैं कि वो ऐसा कुछ नहीं कर पाते… और घर की मजबूरियां इतनी कि उसे छोड़ नहीं पाते। इस दोतरफा दबाव में उनका दम घुटता है… रोजी-रोटी के लिए वो एक मशीन की तरह काम किये जाते हैं उनके सपने हर रोज दम तोड़ रहे हैं… जो जितना संवेदनशील है… वो उतना ही हताश और निराश। एक गहरा अंधेरा है… इतना गहरा कि किसी छोर से रोशनी नज़र नहीं आ रही।
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ये तो बहुत आम बात है की कारपोरेट सेक्टर में जुनियर का इस्तेमाल करना…तनाव, चिडचिडापन, ये सब काम के बोझ की वजह से होता है…मैं आपकी बात से सहमत हूं
मरहूम शैलेन्द्र के बहाने हमारे अनाम भाई ने जो सवाल उठाये हैं उसका जवाब ढूंढा जाना चाहिये वरना पता नहीं कब किसकी लॉन्ग ड्राइव मौत के दरवाजे पर खत्म हो।
शैलेंद्र जी का जाना वाकई इन सवालों की ओर नज़र दौड़ाने पर मजबूर करता है। लेकिन यकीन मानिए हम नज़रे टिकाकर बहुत देर तक नहीं रह पाएंगे। क्योंकि टीवी से जुड़ा हर पत्रकार आज तनाव के सागर में गोते लगा रहा है। लेकिन क्या किया जाए। अब तो यही प्रार्थना कर सकता हूं कि ईश्वर शैलेंद्र जी की आत्मा को शांति दे।
अख़बार या खबरों की दुनिया का ये सबसे बड़ा सच है।अधिकांश लोग ज़ल्दी घर नही जाते या जाना नही चाहते।चाहे लांग ड्राईव के बहाने या लार्ज पैग के बहाने वे उस अंजाने तनाव से भागना चाह्ते हैं,लेकिन भाग नही पाते।और जो भागना चाहते भी हैं उन्हे सुबह होते ही फ़िर उसी कोल्हू मे जुत जाना पड़ता है और फ़िर रात होती है,फ़िर सुबह होती है वो घूमता ही रह जाता है और भाग भी नही पाता।काम कभी भी अच्छे पत्रकारों के लिये तनाव का कारण नही होता,तनाव का कारण तो दफ़्तर के दूसरे गणित का होता है जिसका हल ढूंढे नही मिलता।शैलेंद्र जी को श्रद्धांजलि ही दे सकता हूं मै।अनाम भाई को जो निश्चित ही एक अच्छे और सच्चे पत्रकार होंगे,को भी मै सलाम करता हूं।
शैलेंद्र जी का यूं अचानक चले जाना बहुत दुखदायी तो है, सोचने पर भी मजबूर करता है कि आखिर टीवी पत्रकारिता किस ओर बढ़ रही है। अगर इस पत्रकारिता का अंत शैलेंद्र जी की ही तरह है तो टीवी के चंद तथाकथित बुद्धिजीवियों को अपनी कार्यशैली के बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि जिस तनाव ने शैलेंद्र को छीना, वो कल उन्हें, हमें या किसी को भी लील सकता है। वैसे शैलेंद्र की मौत के बाद हालात बदलेंगे या सुधरेंगे इस बारे में सोचना भी गलत है। क्योंकि मालिकों के लिए शैलेंद्र एक मजदूर थे और मजदूर की जान जाने से मालिक को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वैसे भी भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में कई बेरोजगार शैलेंद्र मालिकों के दरवाज़े के बाहर खड़े हैं, धीरे-धीरे आने वाली मौत के इंतज़ार में…
क्या कहूं समरेंद्र, तुम तो बेहतर ही जानते हो कि कब कहां और क्या-क्या होता है। सच कहूं तो पहले में इस पढ़ने से कतराता रहा और फिर सोचा कि चलो बहुत दिन हो गए तुम से बात कर लूं। पर फिर लगा कि हमारे काम में अधिकतर लोग सच्चाई से कतराते हैं जैसे कि हम और तुम। कुछ इस दलदल में इतने बुरे तरीके से फंसे हुए रहते हैं कि वो चाह कर के भी नहीं निकल पाते और फिर देर होती जाती है।
ये सच है कि हां 90 फीसदी से ज्यादा लोग इस सच्चाई को मानने से कतराते हैं और हां साथ ही ये भी कहना चाहूंगा कि कतराते रहेंगे ही। जैसे अनिल जी ने कहा हम अधिकतर घर जाने से पहले कहीं किसी समूह में बैठकर अपने ग़म से निजात पाने की कोशिश करते हैं चाहे वो बक-बक करके हो या फिर दो-चार पैग लगाकर। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि हम नहीं चाहते कि ऑफिस की उस कोफ्त को साथ लेकर घर जाएं जिसे कि हम पूरे टाइम ऑफिस में झेलते हैं। हम नहीं चाहते कि जिस तरह का व्यवहार हमारे साथ होता है या फिर हम करते हैं उसे अपने घर में किसी के साथ करें, हम अपनों पर वो व्यवहार नहीं करना चाहेंगे।
सच कह रहा हूं समरेंद्र, हम में से बहुत ऐसे भी हैं जो यदि दो चार पैग ना लगाएं तो इतने तनाव में आ जाएंगे कि ऑफिस का गुस्सा घर में निकाल बैठेंगे और ये हाल हर दिन का होगा। हां, कह सकते हो कि हमलोग कमजोर हैं, शायद सभी कमजोर होते हैं पर हम ज्यादा है।