दैनिक भास्कर की चोरी, ऊपर से सीनाजोरी

आज दैनिक भास्कर के  राष्ट्रीय संस्करण में भी अभिलाष खांडेकर के महान विचार छप गए। मध्य प्रदेश के एडिशन में की गई उनकी विशेष टिप्पणी (भोपाल को बिहार होने से बचाएं) को राष्ट्रीय संस्करण में हू-ब-हू छाप दिया गया है। कहीं कोई संशोधन नहीं। कहीं कोई भूल सुधार नहीं। अख़बार में पृष्ठ संख्या सात पर आप खांडेकर की ये विशेष टिप्पणी पढ़ सकते हैं।

अभिलाष खांडेकर के संकीर्ण नज़रिये पर सवाल उठने के बाद से दैनिक भास्कर का रवैया बेहद हैरान करने वाला है। कल वेब एडिशन के संपादक राजेंद्र तिवारी ने पाठकों की भावनाओं का खयाल रखते हुए खांडेकर के लेख पर खेद जताया और आपत्तिजनक पंक्तियों को हटा दिया। मगर खेद जताने का तरीका बड़ा अजीब था। कायदे से होना तो ये चाहिये था कि लेख अभिलाष खांडेकर ने लिखा है तो माफी भी वही मांगते। अगर अभिलाष खांडेकर में अहंकार इतना अधिक है कि उन्हें अपनी ग़लत बात को वापस लेने में शर्म आ रही हो तो संस्था में उनका कोई वरिष्ठ माफी मांगता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वेब संस्करण के संपादक राजेंद्र तिवारी ने मामले को टालने के अंदाज में पाटकों की प्रतिक्रिया के लिए दी गई जगह पर खेद भरी टिप्पणी चिपका दी। अब इसे आप क्या कहियेगा?

इस पूरे प्रकरण में कुछ लोग बड़े बेतुके तर्क दे रहे हैं। ऐसे लोगों की एक दलील तो ये है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को जाति, धर्म, प्रांत जैसी सीमाओं में नहीं बांधना चाहिये। अरे भई, अभिव्यक्ति की आज़ादी में ये कहीं नहीं है कि आप किसी दूसरे की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करें। सोचिये अगर ऐसा हो जाए तो अंजाम कितना बुरा होगा। तब तो हर तरफ अराजकता होगी और नफ़रत की सियासत करने वाले चांदी काटेंगे। एक धर्म के कट्टरपंथी दूसरे धर्म को गाली देंगे। हिंसा भड़केगी और कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं होगी। इसलिए अभिव्यक्ति की आज़ादी ही नहीं, किसी भी तरह की आज़ादी के साथ जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों तत्व जुड़े हुए हैं। वैसे आपको ये भी बता दें कि सत्ता की तानाशाही के ख़िलाफ़ जब आवाज़ उठाने की बात होती है तो यही लोग ये तर्क देने लगते हैं कि राष्ट्र के ख़िलाफ़ कुछ लिखने पर राजद्रोह का मुक़दमा चलाना चाहिये। मतलब जिन मुद्दों पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का सही इस्तेमाल होना चाहिये वहां पर ये भोकुस दलाल लोग उसका गला घोंटने लगते हैं और जब इस आज़ादी के ग़लत इस्तेमाल का विरोध करने की बात हो तो उसके समर्थन में नारा बुलंद करने लगते हैं।

अगर अभिलाष खांडेकर को भोपाल में बढ़ते अपराध पर कुछ लिखना था तो इसके लिए उन्हें बिहार को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं थी। वो चाहते तो भोपाल के ही लोगों से बात करके बहुत कुछ लिख सकते थे। इसलिए ये मुद्दा संकीर्ण और बीमार सोच का मुद्दा है। इस सोच से अभिलाष खांडेकर जैसे लोग निजी फायदा भले ही उठा लें, पत्रकारिता को बहुत बड़ी क्षति पहुंचा देते हैं। इसलिए ऐसे लेख और लेखकों का जितना हो सके, उतना विरोध करना चाहिये।

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Posted by on Jun 20 2009. Filed under रागरंग. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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