“मुझे कांवड़ियों से डर लगता है”

दिल्ली और गाजियाबाद को जोड़नेवाले एनएच-24 का चौराहा। दो तरफ से लंबा ट्रैफिक जाम है। कांवड़ियों से भरे ट्रक निकल रहे हैं। ट्रैफिक मैनेजमेंट में दो-तीन सफेद वर्दीवाले हैं और दस बारह भगवा टी-शर्ट और शॉर्ट पहने, हाथ में लाठी-डंडे लिए (किसी-किसी किसी के हाथ में बेसबॉल का बैट और हॉकी स्टिक भी है) कांवड़िए हैं। लाल बत्ती हरी होती है, फिर लाल हो जाती है लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ सकता। गाना फुल वॉल्यूम पर बज रहा है – ‘ हे गनेस के बापू, मेरे पै भंग पिसवा देना…’

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में ये एक खास मौसम है। सावन लग चुका है। कांवड़िए के जत्थे उत्तराखंड की ओर निकल चुके हैं। गंगाजल लाना है, अपने शिवालयों में भोले शंकर का जलाभिषेक करना है। सड़कों के किनारे शिविर लगे हुए हैं। यहां भगवाधारियों के बीच कुछ नेता, ठेकेदार, कारोबारी, प्रायोजक किस्म के लोग बैठे हैं। आम आने-जानेवालों को हांकने-खदेड़ने के लिए पुलिस है। शिविरों के द्वार पर भगवान शंकर का पोर्टेबल सा मंदिर, अंदर झांकिए तो तखतों पर बिछे गद्दे, डिस्पोजेबल गिलास, चाय-कॉफी की मशीनें (आज हिंदुस्तान में एक स्टोरी पढ़ी- लंच में पनीर और डिनर में खीर- बोल बम) लगी हुई हैं। मैं बहक रहा हूं…कांवड़ियों को दी जानेवाली भोजन, जल, फल और रात्रि विश्राम की सुविधाएं मेरा मुद्दा नहीं है। क्योंकि ये हमारे समय की भक्ति का खास चेहरा है जहां सब-कुछ आराम के साथ करने की कोशिश की जाती है।

मेरे घर से दफ्तर के रास्ते में हिंडन नदी के किनारे किनारे सड़क बन गई है। मेरे लिए ये शॉर्ट कट है। तकरीबन 15 मिनट बचते हैं, गाजीपुर मोड़ के ट्रैफिक से भी बचता हूं। लेकिन इन दिनों इस रास्ते में तीन से चार शिविर लगे हुए हैं। ट्रैफिक का हाल बुरा है। साढ़े बारह बजे लड़कियों का स्कूल छूटा है। दस बारह लड़के जो फिलहाल कांवड़िए हैं सड़क के किनारे खड़े होकर लड़कियों को उसी नजर से देख रहे हैं जिसे बुरी नजर कहा जाता है। हंस रहे हैं, टिप्पणियां कर रहे हैं और पोस्ट पर जमे हुए हैं। ये भक्त हैं। भक्ति करने निकले हैं। आप कुछ नहीं कर सकते। हमारे देश में धर्म और भक्ति के नाम पर अराजकता फैलाना शायद सबसे आसान है। मैं निकल जाता हूं, दफ्तर के लिए देर हो रही है।

गिरिजेश, वरिष्ठ पत्रकार

गिरिजेश, वरिष्ठ पत्रकार

कांवड़ यात्रा के दस बारह दिनों के दौरान हर साल खबरें आती हैं कि ज़रा सी बात हुई और कांवड़ियों ने उपद्रव कर दिया। शिव के ये भक्त पौराणिक कथाओं के शिवगणों की तरह हिंसक हो गए। इन्हें पुलिस भी हाथ नहीं लगाती क्योंकि ये भक्त लाखों में होते हैं और मामला आस्था से जुड़ा है। इसलिए, मुझे कांवड़ियों से डर लगता है। पता नहीं मेरा डर कितना जायज़ है। बहरहाल, कहीं खबर पढ़ी कि कांवड़िए आतंकवादियों के निशाने पर हैं। ऊपरवाला उन्हें नज़्र-ए-बद से बचाए। बोल बम।

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Posted by on Jul 18 2009. Filed under रागरंग. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

No Comment for ““मुझे कांवड़ियों से डर लगता है””

  1. chandra prakash

    उत्तम है सर… कांवड़ियों के लिए मेरी भावनाओं को भी शब्द देने के लिए साधुवाद। रात में 12 बजे आधे घंटे तक कालिंदी कुंज की बीच सड़क पर कैलाश खेर के बगड़ बम बम बमलहरी का लाइव मंचन देखकर आ रहा हूं।

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