सिर्फ़ गायिका नहीं… एक वीरांगना थीं गंगूबाई
गंगूबाई नहीं रहीं! कौन गंगूबाई? गंगूबाई हंगल। अच्छा, ये शास्त्रीय गायिका थीं ना? हां। …नहीं। गंगूबाई का परिचय सिर्फ इतना नहीं है। गंगूबाई भारतीय संगीत के इतिहास की एक क्रांतिकारी, एक वीरांगना का नाम है। ज़रा सोचिए, 1913 में पैदा हुई थीं। लड़की थीं। कर्नाटक के कट्टर जातिवादी समाज में एक देवदासी परिवार में जन्म। जिस दौर में शास्त्रीय गायकी में मर्दों का दबदबा था, औरतों पर हज़ार तरह के पहरे थे, उस दौर में उन्होने गाना गाने की हिम्मत की।
मीराबाई की तरह लगन लगी और संगीत का वरण करते हुए बाकी सारी मुश्किलों को ठेंगा दिखाने की ठान ली। शुरू में मां से ही सुरों का ज्ञान लिया। फिर किराना घराने के गुरु सवाई गंधर्व मिले और 13 साल की उम्र से गाना शुरू हो गया। 97 साल की होकर गईं, और उम्र के 94 वें साल तक गाती रहीं। यानी तकरीबन सत्तर साल संगीत को समर्पित। जाने से कुछ साल एलान कर गईं- मेरे घर को शास्त्रीय संगीत का म्यूजियम बनाया जाएगा।
फिल्ममेकर विजया मुले से बातचीत में गंगूबाई ने एक बार कहा था’ पुरुष संगीतकार मुसलमान होता है तो उस्ताद कहलाने लगता है, हिंदू होता है तो पंडित हो जाता है, लेकिन केसरबाई, हीराबाई और मोगूबाई जैसी गायिकाएं बाई ही रह जाती हैं।’ गंगूबाई भी बाई ही रहीं, वो विदुषी, बेग़म या डॉक्टर नहीं कहलाईं। हीराबाई बड़ोदेकर के बाद किराना घराने की यही एक बाई बची थीं। ‘बाई’ शब्द मुझे लगता है एक बहुत पुराने वक्त की हमारे वक्त में मौजूदगी का नाम है। अब हमारे बीच शायद ऐसी कोई बाई नहीं रही।
गंगूबाई की आवाज़ बड़ी दमदार, बड़ी मर्दाना थी। थी क्यों, है। पहली बार मियां मल्हार में उनका ‘बोले रे पपीहरा’ सुना था तो पहली बात मन में यही आई- ये महिला की आवाज़ है!!? भीमसेन जोशी जैसी ऊर्जा (सवाई गंधर्व के ही शिष्य पंडित भीमसेन जोशी गंगूबाई से उम्र में काफी छोटे हैं, जोशी जी का जन्म 1922 बताया जाता है), कुमार गंधर्व की तरह आवाज़ को फेंकते सुरों का लगाव, ‘आय-आय’ करते हुए ताल के साथ लयकरी, और किसी अखाड़ेबाज़ गवैये की तरह पूरे दम-खम से सम पर आना।

गिरिजेश, वरिष्ठ पत्रकार
साथी गिरिजेश के कहने पर हमने आपके लिए गंगूबाई हंगल की एक वीडियो क्लिप खोज ली है। यू ट्यूब पर उन्हें गाते हुए आप सुन सकते हैं। उसके लिए आपको यहां क्लिक करना होगा। ये वीडियो क्लिप लंबी है और इसे डाउनलोड करने में चंद मिनट लग सकते हैं। इसलिए थोड़ा धैर्य रखिएगा। – जनतंत्र डेस्क
उनकी जीवन के बारे में और जानकारी के लिए यहां क्लिक करें।
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इस बात का गम नहीं कि गंगूबाई सशरीर अब हमारे बीच नहीं रहीं। संतोष इस बात का है कि जब तक वो इस शरीर में रही दुनावी जद्दोजहद को पार पाते हुये उसे मुकम्मल पहचान दिया। उनके लिए आपके वीरांगना वाले विशेषण से पूरी तरह इत्तेफाक रहता हूं।
achcha aalekh hai. kam log jante hein itna unke baare mein. media ki aankhoon per to ab bazaar ki hi patti hi… hangal usse pare thein. unki chir smritiyon ko hum aawaaaz ke roop mein sunte rahenge
गंगूबाई को हमारी भी श्रद्धांजलि.. वैसे कुछ बाई बाद में देवी बन गईं। लेकिन अगर गंगूबाई ने इस सुविधा का लाभ नहीं लिया तो उनकी क्रांतिकारी चेतना ही थी।
बहरहाल, गंगूबाई का जाना इसलिए भी दुखद है कि भविष्य के गर्भ में अब उन जैसी वीरांगनाओं को जन्म देने लायक ताप बचा नजर नहीं आता।