ब्लागवाणी के बंद होने पर हिंदी ब्लागर जगत में हड़कंप

ब्लागवाणी पर लगा संदेश

ब्लागवाणी पर लगा संदेश

अमिताभ त्रिपाठी

ब्लागवाणी ने जो भी कदम उठाया है मैं उससे सहमत हूं। मैं मैथिलीजी को और उनके पुत्र शिरील को जानता हूं। दोनों पिता पुत्र हिन्दी के प्रति समर्पित हैं। मैथिली जी ने तो हिन्दी के लिये तब फाण्ट विकसित किये जब कम्प्यूटर एकदम नया था। मैथिली जी का हिन्दी के प्रति जुनून और ब्लागिंग और इंटरनेट को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर उन्होंने जिस प्रकार ब्लागिंग को नया आयाम दिया वह ऐतिहासिक है। जब भी आने वाले वर्षों में हिंदी ब्लागिंग विधा और इंटरनेट आधारित पत्रकारिता का इतिहास लिखा जायेगा तो मैथिली जी और शिरील का नाम उसमें शामिल होगा। वैसे यह कार्य इन दोनों ने इस चाहत से भी नहीं किया।

आज मैथिली जी और शिरील जी सहित उनकी टीम को यह निर्णय (ब्लागवाणी को बंद करने का निर्णय) लेना पड़ा तो उसके कारण पर कोई क्यों नहीं जाता? आज ब्लागवाणी बन्द होने के बाद सभी को यह अनुभव हो रहा है कि उसका मह्त्व क्या था? लेकिन जब यह चल रहा था तो अनेक बार यह तक माना गया कि मैथिली जी यह सब आर्थिक लाभ के लिये कर रहे हैं। उन पर पक्षपात के आरोप भी लगे। कुछ लोगों ने कहा है कि मैथिली जी को बहस करनी चाहिये थी लेकिन जरा इस बात पर भी तो ध्यान दीजिये कि आज बहस करता कौन है?

बह्स, विमर्श जैसे शब्द हमारे लिये आडम्बरी हो गये हैं। यदि कोई तर्क या विचार किसी को पसन्द नहीं आया या एक पक्ष का स्वार्थ सिद्ध नहीं हुआ तो बहस के नाम पर व्यक्तिगत छीटाकशी औए आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाने लगते हैं। उसमें भी आज कुछ शब्द काफी लोकप्रिय हैं जिन्हें आधार बनाकर एक दूसरे को जमकर गालियां दी जाती हैं और इसी को बहस का नाम दे दिया जाता है।

वास्तव में स्वयं को किसी भी रूप में समाज में स्थापित करने की चेष्टा, दूसरे की आलोचना कर स्वयं को स्थापित करने का प्रयास, उससे भी बड़ा – किसी बड़े संस्थान या व्यक्ति पर सनसनीखेज आरोप लगाकर शीघ्र चर्चा में आने की नयी पद्धति और अपनी बात को श्रेष्ठ सिद्ध करने की लालसा के चलते आज स्वार्थ और बौद्धिक असहिष्णुता इस कदर हावी हो चुकी है कि किसी के लिये अपना दामन बचाये रखने का एक ही साधन है कि वह कोई भी प्रयास व्यक्तिगत आधार पर करे।

सुधीर शर्मा

ब्लागवाणी क्या है? अगर कोई मुझसे यह सवाल करे तो मेरे जैसे पाठकों के लिए यह ऐसा द्वार है जिसके जरिए हम ऐसी दुनिया में दाखिल होते हैं जहां अनगिनत विचार हैं। जहां प्रेम, दर्द, कुंठा और हौसला … ज़िंदगी की सभी भावनाएं रचनात्मक अंदाज़ में पेश की जाती हैं। यह आपके ऊपर है कि किस भावना को गले लगाते हैं।

मैंने घंटों ब्लागवाणी पर बिताए हैं। जिस दिन अपने ब्लॉग पर कुछ लिखा है उस दिन भी और जिस दिन कुछ नहीं लिखा है उस दिन भी। इस सोचते हुए कि देखें आज किस साथी ने क्या लिखा है? किस क्षेत्र में क्या हलचल है? मीडिया की मंडी में किसने किसकी दुकानदारी पर हल्ला बोला है। साहित्य की दुनिया में क्या उठापटक चल रही है। वो तमाम बातें जिन्हें मुख्यधारा की पत्रकारिता में जगह नहीं मिलती हैं वो सभी कुछ तो ब्लागवाणी के जरिए हम सब तक पहुंचता था।

कल शाम से कई बार ब्लागवाणी पर जा चुका हूं। इस उम्मीद में कि कहीं उसके संचालकों का दिल पसीज गया हो और उन्होंने उसे फिर से शुरू कर दिया हो। लेकिन हर बार खाली हाथ लौटता हूं। निराशा में डूब कर लौटता हूं। सोचता हूं कि कल मैंने अपने ब्लॉग पर कुछ लिखा तो मेरी बात लोगों तक कैसे पहुंचेगी? चिट्ठाजगत नाम का एक और ब्लॉग एग्रीगेटर है, लेकिन वो उतना यूजर फ्रेंडली नहीं है। उसमें ब्लागवाणी जैसी बात नहीं।

इसलिए मैं एक बार फिर ब्लागवाणी के संचालकों से गुजारिश करना चाहता हूं कि हो सके तो वो अपना फैसला बदल दें। हम जैसे ढेरों ब्लॉगरों के बारे में सोचे। जो महीने-दो महीने में एकाध बार अपनी व्यस्त ज़िंदगी से वक़्त निकाल कर लिखते हैं। हम जैसे लोगों के लिए ब्लागवाणी एक मंच था। उससे हमें लिखने का हौसला मिलता था। आज वह हौसला टूट रहा है। ब्लागवाणी के संचालकों को अपने नहीं तो हमारे बारे में सोचना चाहिए।

रीतेश

ब्लागवाणी का बंद होना हर उस ब्लॉगर के लिए सदमे के जैसा है जो ब्लॉग पर शौकिया तौर पर कभी-कभार लिखते हैं. रोज-रोज लिखने वालों या समूह के तौर पर चल रहे ब्लॉग तो साइट की शक्ल ले चुके हैं. वहां छपने वाली हर बात लोगों को पता चल जाती है. लेकिन अगर साल में दो या चार बार लिखने वाले मेरी तरह के ब्लॉगर को ब्लागवाणी का सहारा न हो तो कोई कैसे जान पाएगा कि हम क्या लिख रहे हैं. जो आपको नहीं जानते, वो तो कभी नहीं पढ़ेंगे, जो जानते हैं उन्हें भी बताने वाला कोई नहीं होगा कि कल्लन भैया ने आज कुछ पन्ना काला कर दिया है.

ब्लागवाणी के संचालकों से अगर आपका सीधा संपर्क हो तो उनसे हम जैसे मॉनसूनी ब्लॉगरों की तरफ से आग्रह करें कि हमें उनकी बहुत ज्यादा जरूरत है. मैं कहना चाहता हूं कि इसे बंद करने की बजाय ब्लागवाणी प्रबंधन इस सुविधा का उपभोग करने वाले मेरे जैसे ब्लॉगरों से सालाना सेवा शुल्क लेना शुरू कर दे लेकिन इस सेवा को बंद न करे. यह मेरी निजी राय है लेकिन मुझे भरोसा है कि आत्मसंतुष्टि के साथ अनियमित तौर पर ब्लॉग लिखने वाले मेरे जैसे सैकड़ों लोग इससे इत्तेफाक रखते होंगे.

सुशांत झा

दुखद है, कल से मैं पंगु महसूस कर रहा हूं। मेरे हाथ से वो अनमोल सुविधा दूर हो गयी है जिससे मैं दुनिया को एक अलग खिड़की से झांकता था। मेरी अपनी बात को पूरी दुनिया तक पहुंचाने का एक सशक्त साधन, लगता है, दूर हो गया है। कल से मेरे कई दोस्त परेशान हैं, हम इस बात को बताने में असमर्थ हैं कि हमारी कितनी बड़ी क्षति हुई है। सही में कहा गया है कि किसी चीज के महत्व का तब पता चलता है जब वो हमारे बीच नहीं रहता। ऐसे कई ब्लाग जिनके यूआरएल हमें याद नहीं है और जिसका लिंक हमने अपने ब्लाग में सहेज कर नहीं रखा, वो एकबारगी हमारी नजरों से दूर हो गए हैं। हम नए-2 ब्लागरों, उनके विचारों और उनके नायाब अनुभवों से दूर हो गए हैं। अब हमें इस बात का भय भी सता रहा है कि कोई अति-व्यावसायिक किस्म का कारोबारी हमें ये सुविधा देने की एवज में पैसे की मांग करेगा। हिंदी को ब्लाग जगत और इंटरनेट पर लोकप्रिय बनाने में ब्लागवाणी ने जो रोल अदा किया था वो अपने आप में एक मिसाल है।

जब कोई नया ब्लागर अपने ब्लाग के हिट्स, पसंद और टिप्पणियां ब्लागवाणी पर देखता था तो वो कितना उत्साहित होता था और कितनी उर्जा से नए लोगों को इंटरनेट पर लिखने के लिए प्रोत्साहित करता था-इसकी कमी तो खलेगी ही। इंटरनेट पर हिंदी के फैलाव का जब इतिहास लिखा जाएगा तो ब्लागवाणी जरुर याद किया जाएगा। हिंदी के आचार्यों की निगाह में भले ही इंटरनेट पर हिंदी का लेखन एक ‘उछलकूद’ से ज्यादा न हो, लेकिन ब्लागवाणी ने जो रोल इसके प्रोत्साहन में अदा किया है वो लंबे वक्त तक याद रखने लायक है। हिंदी में कई सारे दूसरे एग्रीगेटर्स भी हैं लेकिन ब्लागवाणी जितना यूजर फ्रेंडली था उतना कोई नहीं।

लेकिन जिंदगी रुकने का नाम नहीं है। ब्लागवाणी की कमी तो खलेगी लेकिन इसके बिना भी हिंदी अपन फैलाब करती रहेगी। हम उम्मीद करते हैं कि ब्लागवाणी से भी बेहतर एग्रीगेटर हमारे पास मौजूद होंगे। लेकिन, ब्लागजगत के पाठकों और लेखकों की तरफ से हम एक बार फिर मैथिलीजी से विनम्र मांग करते हैं कि ब्लागवाणी को जिंदा किया जाए। ये मांग ब्लागरों का अपनापन भरा आग्रह नहीं बल्कि प्यार भरा दवाब भी है।

चंडीदत्त शुक्ल

दुःखद है और दुर्भाग्यपूर्ण भी. मॉडरेटर महोदय ने सच ही कहा है कि साहस के साथ लड़ने और विमर्श के मंच पर टिके रहने की हिम्मत जुटानी चाहिए थी पर क्या ये भी सही नहीं है कि कई बार अगर आप एकदम मासूम हैं, आपकी नीयत साफ है, तो आप बार-बार कटाक्ष सहने की जगह चुप बैठना पसंद नहीं करते। शायद यही हुआ हो…। हां, बहस और ज़िरह की ज़रूरत से तब भी इनकार नहीं किया जा सकता. हम कितने ही मासूम क्यों ना हों, दुष्टताभरे आक्षेपों से अगर बचकर निकल जाते रहे, तो अवसरवादी तो और मज़बूत होंगे। मुझे नहीं पता कि ब्लागवाणी का प्रयोग किस क़दर निर्लोभ, निष्पक्ष और सच्चा था…पर साइट संचालकों के पास ये ब्लागवाणी बंद करने को जो तर्क हैं, वो सही होते हुए भी निराशा पैदा करते हैं और गहरा क्षोभ भी. अल्लाह करे कि ये वाणी बंद ना हो…, क्योंकि तेरी आवाज़ ही तो पहचान है…।

Last 5 posts by डेस्क

Short URL: http://www.janatantra.com/news/?p=2836

Posted by on Sep 29 2009. Filed under स्पेशल रिपोर्ट. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

Leave a Reply

300x250 ad code [Inner pages]

Search Archive

Search by Date
Search by Category
Search with Google
120x600 ad code [Inner pages]
Log in | Designed by Gabfire themes