यह नुकसान तो पत्रकारों को ही उठाना होगा

बचपन में बाबा भारती और डाकू खड़ग सिंह की कहानी बहुतों ने पढ़ी होगी। बाबा भारती के पास एक शानदार घोड़ा था। जिसे देख कर डाकू खड़ग सिंह की नीयत डोल गई थी। वो एक दिन दीन-हीन बन कर बाबा भारती को मिला। जिसके बाद बाबा भारती खुद घोड़े ने उतर गए और उस पर उन्होंने डाकू खड़ग सिंह को बिठा दिया। मौका मिलते ही खड़ग सिंह ने हांक लगाई और घोड़े को ले भागा। तब बाबा ने उससे कहा कि घोड़ा ले जाना है ले जाओ लेकिन एक बात सुनते जाओ। बाबा भारती ने कहा कि खड़ग सिंह किसी को यह मत बताना कि तुमने घोड़ा कैसे चुराया है। लोग सुनेंगे तो किसी गरीब और जरूरतमंद को मदद देना बंद कर देंगे। उसके बाद डाकू खड़ग सिंह वहां से चला गया। लेकिन बाबा भारती की यह बात उसके जेहन में कौंधती रही। कुछ समय बाद उसका जमीर जाग गया और उसने घोड़ा बाबा भारती को लौटा दिया।

इस कहानी का सबक यही है कि कभी किसी के भरोसे का क़त्ल नहीं करना चाहिए। लेकिन सरकार ने लालगढ़ में पत्रकारों के भरोसे का ख़ून कर दिया है। वहां स्थानीय पत्रकारों के साथ जो छल किया गया है उसने एक ख़तरनाक खेल की ज़मीन तैयार कर दी है। नक्सली संगठनों को पत्रकारों का दुश्मन बना दिया है। नक्सली ही क्यों जितने भी आंदोलनकारी या फिर अलगाववादी ताक़तें हैं पत्रकार उनके निशाने पर होंगे। जब भी कोई पत्रकार उनसे ख़बर के लिए संपर्क करेगा वो उसे शक़ की नज़र से देखेंगे। इससे हो सकता है कि पत्रकारों पर हमले और बढ़ें। अगर ऐसा कुछ भी हुआ तो उसके लिए सीधे तौर पर सरकार जिम्मेदार होगी और वह पुलिस भी – जिसने पत्रकार बन कर लालगढ़ से छ्त्रधर महतो को गिरफ़्तार किया है।

छत्रधर महतो (द हिंदू में छपी तस्वीर)

छत्रधर महतो (द हिंदू में छपी तस्वीर)

पत्रकार इन दिनों बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। विश्वसनीयता का संकट बहुत बड़ा संकट है। बाज़ार और मंदी से सबसे अधिक विश्वसनीयता को ही ठेस पहुंची है। पैसे जुटाने के लिए कई मीडिया संस्थानों को अनैतिक समझौते करने पड़े हैं। इससे अख़बारों के साथ पत्रकारों की साख पर भी बट्टा लगा है। कई अख़बारों को अपने संस्करण बंद करने पड़े हैं। विस्तार की योजनाओं को टालना पड़ा है। इससे हज़ारों की संख्या में पत्रकार बेरोजगार हुए हैं। इसके अलावा सरकारी विज्ञापनों के नाम पर ब्लैकमेलिंग चल रही है। सत्ता और अख़बारों के मालिकों के बीच हुए इस अनैतिक साठगांठ से पत्रकारों पर दबाव बढ़ा है। चौतरफा दबाव के बीच बहुत सारे पत्रकार टूट गए हैं और अब धंधा करने लगे हैं। लेकिन बहुत से पत्रकारों ने तमाम विपरीत हालात के बावजूद कलम से सौदा नहीं किया है। वो हर जोखिम उठाते हुए ख़बर तलाशते रहते हैं।

हिंसाग्रस्त इलाकों में तो रिपोर्टिंग और भी मुश्किल होती है। जम्मू कश्मीर हो, उत्तर पूर्व हो या फिर नक्सल प्रभावित इलाके। यह विश्वास ही है जिसके सहारे पत्रकार ज़िंदा रहते हैं। अगर विश्वास की डोर टूटी तो मारा जाना तय है। अगर प्रशासन को शक़ हो जाए कि कोई पत्रकार सशस्त्र संघर्ष कर रहे धड़े से जुड़ा है तो भी वो पत्रकार बच सकता है। लेकिन अगर सशस्त्र संघर्ष में जुटे धड़े को यह शक़ हो जाए कि कोई पत्रकार सरकार का मुखबिर है तो उसका बचना बहुत मुश्किल है। छत्रधर महतो को जिन दो पत्रकारों को धोखे में रख कर गिरफ़्तार किया गया है, आज वो दोनों पत्रकार इसी संकट से जूझ रहे होंगे। उन्होंने द हिंदू को बताया है कि वो छिपते फिर रहे हैं। अपने ही इलाके में आज उनकी जान ख़तरे में है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

हममें से ज़्यादातर ने उस माहौल को कभी देखा भी नहीं होगा। नक्सली इलाकों में जाकर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार बहुत थोड़े हैं। युद्धग्रस्त और हिंसाग्रस्त इलाकों में कुछ हफ़्तों के लिए गए किसी पत्रकार से बात कीजिएगा वो बड़े शान से अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते हैं। यहां ध्यान रखिएगा कि ये बड़े पत्रकार जब भी उन इलाकों में जाते हैं तो आमतौर पर सेना की तरफ से सुरक्षा के घेरे में जाते हैं। उनकी ख़बरें एकतरफ़ा और एजेंट सरीखी होती हैं। ऐसे ही एक पत्रकार पर आरोप भी लगा है कि उसकी नादानी से जम्मू कश्मीर में एक जवान की मौत हो गई थी।

जो पत्रकार सेना या सुरक्षाबलों की तरफ़ से नहीं जाते उनकी मदद स्थानीय पत्रकार या फिर सामाजिक कार्यकर्ता करते हैं। उससे इन स्थानीय पत्रकारों को कोई ख़ास लाभ नहीं मिलता। उन्हें थोड़ा बहुत आर्थिक लाभ भले ही मिल जाए, लेकिन पहचान शहरों से गए बड़े पत्रकारों को ही मिलती है। फिर भी स्थानीय पत्रकार उनकी मदद करते हैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ भरोसे के आधार पर। लेकिन छत्रधर महतो को पत्रकार के वेश में पहुंच कर पुलिसवालों ने उसी भरोसे का क़त्ल कर दिया है। यकीन मानिए इसका नुकसान बहुत बड़ा होगा और यह नुकसान पुलिसवाले नहीं उठाएंगे बल्कि पत्रकारों को ही उठाना होगा।

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Posted by on Sep 29 2009. Filed under तीर-ए-नज़र. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

4 Comments for “यह नुकसान तो पत्रकारों को ही उठाना होगा”

  1. बाबा भारती का यह सटीक उदाहरण है। पुलिस या किसी को मीडिया की विश्वसनीयता के दुरूपयोग का अधिकार नहीं। ऐसा दुरूपयोग फिर न हो सके, इसके लिए स्पष्ट कानून बनना चाहिए। इस संबंध में प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन बनाया गया है। जनतंत्र के पाठकों से आग्रह है कि इस पर आनलाइन हस्ताक्षर करके अपना विरोध दर्ज करायें। इसके लिए यहां क्लिक करें
    http://www.petitiononline.com/wbmisuse/petition.html

  2. Ashok Kumar

    Police ne ye bilkul galat kam kiya. Tajjub hai ki desh ke sare media maharathi khamosh baithe hai. Ess issue ko highlight karane ke liye Jantantra ko Dhanyavad

  3. Ajit Kumar

    Bangal ki journalist Soma Das ke sath Mamta Banarjee ke logo ne jo kiya wo Desh ke media per khatare ka next step hai. Agar media ki vishwasniyata ko polic eke log nakli media bankar khatm karenge tab media ko tarah tarah ke aise hi khatro ko uthana hoga. Isliye hame har ,mamale ko alag karke nahi balki samagra taur par dekhana chahiye

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