मीडिया के बाज़ार में हिंसा की ऊंची बोली

दर्शक जब हिंसा देखता है तो उसमें नकारात्मक भाव पैदा होते हैं। मन में सोचता है। आक्रामक एक्शन की कैद में होता है। ऐसी अवस्था में हथियार, प्रतीक या नाम वगैरह की उपस्थिति एक्शन के लिए तैयार कर सकती है। इससे दर्शक में भय पैदा होता है। यह हिंसा का तात्कालिक असर है। साथ ही भावनात्मक प्रतिक्रिया, बेचैनी और हताशा पैदा करती है। तात्कालिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव को कई अन्य कारण भी प्रभावित करते हैं। जैसे लक्ष्य के साथ में स्वयं को जोड़कर देखना, मसलन् चरित्र आकर्षक हो, बहादुर हो, अथवा दर्शक के सोच से मिलता-जुलता हो। ऐसी स्थितियों में तदनुभूति पैदा होती है। जब किसी हिंसा के शिकार चरित्र के साथ दर्शक अपने को जोड़कर देखता है तो भय में बढ़ोतरी होती है। इस तरह की अवस्था में उसका आनंद भी प्रभावित हो सकता है।

पी.एच.तेन्नेवुम और इ.पी.गीर ने ”मूड चेंज एज ए फंक्शन ऑफ स्ट्रेस ऑफ प्रोटागोनिस्ट एण्ड डिग्री ऑफ आइडेंटीफिकेशन इन फिल्म व्यूइंग सिचुएशन” में लिखा है जो दर्शक हीरो के साथ जोड़कर देखते हैं उन्हें ज्यादा तनाव में रहना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए सुखान्त राहत पहुंचाता है। इसके विपरीत दुखान्त या अनिश्चित अंत तनाव में वृद्धि करता है। यदि किसी बच्चे को वास्तविक हिंसा का अनुभव हो तो बाद में वह घटना और चित्रण को तुलना करके देखने लगता है। इससे भय पैदा होता है। जब कोई दर्शक माध्यम हिंसा को वास्तव जीवन में देखने की कल्पना करता है तो उसे तत्काल भय होने लगता है।

माध्यम हिंसा को प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग कारणों से व्‍याख्‍यायि‍त करता हैं। कुछ कारण ऐसे होते हैं जिनके कारण भय की संभावनाओं को कम किया जा सकता है। यदि लोग मनोरंजन के कारण हिंसा के कार्यक्रम देख रहे हैं तो उनके अंदर भय की संभावनाएं कम होती हैं। उत्तेजना में भय की अनुभूति ज्यादा होती है। बच्चों की ज्ञान क्षमता कम होती है। वे प्लाट का सही अनुमान नहीं कर पाते। फलत:वे मीडिया हिंसा से ज्यादा प्रभावित होते हैं। अन्य दर्शकों की तुलना में बच्चों में कुछ हिंसक फैंटेसी रूपों को समझने की क्षमता नहीं होती।

माध्यमों में तीन किस्म की प्रवृत्तियां नजर आती हैं। पहली प्रवृत्ति में खतरनाक और क्षतिकारक रूप आते हैं। मसलन् ऐसी घटना का चित्रण जिसमें व्यापक क्षति हुई हो। जैसे प्राकृतिक आपदा, विभिन्न किस्म के जानवरों के हमले, बड़े पैमाने की दुर्घटना आदि। दूसरी कोटि में प्राकृतिक रूपों की विकृतियां, इसमें शरीर में दिखनेवाली विकृतियां, विरूपताएं, जन्मगत विकृतियां आदि शामिल हैं।

तीसरी कोटि में अन्य से उत्पन्न खतरे एवं तद्जनित भय का रूपायन मिलता है। मसलन् अन्यायपूर्ण हिंसा का चित्रण भय पैदा करता है। व्यापकस्तर पर खुल्लमखुल्ला या विस्तृत हिंसा का चित्रण भय को विस्तार देता है। जब हिंसा करने वालों को दण्डित नहीं किया है तो दर्शकों को ज्यादा भय होता है। हिंसा का लाइव एक्शन कार्टून हिंसा की तुलना में ज्यादा उत्तेजित करता है। मीडिया हिंसा का बार-बार एक्सपोजर संवेदनशून्य बनाता है।

मीडिया में हिंसा सबसे आकर्षक लगती है। मीडिया उद्योग आज सबसे जनप्रिय और सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला उद्योग है। कुछ लोग इसे पापुलर कल्चर कहते हैं, कुछ लोग इसे संस्कृति उद्योग कहते हैं। सारी दुनिया में मीडिया उद्योग का मुखिया अमेरिका है। नए आंकड़े बताते हैं कि सारी दुनिया में सन् 2001 में 14 अरब डालर सिनेमा देखने पर खर्च किया गया। इसमें अकेले अमेरिका के घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 9 अरब डालर खर्च किए गए। इसके अलावा यदि ग्लोबल स्तर पर मीडिया संगीत की बिक्री पर नजर डालें तो पाएंगे कि मीडिया की सबसे बड़ी मार्केट है संगीत। सन् 2000 में मीडिया संगीत की बिक्री का आंकडा 37 अरब डालर पार कर गया। वीडियो गेम की बिक्री सन् 2002 में 31 अरब डालर आंकी गयी।

अमेरिकी मीडिया कंपनियों का आधे से ज्यादा बाजार अमेरिका के बाहर है। यह बाजार लगातार बढ़ रहा है। आज अमेरिकी मीडिया मालों से सारी दुनिया के बाजार भरे पड़े हैं। टीवी, वीसीआर, सैटेलाईट डिश आदि की बाजार में बिक्री लगातार बढ़ रही है। अमेरिकी फिल्में 150 से ज्यादा देशों में दिखाई जा रही हैं। अमेरिकी टेलीविजन कार्यक्रमों का 125 से ज्यादा देशों में प्रसारण होता है। अमेरिकी फिल्म उद्योग ‘जी’ (जनरल) केटेगरी और ‘पीजी’ (पेरेण्टल गाइडेंस) केटेगरी की फिल्मों को देखने वालों की संख्या लगातार घट रही है और ‘आर’ केटेगरी की फिल्मों की संख्या बढ़ रही है।

हॉलीवुड के द्वारा सन् 2001 में दो-तिहाई से ज्यादा ‘आर’ केटेगरी की फिल्में बनायी गयीं। इसके अलावा एक्शन फिल्मों की विदेशों में मांग ज्यादा है। एक्शन फिल्म के लिए जटिल प्लाट और चरित्रों की जरूरत नहीं होती। वहां तो सिर्फ मारधाड, हत्या, स्पेशल प्रभाव और विस्फोटों के माध्यम से जनता को बांधे रखा जाता है। जबकि कॉमेडी और नाटक में अच्छी कहानी चाहिए, गहरा व्यंग्य चाहिए, प्रामाणिक चरित्र चाहिए, ये सारी चीजें विशिष्ट संस्कृति केन्द्रित होती हैं, इसके विपरीत एक्शन फिल्म के लिए अच्छी स्क्रिप्ट और अच्छी एक्टिंग से ही काम चल जाता है। क्योंकि एक्शन फिल्म सरल होती है। उसे सारी दुनिया में कोई भी समझ सकता है। इसमें ज्यादा संवाद नहीं होते। एक ही वाक्य में कहें तो एक्शन फिल्म में ‘संवाद कम धडकन ज्यादा होती है।’ हॉलीवुड उद्योग सामाजिक मसलों पर फिल्म बनाने पर खर्चा नहीं करना चाहता। बल्कि एक्शन फिल्मों पर ज्यादा खर्चा करना चाहता है।

अमेरिकी फिल्मों की जनप्रियता ने सारी दुनिया में फिल्मों का एक नया ट्रेंड विकसित किया है। अब ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी फिल्मों की तर्ज पर कहानी और एक्शन की मांग उठ रही है। अमेरिकी फिल्मों के प्रभाव के कारण ही संगीत में हिंसा और कामुकता की बाढ़ आयी है। अब वीडियो संगीत में हिंसक और असामाजिक इमेजों की ज्यादा खपत हो रही है। इससे सामाजिक जीवन में घृणा का प्रसार हो रहा है। घृणा आज सबसे पवित्र और बिकाऊ माल बन गया है। दुनिया की सबसे बड़ी संगीत कंपनी यूनीवर्सल म्यूजिक ग्रुप ने अपनी समूची मार्केटिंग शक्ति झोंक दी है और सभी नामी अश्वेत गायकों को मैदान में उतार दिया है।

चर्चित गायकों में इमीनिम, डीआर, डीआरइ, लिम्प बिजकिट के नाम प्रमुख हैं। इन अश्वेत गायकों के द्वारा गाए गए अधिकांश गाने हिंसा और घृणा से भरे होते हैं। इनमें निशाने पर औरतें ,समलैंगिक और लेस्बियन होते हैं। इस तरह का हिंसा प्रदर्शन अपने चरमोत्कर्ष पर सन् 2001 में तब पहुँचा जब अमेरिका के प्रसिध्द ग्रेमी एवार्ड के लिए इमीनेम को चार पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया। इस गायक की सीडी दि ‘इमीनेम शो’ ने सन् 2002 में बाजार में आते ही पहले ही महीने में 36.3 लाख डालर की बिक्री की। यही स्थिति कमोबेश रैप संगीत की है। इसने पॉप म्यूजिक को पछाड़ दिया है। रैप में व्यापक पैमाने पर हिंसक गीत और हिंसक जीवन शैली का रूपायन हो रहा है।

यही स्थिति वीडियो गेम की है। चंद वर्षों में वीडियो गेम हिंसा के पर्याय बनकर रह गए हैं। आज विश्व मीडिया उद्योग में वीडियो गेम दूसरा सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला क्षेत्र है। अनुसंधान बताते हैं कि ‘आर’ केटेगरी की फिल्मों ,वीडियो गेम, कामुक वीडियो के सबसे बड़े उपभोक्ता युवा हैं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी

मीडिया हिंसा के बारे में विगत पचास साल में किए गए अनुसंधान एक स्वर से यह रेखांकित करते हैं कि मीडिया हिंसा का बच्चों पर गहरा असर होता है, खासकर जब वे बड़े हो जाते हैं तो इस असर को देखा जा सकता है। उनके व्यवहार में आक्रामकता आ जाती है। मीडिया में हिंसा के प्रभाव को लेकर सबसे पहले विवाद हिंसा की परिभाषा को लेकर हुआ। मीडिया हिंसा के महान् अध्येता और टेंपिल यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर जॉर्ज गर्बनर ने लिखा ऐसा अभिनय ,भूमिका या धमकी जिससे किसी की हत्या हो या क्षति हो, उसे हिंसा कहते हैं। इसको देखने के पैमाने अलग-अलग हैं। इसमें कार्टून हिंसा को भी शामिल करना चाहिए। जबकि कुछ मीडिया विशेषज्ञ यह मानते हैं कि कार्टून हिंसा को मीडिया हिंसा में शामिल नहीं करना चाहिए,क्योंकि वे व्यंग्यात्मक और अयथार्थ होते हैं। जो लोग यह मानते हैं कि मीडिया हिंसा आक्रामकता पैदा करती है, उनसे भी असहमत विशेषज्ञ हैं। इन लोगों का मानना है कि ये दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं किन्तु इन दोनों में अनौपचारिक संबंध है। यह संबंध तब इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे कैसे सीखते हैं।

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Posted by on Sep 30 2009. Filed under स्पेशल रिपोर्ट. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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