गूगल के "G" बन गए गांधी

आज दो अक्टूबर है और आधी रात से गूगल पर महात्मा गांधी नज़र आने लगे हैं। गूगल ने उन्हें अपना “जी” (google – का पहला g) बना दिया है। टेलीविजन चैनलों पर भी आज महात्मा गांधी को सजाया और बेचा जाएगा। कहीं गांधी पर फिल्में दिखाई जाएंगी। तो न्यूज़ चैनलों उनके जीवन पर विशेष बनाएंगे। अख़बारों में तो एक दिन पहले से ही उन्हें याद किया जाने लगा है। एक दिन के लिए बुजुर्ग गांधीवादियों की डिमांड बढ़ गई है। मेरे पास भी एक दो फोन आ चुके हैं कि कोई गांधीवादी जान-पहचान का हो तो बताना। उन्हें स्टूडियो बुलाना है। भोर होने के साथ ही देखिएगा नेता लोग राजघाट जाकर उनकी समाधि पर फूल चढ़ा आएंगे। इस रस्मअदायगी में कोई भी पीछे नहीं रहेगा।

जब स्कूल में पढ़ते थे तो कई दिन पहले से ही दो अक्टूबर का इंतज़ार रहता था। इसलिए नहीं कि गांधी कोई रोल मॉडल थे इसलिए कि इस दिन छुट्टी रहती है। जब बड़े हुए तो गांधी के बारे में कुछ समझ में आया। लेकिन साथ ही यह भी अहसास हुआ कि आज हमारी व्यवस्था और निजी ज़िंदगी में गांधी के लिए कोई जगह नहीं। हमारे हुक्मरानों ने अपने कर्मों और अपनी नीतियों से गांधी को कितना गैर-प्रासंगिक ठहरा दिया है। ज़िंदा विचारों को बेजान मूर्तियों में तब्दील कर के इधर-उधर सजा दिया है।

कुछ दिन पहले गांधी पर ही चर्चा हो रही थी। तब किसी साथी ने कहा था कि अगर दो अक्टूबर की छुट्टी ख़त्म कर दी जाए और स्कूली सिलेबस से गांधी को बाहर कर दिया जाए तो देखना अगली पीढ़ी तक लोग गांधी को भूल चुके होंगे। हमारी स्मृतियों में शेष गांधी के अवशेष भी विलुप्त हो चुके हैं। साथी की बात उटपटांग सी है, लेकिन सच लगती है।

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Posted by on Oct 2 2009. Filed under देश - दुनिया. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

1 Comment for “गूगल के "G" बन गए गांधी”

  1. गंदा है पर धंधा है…। चाहे गांधी हों या गेंदाफूल…जिसमें भी बिकने लायक पोटेंशियल दिखता है, भाई लोग बेचने लगते हैं। शुक्र है…गांधी को अब तक इस काबिल तो समझा है इन लोगों ने!

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