अक्सर पत्रकारों को डराती-धमकाती हैं ममता
ममता बनर्जी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वो बेहद डरी हुई महिला हैं। उन्हें लगता है कि पूरी दुनिया उनके ख़िलाफ़ साज़िश रच रही है। उन्हें अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं पर भी भरोसा नहीं है। उनको लगता है कि उनकी ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ता कभी भी उनके ख़िलाफ़ जा सकते हैं। इसलिए वो उन्हें हमेशा दबा कर रखती हैं। ममता बनर्जी उन्हें आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहतीं।
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान बहुत छोटे-छोटे वाकयों से की जा सकती है। ममता को समझने के लिए इसी साल चुनाव बाद का एक वाकया याद करना चाहिए। 19 सीटों के साथ सत्ताधारी गठबंधन यूपीए में तृणमूल कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी है। डीएमके के पास भी तृणमूल से एक सीट कम है। लेकिन जब मंत्रिमंडल के बंटवारे की बात आई तो ममता ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी को बस एक ही कैबिनेट सीट चाहिए। कम सीट होने के बावजूद डीएमके के तीन कैबिनेट मंत्री हैं। लेकिन तृणमूल पार्टी से अकेले ममता बनर्जी कैबिनेट मंत्री हैं। आखिर क्यों?
दरअसल ममता बनर्जी यह नहीं चाहती कि उनकी पार्टी का कोई भी नेता उनके बराबर या उनके करीब भी पहुंचे। अगर उनकी पार्टी का कोई और सांसद कैबिनेट मंत्री बनता तो उसे भी वही दर्जा हासिल होता जो ममता बनर्जी को हासिल है। यह उनके लिए खुशी की बात होनी चाहिए थी। लेकिन इस तंग दिल इंसान को यह बात पसंद नहीं। यही नहीं ममता बनर्जी एक बेहद खड़ूस मिजाज की महिला हैं। वो किसी को भी सरेआम बेइज्जत कर सकती हैं। जमीन से जुड़ा कोई भी नेता शायद ही उनके जितना बद्तमीज हो।
कुछ दिन पहले की बात है। दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। उनमें सभी चैनलों से सीनियर-जूनियर रिपोर्टर मौजूद थे। वहीं एक चैनल के पत्रकार ने ममता बनर्जी से भूमि अधिग्रहण (संशोधन) ऐक्ट से जुड़ा एक सवाल पूछा। ममता बनर्जी उस सीनियर पत्रकार को जानती थीं, लेकिन सवाल उनकी पसंद के मुताबिक नहीं था। इसलिए पत्रकार की मंशा पर सवाल उठाने के लिए उन्होंने पूछा कि वो किस चैनल से हैं। उस पत्रकार ने भी भांति-भांति के नेता देखे हैं इसलिए उन्होंने ममता बनर्जी से साफ कर दिया कि उन्हें इससे क्या लेना-देना कि कौन किस चैनल से है? थोड़ी देर वहां मौजूद एक और लड़की ने बांग्ला में ममता बनर्जी से सवाल पूछा। जिसके बाद ममता बनर्जी ने उस लड़की से भी वही सवाल किया। उस रिपोर्टर ने कहा 24 घंटा। जिसके बाद ममता बनर्जी ने जवाब देने से मना कर दिया।
यही नहीं डीएनए पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक इससे पहले ममता बनर्जी कई बड़े पत्रकारों के साथ भी क्रूर बर्ताव कर चुकी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ममता ने पहली बार अपने बागी तेवर का प्रदर्शन 2001 में किया था। पत्रकार प्रांजय गुहा ठाकुराता ने रेलवे से जुड़ा एक तकनीकी प्रश्न किया। जिस पर वो भड़क गईं। उन्होंने कहा कि “क्या तुम ज्योति बसु के एजेंट हो? क्या तुम गणशक्ति (सीपीएम मुखपत्र) के लिए काम कर सकते हो?”
उसी रिपोर्ट के मुताबिक एक लोकप्रिय बंगाली चैनल के पत्रकार सुदेश्ना भट्टाचार्जी को 2006 में ममता बनर्जी ने सिंगूर में टाटा फैक्ट्री के सामने सीपीएम समर्थक होने का आरोप लगाया और उसके बाद तृणमूल कार्यकर्ताओं ने सुदेश्ना की पिटाई भी की। यही नहीं 2008 में जब टाटा ने सिंगूर से नैनो प्लांट को हटाने का एलान किया और वहां मौजूद एक चैनल की पत्रकार मोनीदीपा बनर्जी ने उसे सवाल पूछा तो ममता ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सबके सामने पूछा कि टाटा ने तुम्हे कितने पैसे दिए हैं?
पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी की बदमिजाजी के कई किस्से मशहूर हैं। लेकिन अब लगता है कि वो दिमागी दिवालिएपन की सारी सरहदें पार कर रही हैं। किसी रिपोर्टर पर हत्या की कोशिश की मुक़दमा दर्ज कराना उनके इसी दिवालिएपन को जाहिर करता है।
ममता बनर्जी पत्रकारों से कहती फिरती हैं कि उनका कोई चैनल नहीं है। लेकिन मीडिया जगत के लोग जानते हैं और बताते हैं कि स्टार आनंदा उनके गुणगान में किस कदर लगा है। आनंद बाज़ार पत्रिका का यह न्यूज़ चैनल ममता बनर्जी का भोंपू बना बैठा है। उसके पत्रकार भी ममता बनर्जी से गुडी-गुडी सवाल करते हैं… इसलिए उन्हें कभी भी स्टार आनंदा के पत्रकारों पर एतराज नहीं होता।
लेकिन बात “स्टार आनंदा” और “24 घंटा” की नहीं है। बात अभिव्यक्ति की आज़ादी का है। स्वतंत्र प्रेस का मसला है। हो सकता है कि किसी पत्रकार या फिर किसी न्यूज़ चैनल का किसी विचारधारा की तरफ झुकाव हो। किसी पार्टी से कोई रिश्ता हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अगर उसकी तरफ़ से कोई सवाल उठाया जाता है तो उस सवाल का जवाब नहीं दिया जाएगा। वैसे भी इस धरती पर शायद ही कोई सोचने-समझने वाला इंसान हो जिसकी कोई विचारधारा नहीं हो। शायद ही कोई न्यूज़ चैनल और अख़बार हो जिसकी कोई सियासत नहीं हो। यही लोकतंत्र की खूबी है और इस खूबी को नष्ट करने का हक़ किसी को नहीं दिया जा सकता।
वैसे ममता अकेली ऐसी नेता नहीं हैं जिन्हें अपने ख़िलाफ़ उठे आवाज़ पसंद नहीं। नीतीश कुमार, अजीत जोगी, नरेंद्र मोदी, मायावती समेत ऐसे नेताओं की एक पूरी फौज तैयार हो रही है। ये सभी इस लोकतांत्रिक देश के तानाशाह हैं। इन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ है, लेकिन भीतर से ये इतने डरे हुए हैं कि चाह कर भी उदार नहीं बन पाते। अगर कोई रिपोर्टर इनसे तीखा सवाल कर दे या फिर इनकी सरकार के अपराधों के ख़िलाफ़ कोई रिपोर्ट कर दे तो ये उसे निजी दुश्मन बना लेते हैं। कायदे से होना तो यह चाहिए कि ऐसी ख़बरों पर तुरंत कार्रवाई की जाए और सच को सामने लाने के लिए उस रिपोर्टर को धन्यवाद दिया जाए। लेकिन ऐसा करने के लिए बड़ा दिल और खुला दिमाग चाहिए। यह संकीर्ण नज़रिए और तानाशाही प्रवृति वाले मानवों के बस की बात नहीं है।
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बहुत बढिया कबीर जी।
एक कहावत तो सभी ने सुनी होगी “जब नास मनुस पर छाता है पहले बिबेक मर जाता है” ममता पर भी सत्ता भोगने का नशा शायद इस कदर छाया हुआ है कि अगर यही हाल रहा तो बंगाल की कुर्सी तो दूर शायद रेल पर भी न बैठ सकेंगी ममता दीदी।खासकर पत्रकारों के प्रति जिस तरह का बर्ताव देखने को मिल रहा है वो गलत है कुछ दिनों पहले लालूजी भी इस मतांध में जीते थे अबे ओ पत्रकार ऐ रिपोर्टर…जबसे जमीन नजर आई है अब सब साफ नजर आने लगा है ममता दीदी को भी मतांध की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए