ये क्रिकेट का नेपोलियन है

अगर खेल का आनंद लेना है तो हार-जीत को बगल की मेज पर रख दीजिए। हैदराबाद में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत का पांचवा वनडे मैच भी हार-जीत से ज़्यादा खेल का मजा लेने के लिए था। इसलिये कि सचिन तेंदुलकर जिस लय में खेले, वह अद्भुत रहा। जहां नए-नए खिलाड़ी चंद रन बनाकर खुद को तीसमार खां समझ लेते हैं, वही सचिन का साढ़े 36 साल की उम्र में 175 रनों की शानदार पारी खेलना एक नया विश्वास जगाता है। विश्वास यह कि सचिन आज भी टीम इंडिया के मेरुदंड हैं और उनका खेल क्रिकेट की मर्यादा की रक्षा करता है। वह खेल बताता है कि जीत और हार का फासला तो सिर्फ चंद लम्हों की मानसिक अवस्था है, नहीं तो खेल देखिए और खिलाड़ी का पराक्रम।

यह भी देखिए कि रनों के लिए कैसे कोई खिलाड़ी भूखा रहता है। हैदराबाद में सिर्फ 7 रन बनाकर तेंदुलकर को 17 हजारी बनना था। उस सात रन को बनाने में उन्होंने थोड़ा वक्त जरूर लिया लेकिन उसके बाद तो पोंटिंग के पठ्ठों की जो धुनाई शुरू की, उससे पिच पर बार बार रिकी बाबा को पसीना पोछते और उदास होते देखा गया। गनीमत है कि तीन रनों से जीत मिल गयी। वैसे खेल जीत-हार से ज़्यादा अहम होता है। बस अद्धुत योद्धा का युद्ध देखते रहिए। निजामों की नगरी में जिधर देखिए उधर तेंदुलकर के बल्ले की सिंह-गर्जना ही सुनायी पड़ रही थी। तभी तो 19 चौके और चार छक्के लगे।

रिकॉर्ड के माउंट एवरेस्ट पर बैठे उस खिलाड़ी का खेल देखना किसी सम्मोहन से कम नहीं था। मैच देखते हुए बार बार यही सोच रहा था कि सचिन तेंदुलकर बनते कैसे हैं? खुद तेंदुलकर ने अपने एक संस्मरण में कहा कि उनके गुरु रमाकांत आचरेकर के एक थप्पड़ ने उन्हें क्रिकेट का मास्टर ब्लास्टर बना दिया। एक दिन जब गुरु जी ने सचिन को प्रैक्टिस करने के लिए कहा था, तो सचिन अपने सीनियर खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने के लिए तालियां बजाने चले गए। गुरु जी ने पूछा तो मासूम सचिन ने सच बयान कर दिया। इस पर आचरेकर ने घुमाकर वो चांटा मारा, जिसने 12 साल के सचिन को आज सतरह हजारी और अपनी तरह का दुनिया का इकलौता खिलाड़ी बना दिया। वैसा खिलाड़ी, जैसा ना भूतो ना भविष्यति। लेकिन सवाल अब भी है कि क्या गुरु के चांटे ने ही सचिन की किस्मत संवार दी। अगर ऐसा होता तो कई जिम्मेदार और संवेदनशील गुरुओं का थप्पड़ कितने ही शिष्यों को लगा, लेकिन कौन सा चेला सचिन बन पाया। सचिन तो अर्जुन की तरह निरंतर साधना से बनता है और अपने बल्ले के जौहर से अपने गुरु को द्रोण के समतुल्य बना देता है। कौन गुरु गर्व से कह सकता है कि देखो, माउंट एवरेस्ट तो 8848 मीटर ही ऊंचा है, मेरा शिष्य तो 17 हजार से भी ज़्यादा ऊंचाई पर बैठा है। शतकों का शतक जिसको सलामी देने के लिए बेताब बैठा है और जिसकी गिल्ली चटकाकर दुनिया के बड़े बड़े गेंदबाज अपने सीने पर गर्व की एक नई इबारत लिख लेते हैं।

लेकिन किसके गेंद पर सचिन का बल्ला भरभरा गया, ये कितने लोग याद रखते हैं। लोग तो बस ये मलाल लेकर बैठ जाते हैं कि ओह! सचिन आउट हो गये। ये कुछ वैसे ही है, जैसे महान फ्रांसीसी योद्धा नेपोलियन की हार। दुनिया जानती है कि वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन हार गया था, लेकिन ये कितनों को पता है कि नेपोलियन को हराया किसने? सचिन के साथ भी यही बात लागू होती है क्योंकि विश्व क्रिकेट के वह नेपोलियन हैं।

((विचित्र मणि टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हैं))

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Posted by on Nov 6 2009. Filed under देश - दुनिया. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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