इतनी जल्दी क्यों कर दी, प्रभाष जी?

कागद तो आगे भी कारे होंगे लेकिन वैसे नहीं जैसे प्रभाष जी किया करते थे। लिखना चलता रहेगा। लिखने वाले दूसरे आ जाएंगे लेकिन कभी खुशियों की अंतहीन ऊंचाई पर ले जाने वाली तो कभी आंसुओं में डुबोने वाली लेखनी तो बंद हो गयी ना! अब पत्रकारिता में शायद ही वैसे नए अनगढ़ शब्द आएं और देसी अंदाज में भाषा प्रवाह दिखे। शब्द शायद ही भावनाओं के सारथी बन पाएं क्योंकि उन शब्दों को सही मूल्य देने वाला नहीं रहा। यह कमी ना जाने कितने अरसे तक एक टीस पैदा करेगी। कब तक एक विचलन मन में समाया रहेगा कि अब इतवार को नींद खुलते ही जनसत्ता का छठा पेज देखने की आकुलता बेमानी हो गयी है। जिस कारेपन से कागद खुद को धन्य मान लेता होगा, कागद का वह टुकड़ा भी बहुत दिनों तक अपने कलमघसीट की याद में रोता रहेगा और उसके आंसू हर इतवार को पाठकों के आंखों में जब्त होते रहेंगे।

कुछ समय पहले कहीं पढ़ा था कि प्रभाष जी ने 75 की उम्र में लिखना-पढ़ना बंद करने की बात की थी। 2012 की जुलाई में वह 75 साल के होते। उसके बाद नहीं लिखते। जब पढ़ा था तो लगा कि ऐसे कैसे नहीं लिखेंगे। पाठक तो उन्हें चिठ्ठी लिखकर, फोन करके, मिलने पर हठी आग्रह के जरिये कहेंगे कि आपको तो लिखना ही पड़ेगा। किसी शराबी को भी शराब का वो चस्का नहीं लगता, जो आपके पढ़ने वाले को आपका लिखा पढ़कर लग गया है। आप उसे कैसे बंद कर देंगे? या तो बता दीजिए कि है कोई दूसरा प्रभाष जोशी, जो उसी पटरी पर पाठकों को ले जा सके? है कोई, जो सत्ता प्रतिष्ठानों के कान में पूरी तुर्सी से यह कह सके कि आखिरी आदमी का ख्याल नहीं रखोगे तो जिन हाथों ने तुम्हारा राजतिलक किया है, वही तुम्हारा सर कलम भी कर देंगे? है कोई, जो खुद की आत्मा को 20 रुपया रोज कमाने वाले 84 करोड़ भारतीयों की पीड़ा में आत्मसात कर दे और वह दर्द ही कागद को कारा करता रहे? अगर नहीं तो आप अपने लेखन धर्म से हट नहीं सकते। लेकिन मौत कहां दुबकी खड़ी हो, किसे पता होता है। 5-6 नवंबर की आधी रात को उस मौत ने एक झटके में भारतीय पत्रकारिता को अभिभावक-हीन बना दिया। जब पत्रकारिता दुर्योधन की तरह बेलगाम और स्व-केंद्रित हो रही हो, उस समय प्रभाष जी कर्ण की तरह पत्रकारिता के साथ खड़े थे, जो अपने दोस्त का साथ तो नहीं छोड़ सकता लेकिन मित्र की गलतियां उसमें कसमसाहट और बेचैनी पैदा करती हैं।

1994 में जब मायावती ने गांधी को शैतान की औलाद कहा था, तब प्रभाष जी ने जनसत्ता के पहले पेज पर एक करारा संपादकीय लिखा था। उस संपादकीय को पढ़ना ऐसा था, मानो हमारी उद्वेलित भावनाओं और आक्रोशित तेवर को किसी ने खूबसूरत शब्दों में ढाल दिया है। तब से कभी ऐसा नहीं हुआ होगा, जब प्रभाष जी का लिखा ना पढ़ा हो। पत्रकारिता में आने के बाद यह खुशी हुई कि उनसे मिलना हो सकेगा और गांधी पर बात भी। उन्हीं दिनों किसी सज्जन ने कहा कि प्रभाष जोशी बेहद अहंकारी किस्म के व्यक्ति हैं, मिलोगे तो निराश होओगे। सोचा कि मिल तो लें, अगर वैसा भी है तो यह पर्दा जितनी जल्द हटे, उतना बेहतर होगा।

उससे पहले 1995 में पत्रकारिता पर एक गोष्ठी को संबोधित करने के लिए वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आए हुए थे। तब मैं हिंदू विश्वविद्यालय का ही छात्र था और मालवीय भवन में उन्हें सुना था। मेरे कई दोस्तों ने जाकर उनसे मुलाकात की थी लेकिन अपने संकोची स्वभाव की वजह से नहीं मिल पाया। लेकिन देशबंधु अखबार में काम करते हुए अक्षर-पर्व पत्रिका में उनके इंटरव्यू के लिए पहली बार उनसे मिलना हुआ। दिमाग में उस सज्जन की बात घर कर गयी थी कि अहंकारी हैं प्रभाष जोशी। दिल्ली में अपने ब्यूरो चीफ विनोद वर्मा के साथ निर्माण विहार वाले घर पर उनसे मुलाकात हुई। चाय-पानी के बाद मुद्दे पर बात हुई। फिर चलने से पहले मैंने उनसे कहा कि गांधी पर आपसे कुछ जानना-सुनना है। उन्होंने कहा कि पंडित, जब मन करे, आ जाना।

अखबार में था तो अक्सर मुलाकात होती थी और उनसे गांधी और राजनीति पर ही बात होती थी। तब क्रिकेट में अपनी दिलचस्पी थी नहीं और वे इतना क्रिकेट जानते थे कि उसके बारे में बात करना बेमानी होता। लेकिन टीवी की दुनिया में ऐसे फंसे कि फिर मुलाकात नहीं हो पायी। आखिरी बार साढे चार साल पहले तीन-मूर्ति भवन के सामने मिले थे। राम बहादुर जी की एक किताब का विमोचन होना था, जो चंद्रशेखर की अस्वस्थता की वजह से स्थगित हो गया था। प्रणाम किया तो बोले- पंडित, तुम तो मिलते ही नहीं। चुप रहने के अलावा मैं क्या कहता। मन में रहीम का ये दोहा ही दुहरा सकता था कि रहिमन इस संसार में, मुश्किल दोऊ काम, सीधे से जग मिले नहीं, उल्टे मिलें न राम। हमेशा सोचता रहा कि मिलेंगे-मिलेंगे लेकिन अब जब वो नहीं हैं तो खुद पर खीजने, गुस्सा होने और अपने काहिलपन को गरियाने के सिवा बचता क्या है?

यह हकीकत इसलिए और कड़वी हो जाती है कि उसकी बुनियाद एक मीठा सपना है। सुनने में आया था कि वह हिंद स्वराज पर कुछ लिख रहे हैं। साथ ही अपनी आत्मकथा भी। अब गांधी और हिंद स्वराज की प्रभाष जी से अच्छी व्याख्या कौन कर सकता था? आखिर पत्रकारिता के वह गांधी ही तो थे। जो इतना विनम्र कि आज से दस साल पहले हमारे जैसे पत्रकारिता के नए-नए रंगरूटों से गांधी पर बात करते थे और स्वाभिमानी इतने कि प्रधानमंत्री तक उनकी कलम की धार में बह जाते थे। लेकिन अब यह तो अफसोस ही रहेगा कि ना तो प्रभाष जी के शब्दों में हिंद स्वराज की व्याख्या पढ़ने को मिलेगी, ना ही उनकी जिंदगी की कहानी, जो जंगल के बीहड़ों और गांवों की दुर्दशा से गुजरते हुए राजधानी दिल्ली के मखमली सपनों की कड़वी हकीकतों से हमें रूबरू कराती।

पिछले कुछ दिनों में प्रभाष जी पर बहुत उंगली उठी। उन्हें जातिवादी तक करार दे दिया गया। लेकिन लिखने-बोलने-कहने वालों ने कभी प्रभाष जी को समझा ही नहीं या कहें कि उन लोगों ने प्रभाष जी को पढ़ा ही नहीं। बिस्मिल्लाह खान के मरने पर प्रभाष जी ने कागद कारे किया था कि किसी अमेरिकी कंपनी ने बिस्मिल्लाह खान को अमेरिका में बसने का न्यौता दिया था। वह कंपनी जानती थी कि बिस्मिल्लाह खान को काशी से अद्भुत प्यार है। लिहाजा उसने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि अमेरिका में उनके लिए बनारस के उनके घर की तरह ही घर बनाया जाएगा और पूरा माहौल बनारस सरीखा ही रहेगा। तब बिस्मिल्लाह खान ने पूछा कि मियां, गंगा कहां से बहाओगे। उस कंपनी वाले की बोलती बंद हो गयी। प्रभाष जी ने सरकार को भी कोसा कि अपने परिवार के भरण पोषण के लिए अगर बिस्मिल्लाह खान ने एक पेट्रोल पंप की मांग कर दी तो उन्हें लालची कहा जाने लगा। आखिर बिस्मिल्लाह खान पंडित रविशंकर तो हैं नहीं जो सरकार को धमकाते कि दिल्ली के पॉश इलाके में जमीन नहीं मिली तो वह हिंदुस्तान नहीं आएंगे। प्रभाष जी के लिए अपनी मिट्टी और अपना देश ज्यादा प्रिय था। तभी तो बिस्मिल्लाह खान उनके थे, स्वजातीय एनआरआई पंडित रविशंकर नहीं। बिस्मिल्लाह को गंगा प्यारी थीं और प्रभाष जी को नर्मदा। देश के सपूत देश की मिट्टी-पानी में खप गये।

क्रिकेट उनकी सांस भी थी और कमजोरी भी। सचिन उनके पसंदीदा खिलाड़ी थे और सचिन का हर शतक प्रभाष जी में बच्चों वाला उत्साह भर देता था। लेकिन यह हमारी बदनसीबी ही है कि सौ साल जीवन की कामना वाले इस देश में खुद प्रभाष जी 72 पर ही आउट हो गये। हिंद स्वराज की व्याख्या की बात करते करते हिंद स्वराज के सौंवे साल में दुनिया छोड़ दी लेकिन अपनी जिंदगी के बाकी 28 रन छोड़कर आप क्यों चल दिये? इतनी जल्दी क्यों कर दी प्रभाष जी?

Last 5 posts by विचित्र मणि

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Posted by on Nov 11 2009. Filed under स्पेशल रिपोर्ट. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

1 Comment for “इतनी जल्दी क्यों कर दी, प्रभाष जी?”

  1. कुमार राकेश

    प्रभाष जोशी की तारीफ में जो लोग भी लिख रहे हैं क्या उनमें से ज़्यादातर ने यह फैसला कर लिया है कि इसी बहाने उनकी आलोचना करने वालों को भी निपटा दिया जाए? विचित्र जी, बिस्मिल्लाह की तारीफ़ करने का यह मतलब नहीं कि कोई जातिवादी नहीं हो सकता। अगर तारीफ़ करना और नहीं करना ही जातिवाद का प्रमाण है तब तो प्रभाष जोशी बहुत बड़े जातिवादी थे। क्योंकि वो हर वक़्त सचिन तेंदुलकर, गावस्कर, गांधी-नेहरू परिवार की तारीफ किया करते थे। यही नहीं मृत्यु से चंद हफ्ते पहले उन्होंने शीला दीक्षित के बचाव में भी कागद कारे किए थे। आखिरी कागद कारे उन्होंने इंदिरा गांधी पर लिखा था और उनकी तारीफ में लिखा था। यहां यह भी ध्यान रखिएगा कि प्रभाष जोशी इंदिरा गांधी को ब्राह्मणवादी समुदाय में रखते थे। उनका इंटरव्यू पढ़ा है न आपने? इसलिए आप लोगों से गुजारिश है कि इन संकीर्ण नज़रियों का त्याग करें और सोच में थोड़ी व्यापकता लाएं।

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