क्या “नागपुर ब्रदर्स” बीजेपी की दिशा और दशा बदल पायेंगे?
‘आई एम कमिटेड टू कन्स्ट्रक्शन..’ बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी के ये शब्द सुनकर मीडियाकर्मी एक पल के लिए अवाक रह गए। अध्यक्ष बनने के बाद अपनी पहली प्रेस वार्ता में गडकरी से पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल पूछा गया था। इस सवाल के पूछे जाने से पहले गडकरी कई बार अपनी पीठ ठोंक चुके थे कि वो जब महाराष्ट्र के पीडब्लूडी मिनिस्टर थे तो उन्होंने कितने झंडे गाड़े थे। गडकरी के ‘स्लिप ऑफ द टंग’ से मंच पर उनके साथ बैठे पार्टी सहयोगी रवि शंकर प्रसाद और प्रकाश जावड़ेकर भावहीन, शून्य में ताकते रहे। क्योंकि गडकरी के साथ वो भी टीवी चैनलों के कैमरे के फ्रेम में थे। इसलिए चेहरे की हर क्रीज पर कैमरे की नज़र थी। बहरहाल गडकरी ने अपने आप को संभाला और पत्रकार का जवाब दिया।
लेकिन एक घंटे चली अपनी पहली प्रेस वार्ता में गडकरी उन सवालों का जवाब देने से बचते रहे जो सवाल पार्टी और कार्यकर्ताओं को पिछले कुछ महीनों से सताते रहे हैं। सबसे पहले विचारधारा की बात। गडकरी ने कहा विचारधारा वही पुरानी है। चेहरे बदलने से विचारधारा नहीं बदलती। मगर जब सवाल अयोध्या में मंदिर निर्माण का आया तो टाल गए। ‘हिंदुत्व’ के सबसे बड़े सिंबल मंदिर मुद्दे पर मायूसी झलकी। कह दिया नए हैं इसलिए ऐसे गंभीर मुद्दों पर सोचने के लिए वक़्त चाहिए। इस मुद्दे पर पुरानी लाइन पर ही चलेंगे ये कहते झिझके। शायद अब पार्टी की इस मुद्दे पर कोई लाइन ही नहीं बची। पार्टी के ‘सेक्यूलर’ नेताओं ने वो लाइन मिटा दी है।
प्रेस वार्ता शुरू होते ही गडकरी ने एलान किया कि अटल बिहारी वाजपेयी उनके रोल मॉडल हैं। अगर वाजपेयी रोल मॉडल हैं तो उनकी तर्ज पर गडकरी की बीजेपी क्या ‘हिंदुत्व’ के मॉ़डरेट एजेंडे पर चलेगी। और अगर ऐसा है तो संघ के एजेंडे का क्या। ये कुहासा बनाए रखना गडकरी की स्ट्रैटिजी थी या मजबूरी।
अपनी स्पीच में पार्टी में बढ़ती अनुशासनहीनता पर कोई टिप्पणी नहीं की। पत्रकारों ने इस मुद्दे पर बिना लाग-लपेट के सवाल दागा। नाम लेकर मिसाल दीं। सवाल सीधा था इसलिए ज़्यादा गोल-मोल नहीं कर पाए। कहा पार्टी अनुशासन सब को मानना होगा। सवाल आया कि झारखंड में पार्टी का परफॉर्मेन्स खराब क्यों रहा। गडकरी चुप। झारखंड में सरकार बनाने का ‘कन्विक्शन’ और पार्टी चलाने की ‘स्ट्रैटिजी’ में फर्क कर गए। यानी सरकार बनती दिखी तो जैसे तैसे जरूर बनायेंगे।
गडकरी जिस मंच से प्रेस कांफ्रेन्स सम्बोधित कर रहे थे उसके पीछे पार्टी का बड़ा सा बिलबोर्ड टंगा था। जिसमें वाजपेयी और आडवाणी के अलावा गडकरी भी हंसते दिखे। इन फोटो के भी ऊपर दीन दयाल उपाध्याय का विचार लिखा था कि कतार में खड़े आखिरी आदमी तक विकास पहुंचे। बिलबोर्ड पर नीचे बायीं तरफ अंग्रेजी में दीन दयाल उपाध्याय का दूसरा स्लोगन अंग्रेजी में लिखा था – नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्सट, सेल्फ लास्ट (राष्ट्र सर्वप्रथम, फिर पार्टी और व्यक्ति आखिर में)। लेकिन पत्रकारों को पार्टी की तरफ से जो साहित्य थमाया गया उसमें दो किताबों में गडकरी का गुणगान था, पार्टी का कम। उस बैग में नए साल की डायरी भी थी जिसपर सुनहरे अक्षरों में नितिन गडकरी लिखा था। यानी झोले में गडकरी की धूम थी। एक चमकती हुई कलरफुल बाइंड की हुई किताब में गडकरी के उन दिनों की फोटो थी जब वो महाराष्ट्र में पीडब्लूडी मंत्री थे। सड़क पर खड़े अधिकारियों को समझाते हुए, बालासाहेब को अपना कामकाज दिखाते हुए थे। हर पोज में गडकरी दिखे। उसी झोले में एक पेन भी था लेकिन उसपर गडकरी जी का नाम खुदवाना शायद उनके पब्लिसिटी सहयोगी भूल गए थे। वैसे गडकरी पत्रकारों को बार बार ये कहते नहीं थके कि वो पार्टी के ‘छोटे से कार्यकर्ता हैं।’
गडकरी सिविल इंजीनियर नहीं पर मैनेजमेंट के छात्र रहे हैं। पूछा गया कि हार के बावजूद पार्टी में रिवार्ड दिया जाता है। पत्रकार का संकेत खुद गडकरी की ओर था। महाराष्ट्र इकाई का अध्यक्ष होने के बावजूद राज्य में पार्टी की शर्मनाक हार हुई। फिर भी गडकरी को प्रमोट करके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। ये तो मैनेजमेंट के मूलभूत फलसफे के विरुद्ध है। अपनी झेंप छुपाते हुए गडकरी बोले हार या जीत सबकी सामूहिक जिम्मेदारी होती है। वैसे ये बताना नहीं भूले कि हाल ही में नागपुर के मेयर पद के चुनाव में उनकी कार्यकुशलता की वजह से ही पार्टी उम्मीदवार की जीत हुई। दावे में आत्मविश्वास झलक रहा था। जो नहीं कह पाए वो ये कि अगर महाराष्ट्र में जीत कर पार्टी प्रेसिडेंट बनते तो 2014 के चुनाव में संघ इन्हीं को बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री उम्मीदवार तय करता। वैसे ऑन रिकार्ड ये कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते वो चुनाव नहीं लड़ेंगे। यानी जो अब तक नहीं किया है उससे आगे भी परहेज करेंगे।
पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बाद भी गडकरी का नागपुर प्रेम कुलांचे मारता बाहर आता रहा। मंच से ही बार-बार पत्रकारों को नागपुर आने का न्योता दिया। शान से बताया कैसे नागपुर में उनका एक एनजीओ आत्महत्या करने वाले किसानों की 500 विधवाओं के लिए काम कर रहा है। पिछले पांच साल में जब गडकरी महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष थे तो दस हज़ार से ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या की। न राज्य सरकार के पास कर्ज में डूबे किसानों को उबारने की कोई ठोस नीति थी न ही बीजेपी सरीखी विपक्षी पार्टियों के पास इस समस्या का कोई हल। विदर्भ ( जो गडकरी का वैचारिक, संगठनात्मक और राजनीतिक होम टर्फ है) में केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने फिर चुनावी पासा फेंका और कर्ज माफी का एलान किया। विपक्षी दल ये भी दावा नहीं कर पाए कि सरकार को उनकी मांग के आगे झुकना पड़ा।
वैसे झुक कर आशीर्वाद लेने को गडकरी चाटुकारिता मानते हैं। गडकरी ने बड़े कड़े स्वर में कहा उन्हें यूं पार्टी कार्यकर्ताओं का पैर छूना पसंद नहीं। वो इसे चाटुकारिता मानते हैं। ‘श्रद्धा तो दिल से होती है”, वे बोले। यानी अध्यक्ष बनने पर जो सुषमा स्वराज, आडवाणी, राजनाथ के पांव छूकर आशीर्वाद लिया वो दिल से लिया। अब गडकरी हनुमान होते तो कार्यकर्ताओं को दिल चीर कर प्रमाण देते।
पास ही दूसरे तंबू के नीचे पत्रकारों के लिए भोजन की व्यवस्था थी। प्रेस वार्ता खत्म होते ही गडकरी के सहयोगी उधर लपके। पत्रकार खाने की प्लेट उठाते इससे पहले उन्होंने सवाल दागा – क्या लगा? कैसा बोले? बढ़िया बोले न? जैसे पार्टी का पोलिंग एजेंट हर बूथ पर जाकर पार्टी वोटरों की संख्या भांपने की कोशिश करता है। शराफत में पत्रकार नकारत्मक जवाब नहीं दे पाए। कुछ मुंहलगे पत्रकार ये कहने से नहीं चूके कि गडकरी पहला राउंड जीत गए हैं।

प्रभात शुंगलू
((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))
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सच कहा आपने। अब बीजेपी का भविष्य और अंधेरे में है। पिछले चार साल में आडवाणी और राजनाथ की जोड़ी ने बीजेपी की लुटिया डुबो दी और रही सही कसर ये नागपुर ब्रदर्स पूरा कर देंगे।