माया का नया मंत्र – विश करो, ज़िद करो
उनके साथ ब्लैक कैट रक्षक क्या कम थे कि मायावती ने अपनी मूर्तियों की सुरक्षा के लिये भी ‘रक्षक’ ढूंढ़ने की ठान ली। स्पेशल ज़ोन सिक्यूरिटी फोर्स बिल विधानसभा में पेश हो चुका है। बीएसपी का दोनों सदनों में बहुमत है। इसलिए बिल आसानी से पास भी हो जाएगा। सदन में बिल पर चर्चा तो बस फॉर्मेलिटी भर है। बिल के दायरे में 13 मॉल एवेन्यू भी है जहां मायावती खुद रहती हैं। मूर्तियों में जान फूंक दी जाए तो वो भगवान का दर्जा पा लेती है। लेकिन माया तो खुद देवी हैं जिनके एक इशारे पर पूरा सरकारी तंत्र उनकी और उनकी मूर्तियों की सेवा में दिन-रात एक कर सकता है। उनका रक्षक बन सकता है।
ये स्पेशल फोर्स बनी तो अब तक के किसी भी क्रांतिकारी दलित नेता का दलितों के उत्थान के लिए सबसे महत्वपूर्ण योगदान होगा। मान्यवर कांशीराम भी अपने जीवनकाल में ये नहीं कर पाए। खामखा पंजाब से लेकर महाराष्ट्र तक गांव-गांव,शहर-दर-शहर भटकते रहे। दलित-शोषित समाज को एकजुट करते रहे। उनकी आवाज़ बने। उन्हें सत्ता की कुंजी हथियाने के गुर सिखाते रहे। उनकी किस्मत के शिल्पकार बने। लेकिन उनकी सबसे चहेती शिष्या ने उनकी हर सोच की मूल भावना को मन में उतार लिया। इसलिए कांशीराम के साथ-साथ अपनी और लगे हाथों बाबा साहेब की भी विशाल मूर्तियों की शिल्पकारी करने का हुक्म दे दिया।
मुगल आए तो उन्होंने प्रजा की सुविधा के लिए पोखर, कुएं, तालाब खुदवाए। सराय बनवायीं। मंदिर-मस्जिद बनवाए। इमामबाड़े बनवाए। लखनऊ के बड़े इमाम बाड़े का इतिहास बड़ा दिलचस्प है। बड़ा इमामबाड़ा नवाब आसफ-उद-दौला ने 19वीं शताब्दी में तब बनवाया जब अवध का इलाका अकाल की चपेट में था। अमीर-गरीब, समाज के हर तबके की जीविका जाती रही। अनाज और खाने के लाले पड़ गए। बड़े इमामबाड़े का प्रोजेक्ट शुरू हुआ तो अकाल पीड़ितों को काम मिला। वो दिन भर ढांचा खड़ा करते। रात में वो ढांचा गिरा दिया जाता क्योंकि जो सम्मानित लोग थे उन्हें कोई दूसरा काम नहीं आता था। इसलिए उन्हें रोज़ ढांचा गिराने का मेहनताना दिया जाता। कहते हैं ये प्रोजेक्ट अगले दस साल तक चला जब तक कि इलाके से सूखे का असर पूरी तरह ख़त्म नहीं हो गया।
एक जमाने में हिंदुस्तान के सम्राट अकबर ने जज़िया कर माफ़ कर दिया था। लेकिन अवध की नई चौधराइन मायावती अपनी प्रजा पर जज़िया ठोंकने पर तुली हैं। मायावती ने ढाई हज़ार करोड़ की लागत से लखनऊ और नोएडा में बाबासाहेब आम्बेडकर, कांशीराम और खुद अपनी मूर्तियां खड़ी करके पार्क और स्मृति-वन बनवाए। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया। ज़ाहिर है मायावती को ये अंतरिम आदेश नागवार गुज़रा होगा। चुनांचे उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट को भी ठेंगा दिखाते हुए मूर्तियों की सुरक्षा के लिए नया पुलिस बल गठित करने का मन बनाया और सदन में बिल पेश करके उसे बाकायदा कानूनी जामा पहनाने की ठान ली। पहले मूर्तियां बनवाने का खर्चा और अब इन मूर्तियों की सुरक्षा के लिए स्पेशल फोर्स खड़ा करने का खर्च और उसे चलाने के लिए जो साल-दर-साल सैकड़ों करोड़ का खर्चा आयेगा सो अलग। ज़ाहिर है ये सारा खर्च उस सरकारी खज़ाने से जायेगा जिसे उस गरीब प्रदेश की जनता ने अपने खून-पसीने से सींच कर भरा ताकि उनकी मूलभूत सुविधाओं से उन्हें बेदखल न किया जाए। यानी मंदिर मायावती का होगा और जज़िया आम आदमी देगा। मुगलीय जज़िया के मुकाबले फर्क ये होगा कि ये जज़िया प्रदेश के किसी खास वर्ग या समुदाय पर नहीं बल्कि हर नागरिक पर लागू होगा। मायावती ने इसमें कोई भेदभाव नहीं किया है।
बड़ा इमामबाड़ा और रूमी दरवाज़े की शानो-शौकत के लिये मशहूर लखनऊ में स्मारक, पार्क और स्मृति-वन दलित आस्था और शानो-शौकत के नए केन्द्र होंगे। इन्हें दलित गौरव के नए मंदिर के रूप में पैकेज करके भोली-भाली जनता के बीच मार्केट किया जाएगा। जिसकी ओर कोई आंख भी तरेरेगा तो उसकी खैर नहीं। बिल में एक पोटा टाइप प्रावधान है कि स्पेशल ज़ोन सिक्यूरिटी फोर्स का ‘रक्षक’ चाहेगा तो किसी संदिग्ध व्यक्ति को बिना वारंट भी अरेस्ट कर सकता है। बस उसे ये लगना चाहिए कि वो शख्स मूर्ति को क्षति पहुंचाने के इरादे से ही इलाके के आस-पास घूम रहा है। ये एलीट पुलिस बल सिर्फ उन्हीं स्मारकों की सुरक्षा करेंगे जो स्मारक सुश्री मायावती ने बनवाए हैं। बिल में उन स्मारकों की लिस्ट दी हुई है जिनके लिए विशेषकर ये बल गठित किया जायेगा।
मायावती ने अपने पुराने कार्यकाल में इसी तरह का प्रशासनिक फैसला लिया था। दलितों के स्मारकों की सुरक्षा के लिए बाकायदा अलग से विभाग बनाया गया। मगर मुलायम सिंह यादव जब सत्ता में आए तो उन्होंने इस प्रशासनिक फैसले को रद्दकर दिया। इस बार सदन में मायावती का बहुमत है इसलिए मायावती अब इसे कानूनी जामा पहनाकर अपनी ज़िद पूरी करना चाहती हैं।

प्रभात शुंगलू
((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))
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अंधेर नगरी, चौपट राजा ! प्रभात साहब, उत्तर प्रदेश में शराब की बोतलों पर प्रति बोतल ५ रूपये से २५ रूपये तक प्रिंटेड रेट (MRP) के अतिरिक्त वसूले जाते है, मगर यह पैसा जाता कहाँ है, मैं आज तक नहीं मालूम कर पाया ! एक बार गाजियाबाद में यही मुद्दा जब एक सराब वाले से मैंने उठाया तो उसका टका सा जबाब था – “भैण के खाते में” !