हीरो जीता, विलेन हारा

ठाकरे जी,

आपको ब्रेकिंग न्यूज दे दें। आप तो “माई नेम इज़ ख़ान” देखने नहीं गए। लेकिन महाशिवरात्रि के दिन जो दर्शक आपके ‘शिवसैनिकों’ का घेरा तोड़कर मल्टीप्लेक्सेज़ में फिल्म देखने गया उसने फिल्म देखते देखते ताली पीटी। आप पूछेंगे कि इसमे कौन सी नई बात है। अपने हीरो को देखकर तो दर्शक ताली और सीटी बजाता ही है। लेकिन फिल्म देख रहे हमारे साथी ने अलग रिपोर्ट दी। सोचा आप को भी कन्वे कर दूं। मेरे साथी ने बताया कि फिल्म के इंटरवेल में दर्शकों ने तालियां पीटीं। और वो इसलिये कि उन्हें ये एहसास हुआ कि उन्होंने क्या अचीव (हासिल) किया है। उन्हें एहसास हुआ कि कैसे आपके तालिबानी हुक्म की धज्जियां उड़ाते, आपकी लुम्पेन बानर सेना को ठेंगा दिखाते हुए, अपने इंडियननेस पर भरोसा रखते हुए, आपकी स्यूडो (छद्म) भारतीयता बेनकाब करते हुए, उन्होंने वो कर दिखाया जो आप हर हाल में रोकना चाहते थे।

पब्लिक की नब्ज पहचाने का ये दूसरा मौका था। इससे पहले पिछले साल मई में भी आपने पब्लिक की नब्ज़, उसके दिल की धड़कन समझने की कोशिश की। लेकिन पब्लिक ने शिवसेना रूपी डॉक्टर को झोला-छाप बताकर रिजेक्ट कर दिया था। तब पब्लिक ने साफ संदेश दिया था कि उसे मॉडर्न डॉक्टर पसंद है। जो प्रदेश की बीमारी का सही-सही पता लगाए, उसका सही इलाज करे, खुदकुशी कर रहे किसानों के परिवार और उनके मन-मस्तिष्क के घावों को जल्दी धोए, उस पर तरक्की और विकास का टिंक्चर डालें ताकि कभी कोई बीमारी उसके आस-पास न फटके। आपके पास वही पुड़िया वाली दवाई निकली। जो राह चलते तंबू ताने खानाबदोश अपनी रोज़ी-रोटी के लिए बेचा करते हैं। जिसके पास इलाज तो हर मर्ज का होता है मगर उसकी दवाई खा लो तो दो-चार बीमारियां वो भी गले पड़े जाएंगी जो उसके पुश्तों को भी कभी नहीं हुई। आप लाख दवाइयां बेचते रहे लेकिन वोटर-रूपी खरीददार किसी और दुकान पहुंच चुका था।

मौका तो था आत्म-चिंतन का। अपनी हार का कारण ढूंढ़ने का। अपनी खामियों से सबक लेने का। उन खामियों को दूर करते हुए नई रणनीति तैयार करने का। लोगों के बीच फिर से सुपरहिट होने का फॉर्मूला तलाशने का। बीती ताही बिसार के आगे की सुध लेने का। लेकिन आपने आत्म-चिंतन का तरीका ढूंढ़ा वो भी बासी निकला। आप फिर से मुंबईकर बन गए। अपनी पहचान मुंबई फॉर मराठी के नारे में समेट के रख ली। फिर आपके सैनिक जगह-जगह तांडव करने लगे। हार की खुन्नस आप किसी न किसी तरह हर उस मराठी, गैर-मराठी, गैर-ठाकरेआइट मराठी, गैर-शिवसेना मराठी, मराठी मुस्लिम, इंडियन मुस्लिम, गैर-मराठी मुस्लिम, जुहू-विले पार्ले टाइप बॉलीवुड के ज़रिए पूरे विश्व में धूम मचाने वाले गैर-मराठी, मराठी सपोर्टिंग गैर-मराठी पर उतारने का बहाना ढूंढ़ने लगे। फिर पिच खोदने की धमकी देने लगे। फिर खेल की भावना की गरिमा भंग की। यानी अपनी औकात दिखा दी।

शाहरुख़ ने कुछ भी नहीं कहा होता तब भी शायद आप फिल्म के विरोध का कोई न कोई बहाना ढूंढ़ लेते। क्योंकि पब्लिक को समझने का जो स्टेथेस्कोप गले में डाले आप और आप के सुपुत्र घूम रहे हैं उस आला मशीन में तो अब जंग लग चुका है। वो ठीक से दिल की धड़कन नहीं सुन पा रही। इसलिए उसकी गति नहीं पकड़ पा रही। यही कारण है आप जब उसे बीमार कहते हैं तो वो आप पर हंसती है कि कहीं आप तो बीमार नहीं। कहीं आप सिज़ोफ्रेनिया के शिकार तो नहीं जहां इंसान को अपनी छाया से भी डर लगता है। आपको लगता है आप मुंबई के किंग है। लेकिन सत्या के भीखू म्हात्रे की तरह समुद्र की उस चट्टान पर खड़े चिल्ला रहे हैं जहां आपकी आवाज़ समुद्र की लहरें ही सुनती हैं और किनारे पर आकर आपको वो लौटा देती है।

वैसे अब तो आपकी आवाज़ वो भी नहीं सुन रहे जिनपर आपको सिर्फ़ इसलिए फख्र है कि वो मराठी हैं। वैसे पूरे देश को उसपर इसलिए भी फख्र है कि वो देश की शान है। वो धुरंधर बल्लेबाज़ है। उसका लोहा पूरी दुनिया मानती है। वो कोलकाता से चेन्नई तक वैसे ही लोकप्रिय है जैसा वो मुंबई में है। लेकिन आपको अब वो भी खटकता है। दिलचस्प है कि आप को अब पूरा हिंदुस्तान खटकने लगा है। मुकेश अंबानी हों, यूपी-बिहार के भइया हों, सचिन हों या शाहरुख। आप को ये लोग विकास के मॉडल नहीं दिखते। आपकी नज़रों में महाराष्ट्र के विकास का मॉडल तो ‘शिव-पाव’ है।

क्या सारे मुंबईकर नौकरी के लिए वड़ा-पाव की दुकान खोलेंगे। तो फिर दूध कौन बेचेगा, टैक्सी कौन चलाएगा, इंडस्ट्री कौन लगाएगा, फिल्में बनाकर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से भारत के लिए डॉलर कौन कमाएगा, मिलें कौन चलाएगा, कंस्ट्रक्शन के लिये लेबर कहां से आएंगे। क्योंकि ये सारे काम करने वाले ज्यादातर लोग गैर-मराठी हैं। यूपीआइट, बिहारी, गुजराती, बंगाली, उड़िया, पारसी हैं। लेकिन ये सब लोग आप को खटकते हैं। जो आपको नहीं खटकता वो आपके चहते भतीजे राज को खटकने लगता है। आपके भतीजे तो अपना सरीखा मराठिस्तान बनाने के भी ख्वाब देख रहे हैं। आशा करता हूं कि उनके सरीखे ‘मराठिस्तान’ में आप, आपके सुपुत्र और आपके भतीजे मिल कर कंधे से कंधा मिला कर काम करेंगे। क्योंकि महाराष्ट्र की तरक्की का सपना देखने का हक़ केवल ठाकरे परिवार को ही है। अपनी नई सरज़मीन पर ‘शिव-पाव’ इकलौता टूरिस्ट अट्रैक्शन होगा। शाम को गेटवे ऑफ इंडिया पर लाइट एंड साउंड शो के ज़रिये शिव सेना और मनसे के म्यूज़ियम की झलकियां दिखाई जाएगी। इस शो का नाम होगा “डर – माई नेम इज़ ठाकरे”। ये शो केवल विदेशी सैलानियों के लिए होगा। क्योंकि मराठी मानूस तो ये सब लाइव देख ही चुका है।

प्रभात शुंगलू

प्रभात शुंगलू

सपना देखना कतई ग़लत नहीं है। लेकिन सपने और हकीकत में फर्क होता है। और हकीकत ये है कि आम मुंबईकर ने शिवरात्रि के रोज़ उस डर को जीत लिया। वो गए तो थे फिल्म में अपने हीरो को देखने। लेकिन फिल्म देखने गए ये लोग ही इंडिया के असली हीरो हैं। फिल्म देखकर उन्होंने पूरे हिंदुस्तान को यही मैसेज दिया – अपने अंदर के डर को पहचानो। वो तुम्हारा सबसे बड़ा विलेन है। उसे अपने सिस्टम से बाहर निकाल फेंको। और अपनी तरक्की का मॉडल खुद तैयार करो।

फ़कत
एक इंडियन

((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))

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Posted by on Feb 14 2010. Filed under रागरंग, सिनेमा. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

8 Comments for “हीरो जीता, विलेन हारा”

  1. रंगनाथ सिंह

    बढ़िया और मजेदार।

  2. अरविंद शेष

    इस देश में कांग्रेस की राजनीति जिस दिन लोगों को समझ में आने लगेगी, उस दिन सारे विलेनों से मुक्ति मिल जाएगी। फिलहाल कांग्रेस जैसे चाह रही है, देश को नचा रही है।

  3. Chinmay

    साहब … ज़रा इन तथ्यों पर नज़र डालने की कृपा करें

    १). इस फिल्म का पहले दिन का कलेक्शन १००% बताया गया है लेकिन आप बॉलीवुड हंगामा या ग्लमशम जैसी फिल्म वेबसाइट देखें इसका पहले दिन का बॉक्स ऑफीस कलेक्शन मौजूद ही नही है. सच्चाई तो यह है कि शुक्रवार को शिवरात्रि की छुट्टी के बावजूद इसका कलेक्शन बमुश्क़िल ४०-४५% सदी है , जो किसी भी ख़ान फिल्म के लिहाज़ से काफ़ी खराब प्रदर्शन है.

    २). यह फिल्म मुंबई में सभी सिनेमाघरों द्वारा दिखाए जाने का दावा किया जाता है , इस दावे की सच्चाई जानने के लिए मैने ऑनलाइन और फोन द्वारा बुकिंग करनी चाही — पता लगा यह फिल्म कुछ सिनेमाघरों को छोड़ कर कहीं भी दिखाई नही जा रही.

    ३). पुणे औरंगाबाद और नासिक जैसे महाराष्ट्र के बड़े शहरों में यह न कल दिखाई गयी और न आज , बात की सच्चाई जानने के लिए आप खुद बिग सिनिमा और आई नॉक्स की वेबसाइट चेक करें .

    ४). फिल्म का म्यूज़िक पहले ही फ्लॉप हो चुका है. शंकर एहसान और लॉय जैसे मंझे हुए संगीतकारों के होते हुए भी फिल्म का संगीत कुछ खास नही रहा यही नही भारतीय गायकों के होते हुए फिल्म के प्रमुख गाने , शफाक़त अमानत अली ख़ान , अदनान समी और राहत फ़तेह अली ख़ान जैसे पाकिस्तानी गायकों से गवाए गये हैं जो आम तौर पर शंकर एहसान लॉय के लिए नही गाते.

    ५). फिल्म की पाइरेटेड डि वी डि पहले की बाज़ार में आ चुकी है जिसका प्रिंट पाकिस्तान और गल्फ में तैयार हुआ है. अंदाज़ा है कि पाइरेटेड प्रिंट्स फिल्म के कारोबार बार बुरा असर डालेंगे. फिल्म का संगीत पहले ही songs.pk नाम की पाकिस्तानी वेबसाइट इंटरनेट पर गैर क़ानूनी ढंग से जारी कर चुकी है तथा एफ एम पर इसके गीत पैसे दे कर बार बार बजाए जाते हैं ….. इस वजह से फिल्म का संगीत बाज़ार में खास नही बिका .

    फिर यह फिल्म कैसे हिट हो गयी भैया ? यह सब क्या गोलमाल है? क्या यह पब्लिसिटी स्टंट नहीं? महाराष्ट्र की प्रमुख विपक्षी पार्टी सब काम काज छोड़ कर एक फालतू फिल्म का विरोध क्यूँ करेगी? सरकार ज़रूरी मुद्दों को छोड़ कर एक फिल्म की सक्रीनिंग के लिए पूरे राज्य की पुलिस फोर्स क्यूँ लगाएगी?

  4. मुझे शाहरुख़, ठाकरे या मुंबई से लेना देना नहीं है. पर इंटरनेट पर लगभग सभी दर्शकों की प्रतिक्रिया इस फिल्म को महाबोर महापकाऊ बता रही है. बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पैटर्न बताता है की ‘माय नेम इज़ खान’ सुपरफ्लॉप हो चुकी है. यानि भारत की जनता ने इस फिल्म को सिरे से नकार दिया है, और मीडिया और पेडरिव्यू के विपरीत भारतीय ब्लोगों पर इस फिल्म की अच्छी धुलाई चल रही है.

  5. ramesh

    मैंने आप जैसे समीक्षकों के भरोसे यह फिल्म 500 रुपये खर्च करके देखी. ठाकरे जाये नर्क में लेकिन आप लोग कब ये झूठ बोलना बन्द करोगे? इतनी घटिया बीमार फिल्म मैंने पिछले पांच साल मे नहीं देखी, कुछ तो शर्म करो, बिना फिल्म देखे समीक्षायें लिख देते हो

    ठाकरे और शाहरुख तो विलेन हैं ही, आप लोग भी विलेन हो, हर विलेन जीते, हम जैसे भारतीय हारे, कभी इन्हें पालीटिशियन हराते हैं कभी बिकाऊ पत्रकारों और व्यापारियों का समूह

  6. कुमार राकेश

    इस देश की पब्लिक इतनी चूतिया नहीं जितना की उसे साबित करने की कोशिश हो रही है। अब रमेश जी को लीजिए। इस लेख में कहीं कोई रिव्यू नहीं है, फिर भी इन्हें फासीवादी प्रवृति के खिलाफ इस लेख में फिल्मी समीक्षा नज़र आई और उनके मुताबिक उन्होंने 500 रुपये खर्च करके शाही अंदाज में फिल्म देखी। जबकि दिल्ली जैसी जगहों पर भी दो सौ रुपये में टिकट मिल जाती है।

    ऊपर एक चिन्मय जी हैं। इनकी अकल की भी दाद देनी चाहिए। मसला अभिव्यक्ति की आज़ादी का है। क्रूर और तानाशाह बाल ठाकरे का है। मुंबई का है। और उन्होंने एक लंबा फर्रा फिल्म पर चेप दिया है।

    रमेश, चिन्मनय और ऐसे ab inconvinienti जैसे चंपक किसी भी गंभीर बहस को ग़लत दिशा में मोड़ने की क्षमता रखते हैं। इनसे बचना चाहिए।

    • ruchika

      THE ECONOMIC TIMES 26/03/2009

      MUMBAI: Some former junior employees of Rolta India suddenly find themselves in a jam. Eighty five employees, whose services were terminated or

      who ‘resigned’, are left with the burden of a bank loan. This loan was taken at the company’s behest to pay the enrolment fee for an in-house training programme.

      Rolta India says that the services of 50 employees were terminated for non-performance while 35 employees resigned rather than having their services terminated. Some of the aggrieved former employees told ET that about 150 of them were without a job and struggling to repay the loan of Rs 2.5 lakh.

      As part of its recruitment policy, Rolta India trains all new recruits for three months at Rolta Academy, a division within the company. Each recruit has to pay a ‘non-recourse security deposit’ of Rs 2.5 lakh. Rolta has a strategic arrangement with Union Bank of India to make the amount available as an educational loan.

      The Rolta website says “selected candidates will be given an offer letter, which will be valid for a period of 15 days within which they can organise the deposit from the bank with the help of the company”. The bank disburses the loan directly to Rolta India by way of a pay order/demand draft.

      Rolta would pay the interest on the loan, which also forms part of the employee’s monthly salary, and pay the principal amount to the bank in two instalments of Rs 1.25 lakh each, one after 39 months and the second, 12 months later. If the employee resigns during this period, the company is absolved from paying the loan.
      Former employees, who spoke to ET on condition of anonymity, allege the company created conditions due to which they were forced to resign and there was no prior warning. Some were given as little as 10-14 days to leave the company after being employed for almost close to a year.
      Many of these employees approached Union Bank with a request to reschedule the EMI.

      In response to an email query by ET , senior officials of Rolta said, “the amount in question is not a fee, but a ‘refundable deposit’, to discourage the employee from using the academy as a training ground to merely increase his market value. On the contrary, he/she receives full salary and does not have to worry about repaying the loan and interest, if he/she intends to fulfil the employment obligations.”

      However, the loan agreement with the bank stipulates that whenever a student/employee resigns from Rolta, the entire loan amount will become payable immediately and the bank will have the liberty to take appropriate recovery measures to recover the loan.
      The agreement also categorically absolves the company from paying or remitting the monthly interest or further repayments to the bank. Significantly, the loan given at an annual 12.25%, attracts an additional interest of 2% over and above the stipulated interest rate in the event of a delay or default in payment. An e-mail sent to the bank remained unanswered till the time of going to press.

      Interestingly, most frontline IT companies do not levy any fees for the inhouse training, but many companies do insist on a bond.

  7. Prabhat Shunglu aur Kumar Rakesh ji se sahmat hun. saikdoN filmen aati-jaati rahengi, rahi hain. Publik ki bala se! Mamla Qanoon ko pair ki jooti samajhnewaloN ko samjhane ka tha, hai aur rahega! Thakre, Bukhari, Togadia aapas me ‘first cousin’ hain. Inko janta jab-jahan jaisey dhool chata sakey uska swagat hai. Yeh aam aadmi ka mission hai.
    Khan ki jagah Khanna ho tab bhi, aur ‘My Name Is Khan’ ke bajay ‘Jay Santoshi Ma’ ho tab bhi !

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