मुझे तुम्हारे किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं: विभूति
विभूति नारायण राय दलित विरोधी नहीं हैं। अंकित चोर गुरू नहीं हैं। उनके ख़िलाफ़ यह दुश्मनों की साज़िश है। दलित छात्र राहुल कांबले को नियमों के आधार पर दाखिला नहीं मिला। दलित प्रोफेसर लैला कारुण्यकारा को नोटिस ब्राह्मणों को मां-बहन की गालियां देने की वजह से भेजा गया। विभूति को दलित वादी और धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में चल रही गड़बड़ियों पर उसके कुलपति विभूति नारायण राय के इंटरव्यू का आज दूसरा हिस्सा। इस हिस्से में और भी बहुत कुछ बातें और कुछ बौखहालटें हैं। आप इस इंटरव्यू को पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर
समरेंद्र – राहुल कांबले वाले मामले में क्या हुआ था? उन्हें एडमिशन क्यों नहीं दिया गया।
विभूति – इसलिए कि नियमत: राहुल कांबले का एडमिशन नहीं हो सकता था। यही बात मैं बार-बार कहने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन लोग सुनने को तैयार नहीं। इसमें तो हमने प्रो-वाइस चांसलर की अध्यक्षता में तीन प्रोफेसरों की कमेटी बनाई थी। उसमें एक दलित थे, एक ओबीसी थे और एक जनरल कैटेगरी के थे। हमारे प्रो-वाइस चांसलर मुसलमान हैं तो लिहाजा आप उनसे यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि वो एंटीदलित होंगें। उन चारों लोगों की कमेटी ने इस मामले को पूरा एक्जामिन किया उस कमेटी में कोई एक फैसला नहीं हो पाया तो कमेटी में जो दलित प्रोफेसर थे.. कारुण्यकारा जी, उन्होंने कहा कि एक लीगल राय भी ले लेते हैं। हमने अपने वकील के पास मामला भेज दिया। उनकी भी राय आई की राहुल कांबले का एडमिशन नियमत: नहीं हो सकता।
समरेंद्र - सीट रिजर्व है या नहीं यह फैसला कौन करता है?
विभूति – यह फैसला यूनिवर्सिटी अथॉरिटी करते हैं।
समरेंद्र – लाइजनिंग ऑफिसर?
विभूति – नहीं, लाइजनिंग ऑफिसर की कोई भूमिका नहीं होती।
समरेंद्र – उसकी कोई भूमिका नहीं?
विभूति – लाइजनिंग ऑफिसर तो सिर्फ़ इसलिए है कि अगर कहीं कोई ज़्यादती हो रही है दलितों के साथ तो बता सके। सिर्फ़ लाइजनिंग ऑफिसर अकेले नहीं, पूरी एससी/एसटी कमेटी है वो करती है।
समरेंद्र – कमेटी में जो कानूनी राय की बात हुई थी। क्या वो कानूनी राय आप लोगों को मिली थी? या कमेटी का यह फैसला था?
विभूति – हां, मिली थी। कमेटी की भी रिपोर्ट मिली की इस पर लीगल राय ले ली जाए और लीगल राय भी आ गई कि एडमिशन नहीं मिल सकता।
समरेंद्र – क्या उसमें किसी ने कहा कि एडमिशन देना चाहिए?
विभूति – किसने कहा? यही तो मैं कह रहा हूं कि आप लोगों को तथ्य ग़लत बताए जा रहे हैं। यह कमेटी जो एक प्रो-वाइस चांसलर और तीन प्रोफेसरों की कमेटी है, उसने भी यह बात नहीं कही। वो वकील ने भी नहीं कही। यह सब चीजें तो इतनी आसान है कि मैं परसों आपको भेज दूंगा। दस रुपये का एक आरटीआई लगाना पड़ेगा। यह सब तो रिटेन डॉक्यूमेंट (लिखित दस्तावेज) हैं। कोई वर्बल (मौखिक) बात तो है नहीं। चार लोगों की कमेटी की रिपोर्ट भी रिटेन है और वकील की राय भी रिटेन है। वो तो चूंकि अगर कोई आदमी किसी तर्क को सुनना नहीं चाहे और यह कहता रहे कि भई यह तो एससी की रिजर्व सीट है और राहुल कांबले को यह सीट नहीं मिली – तो यह तो ग़लत है। वो सीट ओबीसी के लिए रिजर्व थी। वहां पर दो सीटें थीं। उसमें एक सीट जनरल थी एक ओबीसी की थी। अब आप कहिए कि ओबीसी के लिए क्यों थी? तो उसका कारण यह था कि ओबीसी का रिजर्वेशन 27 परसेंट है। लिहाजा अगर दो सीटें होती हैं तो उनमें पहला रिजर्वेशन ओबीसी का होगा। इम्तेहान हुआ तो उसमें इत्तेफाक से दोनों ओबीसी के बच्चे आ गए। जरनल में जो आया वो ओबीसी का एक लड़का था। और रिजर्व सीट पर ओबीसी की एक लड़की आई। प्रॉब्लम जिससे शुरू हुई, उस लड़की ने एडमिशन लेने से मना कर दिया। राहुल कांबले तीसरे नंबर पर था। राहुल ने कहा कि मैं तो वेटलिस्टेड नंबर वन हूं तो आप मुझे एडमिशन दे दीजिए। मैंने कहा कि वेटलिस्ट कोई निकली नहीं है। नंबर एक। नंबर दो कि चलो यह मान लिया जाए कि उसके बाद तुम्हारा नंबर है तब भी दाखिला तुम्हें नहीं मिलेगा क्योंकि यह सीट ओबीसी के लिए रिजर्व है। इस पर ओबीसी का ही छात्र आएगा। तुम नहीं आओगे। जैसे एससी की रिजर्व सीट होती और मान लीजिए कि उसमें एससी वाला दाखिला नहीं लेता तो उस रिजर्व सीट को आप एससी से ही भर सकते हैं।
दिलीप – वो सीट किससे भरी गई आखिर?
विभूति – वो भरी नहीं गई।
दिलीप – क्यों?
विभूति – ओबीसी का चौथे या पांचवे पोजीशन पर जो लड़का था। वो चला गया इस विवाद के कारण। होता यह है न कि रिजल्ट निकलने के बाद हर व्यक्ति तो इंतज़ार करता नहीं। वो चला गया तो सीट भरी ही नहीं गई। दूसरी बात तो यह है कि उस विभाग के डीन के बारे में कहा जा रहा था कि वो एंटी दलित हैं। मैंने कहा कि बताओ भई बीस में से अट्ठारह सीटें भरी हुईं थी उसमें सिर्फ़ तीन जनरल कैटेगरी के थे। बाकी या तो ओबीसी थे या फिर दलित थे। फिर डीन कैसे एंटी दलित हो गए? अब सारी बीस सीटें भर गईं तो अब भी वहां पर सिर्फ तीन जनरल कैटेगेरी के बच्चे हैं।
दिलीप – बाकी मेरिट से आ गए हैं।
विभूति – जाहिर है कि ओबीसी वाले मेरिट में आएंगे तो वो जनरल हो जाएंगे। लेकिन अगर वो एंटी दलित होते तो वो मेरिट में क्यों आने देते?
दिलीप – अच्छा तो क्या किसी को मेरिट में आने से रोका जा सकता है?
विभूति – भई कोई अध्यापक अगर बेईमानी पर उतारू हो जाए तो कुछ भी कर सकता है। लेकिन जब वो प्रीज्यूडिस होगा तो तभी न बेईमानी करेगा। हमारे यहां पर यह पहला विश्वविद्यालय है जहां पर मेजॉरिटी एससी/एसटी और ओबीसी के बच्चे हैं।
समरेंद्र – अच्छा आपके कार्यकाल में जितनी भी नियुक्तियां हुईं हैं उनमें कितने आपने दलित और ओबीसी नियुक्त किए हैं?
विभूति – यार मुझे इतना याद नहीं कि कितना नियुक्त किया है। यह तो रिकॉर्ड देख कर ही बता सकूंगा। तो भी जो 12-13 लोग हुए थे… अनिल चमड़िया वाला… उसमें जितने ओबीसी की सीटें थीं उतने ओबीसी रखे गए। जितनी एससी की सीटें थीं उतने एससी रखे गए। हमारे यहां रिजर्व कैटेगरी की कोई सीट खाली नहीं रही। एक रीडर की पोस्ट थी। जिसमें कोई सुटेबल नहीं मिला तो किसी का नहीं हुआ।
समरेंद्र – अच्छा ये लैला कारुण्यकारे का क्या मामला है?
विभूति – इनका कोई मामला नहीं है।
अविनाश – छह दिसंबर को ये कोई प्रोसेशन में शामिल थे ..
विभूति – ऐसा है। छह दिसंबर को अंबेडकर का निर्वाण दिवस है। जनरली 14 अप्रैल को जो अंबेडकर का जन्मदिन है उसी पर बड़े कार्यक्रम होते हैं। इसका तो किसी को कोई आइडिया नहीं था। उस दिन जो जुलूस निकला उसमें जातिवादी नारे लगाए गए।
दिलीप – क्या जातिवादी नारे लगाए गए?
विभूति – ब्राह्मणों को मां-बहन की गालियां देना … वगैरह .. ये सारी चीजें। उसमें हमारा जो कर्मचारी संघ का अध्यक्ष है वो बड़ा उत्तेजित हो कर आया। वो ब्राह्मण है। उसने कहा कि देखिए ये मां-बहन की गालियां दे रहे हैं। तो मैंने कारुण्यकारे से कहा कि भई आप प्रोफेसर हो… ऐसा स्टूडेंट या बाहर के एलिमेंट आकर कर रहे थे तो समझ में आता है… लेकिन आप प्रोफेसर हो और आप भी इसमें शरीक हो गए? ये मैंने एक तरह से उनको वार्न किया कि भविष्य में जहां इस तरह के प्रोवोकेटिव नारे लगाए जाएं तो वहां किसी प्रोफेसर को नहीं जाना चाहिए।
समरेंद्र – यहां वाद का मामला था या ब्राह्मण का मामला था।
विभूति – अब यह आप बताइए। आपको मालूम हो तो आप बताइए। आप थे वहां पर?
समरेंद्र – नहीं करुण्यकारा ने लिख कर भेजा है।
विभूति – तो आप यह उनसे पूछिए। कर्मचारी संघ के अध्यक्ष ने जो शिकायत की है वो तो ब्राह्मणों के मां-बहन की गाली की बात कर रहा है।
समरेंद्र – कर्मचारी संघ के अध्यक्ष की शिकायत पर एक प्रोफेसर को इस तरह का नोटिस भेजा जा सकता है?
विभूति – क्यों नहीं भेजा जा सकता है? कोई भी आदमी जब प्रोवोकेटिव नारे लगाएगा तो नोटिस नहीं भेजी जाएगी! इसके लिए मुझे क्या 10-20-50 लोगों से … मेरा काम देखना है कि कैंपस में शांतिभंग की स्थिति न आए। जातिगत कोई तनाव न हो।
समरेंद्र – किसी और से पूछा था आपने?
विभूति – सबसे सीनियर वही थे। उनको मैंने कह दिया कि भई आप भविष्य में इस तरह की हरकत नहीं करें।
समरेंद्र – उसमें तो और भी लोग शामिल थे?
विभूति – बहुत थे … बहुत थे… लेकिन प्रोफेसर रैंक के ये अकेले थे। हालांकि मेरे मन में प्रीज्यूडिस होती तो मैं दूसरे लोगों से नहीं पूछता?
समरेंद्र – राकेश श्रीवास्तव भी थे उसमें।
विभूति – हां बहुत लोग थे। मैं तो कह रहा हूं कि प्रोफेसर ये अकेले थे।
अविनाश – लेकिन प्रोफेसर तो जा ही सकते हैं?
समरेंद्र – लीगली तो उन्हें छूट है?
विभूति – वैसे तो जा सकते हैं। यह तो उनका डेमोक्रेटिक राइट है। लेकिन किसी का यह डेमोक्रेटिक अधिकार नहीं है कि आप जाकर जातियों का नाम लेकर गालियां दें।
अविनाश – ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद कोई जातिवादी नारा तो नहीं है।
विभूति – भई ब्राह्मणवाद तो .. आप थे वहां पर? आपको किसी ने बताया है न। मुझे भी किसी ने बताया तो मैं उनको विश्वास कर रहा हूं और आप उनको विश्वास कर रहे हैं जिसने आपसे यह कह दिया कि ब्राह्मणवाद के नारे लग रहे थे।
दिलीप – प्रोफेसर की जगह एक के कहने पर आपने यकीन किया?
विभूति – भई मेरे लिए एक कर्मचारी और प्रोफेसर बराबर है। मैं इस तरह श्रेणियों में बांटने में यकीन नहीं करता। कि कोई ज़्यादा तनख्वाह पा रहा है तो उसकी ज़्यादा हैसियत है। मेरे लिए उनकी भी उतनी ही अहमियत है।
समरेंद्र – मास्टरों को पॉलिटिकल राइट्स हैं शायद?
विभूति – सभी को दिया हुआ है।
दिलीप – लेकिन कोई पुलिस केस नहीं हुआ। कोई अगर जाति के नारे लगे तो पुलिस केस तो करना चाहिए।
विभूति – अगर कोई करना चाहता तो करता।
दिलीप – लेकिन कोई केस तो हुआ नहीं?
विभूति – यह हमसे क्यों पूछ रहे हैं? हमने कोई केस नहीं किया।
दिलीप – लेकिन केस के बगैर आपने नोटिस जारी किया?
विभूति – अरे यह कहां लिखा हुआ है कि पुलिस केस के बगैर नोटिस नहीं जारी किया जा सकता। मैं तो बस कहना चाहता था कि भविष्य में ऐसा नहीं हो।
दिलीप – पूछा जा सकता था।
विभूति – वही तो पूछा।
समरेंद्र – लेकिन एक बार नोटिस का जवाब दिया तो आपने दोबारा नोटिस भेजा।
विभूति – आप लोग नोटिस को नहीं जानते। इस मामले में आप लोगों की समझ थोड़ी कमजोर है। देखिए एक शो-कॉज्ड नोटिस होती है कि भई आप उसमें क्यों गए और आपने क्यों इस तरह के नारे लगाए? उस पर उन्होंने जवाब भेज दिया। उस पर मैंने उनको भविष्य के लिए सतर्क कर दिया कि भविष्य में ऐसा नहीं हो। यह मुद्दा ख़त्म हो गया।
समरेंद्र – चाहे कानून इजाजत देता हो तो भी?
विभूति – नहीं। कानून इस बात की इजाजत देता ही नहीं इस देश का कि आप जाकर भड़काऊ नारे लगाएं।
समरेंद्र – प्रोशेसन में जाने की तो इजाजत देता है।
विभूति – हां देता है। लेकिन प्रोशेसन में जाकर के जातिवादी नारे लगाएं, ये इजाजत नहीं देता। जाति सूचक नारे ग़लत हैं।
समरेंद्र – इन्होंने ही लगाए थे नारे?
विभूति – (गुस्से में) यार क्यों तुम मुझसे बहस कर रहे हो। तुम मुझसे बहुत छोटे हो। बार बार मुझे जिस तरह से प्रोवोक कर रहे हो लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के बहुत बड़े लॉयर हो। इन्होंने लगाए… कि … उन्होंने लगाए … मैं कह रहा हूं कि भई उस ग्रुप में सबसे सीनियर यह थे। मैंने इनको चेतावनी दे दी। बाकी जो जूनियर्स भी थे उनको भी बुला-बुला कर कइयों से मैंने कहा कि देखो इस तरह का आचरण नहीं होना चाहिए।
दिलीप – आपको इनवाइट किया गया था क्या इस जुलूस में शामिल होने के लिए?
विभूति – नहीं। मुझे नहीं किया गया था। मैंने देखा था कि विश्वविद्यालय में पोस्टर वगैरह लगे थे। लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे बुलाया नहीं गया था। ऐसा है कि दलित या माइनोरिटी के बारे में मुझे किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है।
अविनाश – नहीं… नहीं … आपसे एक पर्सनल सा सवाल पूछना है।
विभूति (रोकते हुए) – यह भी आप लिख लीजिए कि मैं 35-40 साल से इन मुद्दों पर लिख रहा हूं। और आप मेरे ब्लॉग पर भी चले जाइए… मेरा जो लेखन है वो दलित .. और मैंने इसके लिए सफर किया है। हिंदुत्व के दलों से मैंने लड़ाई लड़ी है और तब जब वो यहां की सरकार में थे और उत्तर प्रदेश की सरकार में भी थे। जो हाशिमपुरा में मेरा काम है… जो साम्प्रदायिक दंगों में मेरा काम है – उसके लिए मुझे अनिल चमड़िया जैसे टीचर से सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं है।
अविनाश- अरे नहीं नहीं … ऐसी कोई बात…
दिलीप – बोलने दीजिए
विभूति – नहीं मुझे कह लेने दो … भई मुझे इसमें किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं। …. ((जारी))
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तेवर तो झलक ही रहे हैं साहब के… आखिर जाति विशेष के जो हैं… तेवर कहां चला जाएगा… रही बात न्याय अन्याय की… तो जो सनातन से करते आए हैं… करते रहेंगे…
Prof.Karunyakara ne Dalit Atmasamman ke liye avaj uttaya tha. Jativad aur Brhaman vad ke khilaf nara lagana gair kanun nahi hai. Jativad ek samajik athankvad hai. V.N.Rai ap besharam se jis thara jathivad ko suport kararahe hai, usse patha chaltha hai ki ap sabse bada jativadi hai. Karunyakaraji jaise Dalit Buddhajivi logonke vaja se abhitak Babasaheb Ambedkar ka mission chal raha hai.
Jativad ke khilaf ladayi karna, Dalitonkeliye atmasamman ka saval hai. Ap ek behatirin Bhumihar jativadi hai. Dalit atmasamman ke bareme apko kya samajogi.
Mr.Rai, what I understand from your frustrated interview is that you are not suitable to V.C. post. You are not fit in the University environment. Police station is better for you. Please for god sake come back to Uttar Pradesh and don’t ruin the Gandhi University. Otherwise, I think there might be many Karunyakars you have to face in future, both within and outside the University, which could be very difficult for you. This is my sincere suggestion, you better think of coming back to Uttar Pradesh and our police stations are better places to harass Dalits than the Universities. But in the University it is not so easy as we have to give respect to Democratic Rights. For police mind, it is very difficult to understand intellectual minds. Why should we burn our fingers in a different field. Only law and order is important for us. Human rights or Dalit rights are not our concern. I read Karunyakara reply. It is beyond the capacity of our police minds to understand his intellectual jargons. Forget about these intellectuals. Catch hold poor, illiterate Dalits, we able to finish them. This is the only way left for you to harass Dalits. Soft targets are easy to achieve. Once again seriously think my suggestion.
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