यह जीत सिर्फ़ भारत की नहीं बल्कि हॉकी की है
हुक, पुल और ड्राइव की जगह बरसों बाद फ़्लिक, स्कूप और ड्रिबलिंग जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं और बहुत दिनों बाद हॉकी का कोई स्टेडियम दर्शकों से खचाखच दिख रहा है. भला वर्ल्ड कप हॉकी की इससे बेहतर क्या शुरुआत हो सकती थी.
2008 के बीजिंग ओलंपिक तक से वंचित रह गई भारतीय हॉकी टीम ने जो कामयाबी हासिल की है, उसकी टाइमिंग बेमिसाल है. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जीत सिर्फ़ एक टीम की जीत नहीं, एक कोशिश की जीत है, जो पिछले दिनों में बेहद विपरीत परिस्थितियों में भारतीय हॉकी खिलाड़ी करते आए हैं और कभी हॉकी संघ के टूट जाने, कभी अपनी तनख़्वाह के लिए हड़ताल कर जाने और कभी किसी पार्टी में शामिल होने के लिए पैसे मांगने के आरोप झेलते आए हैं. लगभग अपना वजूद बचाने के मुहाने पर खड़ी भारतीय हॉकी टीम को ताज़ा हवा के इस झोंके की बेहद ज़रूरत थी लेकिन किसी ने शायद यह नहीं सोचा था कि ऐसा वर्ल्ड कप के भारत के पहले ही मैच में पाकिस्तान को 4-1 से हरा कर होगा.
आफ़त तो ऐसी आई थी कि ख़ुद वर्ल्ड कप पर संकट के बादल मंडराने लगे थे और कभी पाकिस्तान के बायकॉट का ख़तरा रहता तो कभी सुरक्षा के नाम पर विदेशी टीमों के पहुंचने पर सवाल उठ रहे होते. ऊपर से हॉकी इंडिया की अंदरूनी तनातनी तो जारी थी ही.
अभी पिछले महीने की तो बात है. खिलाड़ियों की हड़ताल का मुद्दा सुलझा ही था कि हॉकी संघ के चुनाव के मुद्दे ने बवाल कर दिया. विदेशी कोच पर सवाल तो पहले से ही उठ रहे थे. लेकिन शायद इसी विदेशी कोच, स्पेन के खोसे ब्रासा ने चमत्कार किया है. बिलकुल उलटे हालात में टीम को मज़बूत बनाने का काम किया है और सबसे ज़रूरी खिलाड़ियों में विश्वास भरा. हालांकि उनके टीम के नियमित गोलकीपर एड्रियन डीसूज़ा की जगह पीआर श्रीजेश को ग्राउंड पर उतारने का दांव किसी को समझ नहीं आया लेकिन आख़िरकार यह बाज़ी सबसे कामयाब रही.
भले ही क्रिकेट में अब पाकिस्तान को भारत का प्रतिद्वंद्वी नहीं समझा जाता और यह जगह ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी टीमों ने ले ली है. लेकिन एक तरह से परंपरागत हॉकी खेलने वाले इन दोनों देशों में वह जुनून आज भी दिख रहा है.
कुछ दिनों पहले दिल्ली में जब पूर्व हॉकी कप्तान ज़फ़र इक़बाल से मुलाक़ात हुई, तो उन्होंने बड़े दिलचस्प अंदाज़ में भारत और पाकिस्तान के हॉकी और खिलाड़ियों के बारे में बताया. यह भी बताया कि 30 साल में क्या बदलाव आए हैं. उनके मुताबिक़ अगर तब हसन सरदार और समीउल्लाह जैसे खिलाड़ी पाकिस्तान टीम में हुआ करते थे, तो आज भी सुहैल अब्बास जैसा पेनाल्टी कॉर्नर स्पेशलिस्ट पाकिस्तान की टीम में है, जिसने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में 300 से ज़्यादा गोल कर रखे हैं. लेकिन भारत के ख़िलाफ़ वर्ल्ड कप के पहले मैच के बाद अब्बास अवाक थे और चर्चा सिर्फ़ भारतीय खिलाड़ियों प्रभजोत सिंह और संदीप सिंह की हो रही थी.
क्रिकेट के किसी बड़े मुक़ाबले की ही तरह आम तौर पर हॉकी में भी भारत की शुरुआत जीत से नहीं होती और दो तीन लीग मुक़ाबले होने के बाद समीकरणों और दूसरी टीमों की जीत हार का इंतज़ार होता है. लेकिन अबकी बार हॉकी टीम ने सबको चौंकाया है.
पर्दे के पीछे जा चुके हॉकी के एक्सपर्ट इस जीत के सामने एक बार फिर पर्दे पर नज़र आने लगे हैं और शायद दशकों बाद पहली बार हॉकी की ख़बर भारत के सभी समाचार चैनलों और अख़बारों में सबसे बड़ी ख़बर बनी है.

अनवर जमाल अशरफ़
((वरिष्ठ पत्रकार अनवर जमाल अशरफ़ इन दिनों जर्मन रेडियो डॉयचे वेले से जुड़े हैं। और जर्मनी के बॉन शहर में रहते हैं।))
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