कट्टरपंथी हुसैन के जाने से देश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा
धर्म इस देश में हमेशा से संवेदनशील मसला रहा है। धर्म के नाम पर विभाजन पहले ही हो चुका है। दंगों से धरती बार-बार लाल हुई है। कई धर्म और पंथ वाले इस राष्ट्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी की एक सीमा है। हर संवेदशनशील शख़्स को उस सीमा का ख्याल रखना चाहिए। अगर कहीं चूक हो जाए तो इतना तत्पर रहना चाहिए कि यह कह सके कि “मेरी मंशा ठेस पहुंचाने की नहीं थी। अगर किसी को ठेस पहुंची तो उसके लिए वो माफ करे।” लेकिन क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग करने वाले हमेशा उस लक्ष्मण रेखा का पालन करते हैं? और चूक होने पर क्या माफी मांगने का साहस दिखाते हैं? ये कुछ बड़े सवाल हैं। खासकर उस संदर्भ में तो ज़रूर जिस संदर्भ में एम एफ हुसैन को खुदा बनाने की कोशिश की जा रही है।
इसमें कोई शक नहीं कि एम एफ हुसैन इस देश के सबसे चर्चित पेंटर हैं। बड़े पेंटर होने पर कई दूसरे दावेदार सिर उठा सकते हैं, लेकिन एम एफ हुसैन के सबसे अधिक चर्चित होने पर नहीं। हुसैन आज इतने चर्चित पेंटर हैं तो यह सवाल भी उठेगा कि उनकी चर्चा इतनी अधिक क्यों हुई?
इस देश में कई बेहतरीन पेंटर हुए हैं। पेंटिंग की दुनिया में उनकी चर्चा भी खूब और उनके कामों की बोलियां भी खूब लगती हैं। लेकिन हुसैन की चर्चा देश और दुनिया दोनों जगह सबसे अधिक हुई। इसकी एक वजह उनकी चित्रकारी है। लेकिन दूसरी वजह यह भी है कि उन्होंने हिंदू धर्म के रहस्यमयी संसार से जुड़ी ऐसी तस्वीरें बनाईं जो दुनिया के तमाम देशों में हाथों हाथ ली गईं। हिंदू देवी देवताओं पर उनकी सीरीज़ काफी लोकप्रिय रही। देवियों की नग्न तस्वीरों को दुनिया भर में सराहा गया। और इसके जरिए हुसैन ने पेंटिंग के बाज़ार में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। साठ से सत्तर के दशक में हुसैन का खूब नाम हुआ।
हुसैन को लेकर विवाद नब्बे के दशक में गहराने लगा। ये वही दौर था जब हिंदी कट्टरपंथी हर उस गड़े मुद्दे को उखाड़ रहे थे जिससे हिंदुओं की भावनाओं को भड़काया जा सके। हुसैन की पेंटिंग्स भी उनका मोहरा बनी। सरस्वती और फिर भारत माता की नंगी तस्वीरों के कारण उनकी तीखी आलोचना शुरू हुई, जिसने बाद में छिटपुट हिंसा का रूप अख्तियार कर लिया।
अब सवाल उठता है कि इस हिंसा के लिए हुसैन कहां तक जिम्मेदार हैं? कुछ लोग कहते हैं कि हुसैन ने वो पेंटिग्स तो साठ और सत्तर के दशक में बनाईं थी। फिर बीस साल बाद उन पर बवाल मचाने का क्या मतलब? इस देश में जहां बाबर काल के इतिहास को हिंसा और ताक़त के जोर पर बदलने की कोशिश होती हो वहां दो दशक पुराने मामले पर तनाव हो तो यह कोई हैरानी की बात नहीं। यह तनाव हुआ और उसे कम करने के सीधा उपाय था। हुसैन पब्लिकली माफी मांग लेते। माफी नहीं भी मांगते तो इतना ही कह देते है कि “भारत माता उनकी भी माता हैं और हिंदू देवी देवताओं को वो भी अपना देवी देवता मानते हैं… उन्होंने उनकी पेंटिंग्स बनाई तो उसके पीछे किसी की भावना को ठेस पहुंचाने की मंशा नहीं थी।” लेकिन हुसैन ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। वो आज़ादी की बात कर रहे। खजुराहो की दलील देते रहे। यहां उनसे पूछा जाना चाहिए कि अगर उनके किसी कार्य से दूसरे की भावनाएं आहत होती हैं और आहत व्यक्ति उन पर मुक़दमा करे तो वो मुक़दमा लड़ने से क्यों बचना चाहते हैं?
दरअसल, हुसैन ने पॉपुलर होने का बहुत ही सस्ता रास्ता अपनाया था। उनके इस सस्ते रास्ते से कलाकार कम्युनिटी भी आहत हुई। जब सतीश गुजराल जैसे बड़े पेंटर हुसैन से पूछते हैं कि क्या वो इस्लाम के चरित्रों पर इस तरह की पेंटिंग बना सकते हैं? तब फिर हुसैन जवाब देने से पीछे हट जाते हैं। यहां कुछ लोग दलील देते हैं कि “हिंदू आख्यानों में चेहरे ही चेहरे हैं, लेकिन इस्लाम में ईश्वर का कोई चेहरा नहीं हैं। बुत नहीं है। हुसैन की मुश्किल ये है कि वे हिंदुस्तानी आदमी रहे हैं और अपनी चित्रकारी में बहुत सोच-समझ कर धार्मिक प्रतीकों के साथ खेलते नजर नहीं आते हैं।”
बात सही है। हिंदू आख्यानों में चेहरे ही चेहरे हैं और इस्लाम में चेहरे नहीं हैं। यह दोनों धर्मों के बीच का अंतर है। लेकिन क्या ये चेहरे बिना बनाए आ गए? किसी चित्रकार और शिल्पकार ने ही कभी इन्हें बनाया होगा? अमूर्त को मूर्त रूप देने की कोशिश की होगी। यह कोशिश तो कोई भी कर सकता है। खुद एम एफ हुसैन भी कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यहां पर उनके समर्थक यह दलील दे सकते हैं कि इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता। चलिए यह मान लेते हैं। लेकिन हिंदू धर्म कहां इसकी इजाजत देता है कि कोई लक्ष्मी को नंगा करके गणेश के माथे पर बिठा दे। हिंदू धर्म कहां इसकी इजाजत देता है कि नग्न सीता को रावण की जांघ पर बिठा दे और सामने हनुमान को नंगा कर दे। हिंदू धर्म कहां इजाजत देता है कि सरस्वती की नंगी तस्वीर बना कर खरीद-बिक्री का धंधा शुरू कर दे। इसलिए धर्म की इजाजत का सवाल नहीं है। बात मंशा की है। हुसैन की मंशा सस्ती पेंटिंग्स के जरिए लोकप्रियता हासिल करने की रही है। हिंदू धर्म के मिथकों के सहारे या फिर नए मिथक गढ़ कर विदेशी बाज़ार में अपनी पहचान बनाने की थी। बाद में यही मंशा उन्हें कभी माधुरी दीक्षित की तरफ, कभी तब्बू और अमृता राव की तरफ आकर्षित करती है।
एम एफ हुसैन इंटरव्यू में कहते हैं कि हिंदू धर्म जितना सहिष्णु रहा है उतना इस्लाम नहीं है। अगर हिंदू धर्म सहिष्णु रहा है और उनके किसी चित्र को कुछ गुमराह हिंदू देश में माहौल ख़राब करने का मोहरा बनाते हैं तो उन कट्टरपंथियों के नापाक इरादों को रोकने का दायित्व किस पर है? क्या हुसैन उस दायित्व को महसूस करते हैं? शायद नहीं। अगर दायित्व महसूस होता तो इस विवाद को ख़त्म करने की पहल होती। लेकिन यह पहल हुसैन की तरफ़ से कभी नहीं हुई। बल्कि हुसैन और उनके समर्थक जबरन माहौल बिगाड़ने का मौका देते रहे। तनाव के दौर में उन विवादास्पद पेंटिंग्स को गैलरियों में सजाते रहे। कुछ साल पहले तक विवादास्पद चित्रों को गैलरी में सजाने और उनकी बोली लगवाने का काम चलता रहा। नतीजा यह हुआ कि कट्टरपंथियों को अपने पक्ष में माहौल बनाने का मौका मिला।
आज भी हुसैन वही अपराध कर रहे हैं। एक घोषित तौर पर इस्लामिक देश कतर की नागरिकता कबूल कर उन्हीं धर्मनिरपेक्ष भवनाओं को आहत कर रहे हैं जिनकी जड़ें मजबूत करने के लिए न जाने कितने लोगों ने अपनी बलि दी है। हुसैन उन्हीं दलीलों को सही साबित कर रहे हैं कि वो भीतर से खुद एक कट्टरपंथी थे। इसलिए उन्होंने इस्लाम की बुराइयों पर चोट करने की कोशिश कभी नहीं की।
अब अगर हुसैन आखिरी दम तक भारतीय रहने का एलान नहीं करते हैं तो किसी को उनके जाने पर आंसू बहाने की जरूरत नहीं है। इस देश के लोग जब बिना चीनी खाए जिंदा रह सकते हैं, जैसा कि हमारे कृषि मंत्री कहते हैं… और बिना अरहर-मूंग दाल के जिंदा रह सकते हैं, जैसा शीला दीक्षित सरकार विज्ञापन देती है… तो हुसैन जैसे मौकापरस्तों के जाने से भी इस देश की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
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भाई समरेंद्र, तर्कपरकता, मानववाद और लोकतंत्र ये आधुनिक जीवन मूल्य हैं, हुसैन साहब अच्छे पेंटर हो सकते हैं लेकिन अच्छे मनुष्य कत्तई नहीं। बाजारू आदमी हैं। हर समझदार आदमी जानता है कि पूंजीवादी समाज की अनिश्चितता जब तक कायम है धर्म बना रहेगा तो दूसरे दीगर मसले अर्थात दुनियावी मसलों पर कूची चलाने के बजाय उन्होंने प्रसिद्धि के खतरनाक टोटके आजमाये। हुसैन मुर्दाबाद।
हम यह नहीं पूछेंगे कि उन्होंने इस्लामी धार्मिक जगत पर कूची क्यों नहीं चलायी क्योंकि इस सवाल के जमीन जरा दूसरी हो जाएगी, आपको भी सतर्क रहना था। बहरहाल, इस उम्दा लेख के लिए बधाई स्वीकारें।
समरेन्द्रजी आपको बधाई। आपका लेख सुगठित है और छद्म का पर्दाफाश करता है। सच हुसैन बडे चित्रकार नहीं बल्कि बाजारू चित्रकार हैं। वे कट्टरपेथी हैं और प्रगतिशीलता का व्यवसाय चलानेवाले छद्म लोगों के सहारे हिन्दू कटटरपंथियों को भी अवसर दे रहे हैं कि भारत के समरस समाज को नष्ट किया जाए। तैयब मेहता और रजा उनसे बडे चित्रकार हैं और भारत की धरोहर हैं। रजा विदेश में रहते हैं पर एनके चित्रों की आत्मा में भारतीय समाज शामिल है। हुसैन को जिस घूरे पर गिरना था गिर गए।
ZABARDAST. PURA ARTICLE FLAWLESS HAI. EK KALAKAR BHI SAMAJ MEIN HI RAHATA HAI ISLIYE ITNA BALENCE TO JAROORI HAI KI DESTRUCTIVE UATHAL PUTHAL NA KARE KALAKAR, KHAS TAUR PAR MFH KI WAJAH SE HI SHIV SENA, BAZRANG DAL JAISE LOG MAJBOOT HOTE HAIN. EK BAAR FIR BADHAI