हुसैन चचा, तुसी ना जाओ
वैसे तो तुम ताऊ की उम्र के हो लेकिन हम तुम्हें चचा ही कहेंगे। हम ग़ालिब को भी चचा कहते हैं। चचा हमें मालूम है कि तुम खुश नहीं हो इस वक्त। अपने मुल्क से दूर रहकर एक आम इंसान तो फिर भी जिंदगी बसर कर लेता है लेकिन तुम तो हिंदुस्तान के नगीनों में से हो। आधी सदी से ज्यादा वक्त तक तुम्हारे इस मुल्क ने तुम्हें जो प्यार दिया है उसे कैसे भुला पाओगे। वैसे भी, दूर रहने और नाता तोड़ने में बहुत बड़ा फर्क है। उम्र के आखिरी दिनों में हमारे यहां के बुजुर्ग तो अपनी पुश्तैनी हवेलियों, अपने पुराने गांव, पुराने घर लौटने की बात करते हैं। बिस्मिल्लाह खां कोलकाता के आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी समेत तमाम साधन-संपन्न लोगों के बुलावे के बावजूद अपना बनारस तक छोड़ने को तैयार नहीं हुए। तुम इस उम्र में अपना हिंदुस्तान कैसे छोड़ सकते हो चचा?
कुछ गड़बड़ियां हुईं। तुमने अपनी कलात्मक ऊंचाईयों (अपने हिसाब से) के सफर में कुछ ऐसे काम किए जिनके चलते हमले हुए.. तुम्हारे कलाकार पर, तुम्हारी कृतियों पर, तुम्हारे हिंदुस्तानी पर। तुम इतने परेशान हुए कि तुम्हें हिंदुस्तान से बाहर जाना पड़ा। लेकिन ये सब क्यों हुआ? माना कि कुछ लोग संस्कृति के स्वघोषित ठेकेदार बनकर ही अपना वजूद बचाए हुए हैं। लेकिन सोचकर देखो चचा, मामला एकतरफा भी तो नहीं है। जिन्हें तुम अपना, अपनी कला का और अभिव्यक्ति की आजादी का दुश्मन मानते हो, वो कहते हैं तुम्हें किसी की भावनाओं को आहत करने का कोई हक नहीं है। सही बात है। तुम्हें ही क्या, किसी को भी किसी की भावनाओं को आहत करने का हक नहीं है। क्या तुम जानते नहीं थे कि तुम क्या कर रहे हो? चचा, तुम जुपिटर से नहीं आए थे। कैसे मान लिया जाए कि आठ दशक से ज्यादा वक्त तक हिंदुस्तान की मिट्टी की आंच में पकी हुई तुम्हारी समझ, तुम्हें ये नहीं बताती होगी कि ये जो तुम करने जा रहे हो इसपर बवाल मचेगा। और अगर तुम जानबूझकर कर रहे थे तो तुम्हें थोड़े बहुत असामान्य हालात के लिए तैयार रहना चाहिए था।
दरअसल हम उस युग में हैं जहां विख्यात होने के लिए कुछ भी किया जाता है, ये फिक्र नहीं होती कि इससे कु-ख्याति मिल रही है या वि-ख्याति। संस्कृति के स्वघोषित पहरुए शायद इस बारीक लेकिन खतरनाक बदलाव को नोटिस नहीं करना चाहते। 1993 में गुमराह फिल्म में संजय दत्त के लिए आनंद बक्षी ने लिखा था- जब से मैं ज़रा सा बदनाम हो गया, राम कसम मेरा बड़ा नाम हो गया। और इस निरपेक्ष ख्याति को पाने का शॉर्टकट है विवादास्पद होना। ये फॉर्मूला तीसरे दर्जे के इंसान को पहले दर्जे की शोहरत और कामयाबी की गारंटी देता है। राखी सावंत को स्टार बनाता है, मीका सिंह को शंकर महादेवन के बगल की कुर्सी दिलाता है..बहरहाल। इसीलिए जब तुम्हारे जैसे परिपक्व दिमाग ने जब हिंदू देवी देवताओं की आपत्तिजनक तस्वीरें बनाई, भारतमाता की नग्न तस्वीर बनाई, खुद को कभी माधुरी तो कभी अमृता राव का दीवाना बताया तो (संशय के साथ ही सही) तुम्हारी नीयत पर संशय हुआ था। साथ ही ये भी लगा कि तुम्हें ये सब करने की क्या जरूरत है। तुम तो जादुई कूची के दम पर सारी दुनिया में मकबूल हो, सारा हिंदुस्तान तुमपर पहले ही फिदा है। तुम्हें तो भारत का पिकासो कहा जाता है। अपनी फिर ये सब क्यों।
खैर, जो हुआ सो हुआ। मेरे हिसाब से तो अगर वो अपराध था तो तुम उसकी सजा भोग चुके हो। तुम्हें अपनी जिंदगी, अपनी कला को बचाने के लिए पांच साल तक मुल्क से बाहर रहना पड़ा है। हम जानते हैं कि तुम हिंदुस्तान छोड़ना नहीं चाहते हो। अपने बचपन से तुम्हें देख और पढ़ रहा तुम्हारा बेटा ओवैस हुसैन तुम्हारा दर्द बयान करते हुए कहता है– ‘आप एक शख्स को किसी मुल्क से निकाल सकते हैं लेकिन उस शख्स के दिलो-दिमाग, उसके वजूद से उस मुल्क को नहीं निकाल सकते।‘ तुम्हें कौन निकाल रहा है चचा? तुम ये तो मानोगे कि कि तुम्हारा हिंदुस्तान कलाकारों का सम्मान करना जानता है। मिसालें तो बहुत हैं लेकिन सिर्फ इतना ही सोचो कि सारी दुनिया जिस मुल्क को हमारा सबसे बड़ा सिरदर्द कहती है वहां के कलाकार भी हमारे यहां खुशी-खुशी आते हैं। हम मेंहदी हसन, फरीदा खानम, ग़ुलाम अली, अताउल्ला खां, नुसरत फतेह अली, राहत फतेह अली और आतिफ असलम को उनके मुल्क से ज्यादा इज्जत और मोहब्बत देते आए हैं। (ऐसा मुल्क अगर तुम्हें खोने को तैयार है चचा तो हममें और तुममें ज्यादा बदकिस्मत पता नहीं कौन है।)

गिरिजेश
ये क्या कि चंद ही कदमों में थक के बैठ गए
तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था… !!
((वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार गिरिजेश से आप girijesh.kumar@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं))
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very well written girijesh ji…..positive….logical. Some of the earlier comments I read, today on this thread, were really one-sided, to the extent of being despicable.
बहुत बढ़िया लिखा है। संतुलित और भावुक।
पर किया क्या जाए। एक नब्बे पार के बुजुर्ग के किसी
भी फैसले में हम उसके साथ है।
कम अज़ कम ये बूढ़ा इस मायने में तो आम हिन्दुस्तानी बूढ़े से खास है
जो अपनी ताउम्र की कमाई संतानो पर निछावर कर देता है और साथ ही
बाद की उम्र खुद की मर्जी से जीने और मनचाहे फैसले लेने की आज़ादी भी।
हुसैन, साहब, जहां मर्जी रहो। वैसे भी बेमन से ही गए हो।