VC विभूति की SC/ST कमिशन में होगी शिकायत
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इसकी वजह कोई और नहीं बल्कि वो खुद हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने जनतंत्र डॉट कॉम और मोहल्ला लाइव को दिए अपने साक्षात्कार में दलित प्रो. लैला करूण्यकारा के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए थे। ब्राह्मणों को मां-बहन की गाली देने के आरोप में नोटिस भेजने की बात कही थी। हमारी जानकारी के मुताबिक उन आरोपों के जवाब में प्रो. कारूण्यकारा ने कुलपति वीएन राय को दो पत्र लिखे हैं। एक पत्र में प्रो. कारूण्यकारा ने आरोपों का जवाब दिया है। दूसरे में उन्होंने दलित छात्र राहुल कांबले के पीएचडी में नामांकन के बारे में कुलपति की गलतबयानी का खंडन किया है और राहुल काबंले के नामंकन नहीं किए जाने की पूरी प्रक्रिया के बारे में अवगत कराया है। 6 दिसंबर 2009 को विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित मार्च के आयोजक आम्बेडकर स्टुडेंट फेडरेशन का भी जवाब हमने प्रकाशित किया था। – मॉडरेटर
प्रो. (डॉ) लैला करुण्यकारा पत्रांक-122/ BACDTS/MGAHV/10
निदेशक
प्रति,
श्री विभूति नारायण राय
कुलपति, मअंहिविवि, वर्धा
विषयः मोहल्लालाइव वेबसाइट पर प्रकाशित आपके साक्षात्कार में बाबा साहब आंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस के मौके पर छह दिसंबर, 2009 को आयोजित ‘कैंडिल मार्च’ में मेरी भागीदारी और मेरे विरुद्ध आपके द्वारा लगाए गए आरोपों के संबंध में।
महोदय,
यह पत्र ‘मोहल्लालाइव डॉट कॉम’ वेबसाइट पर 21 फरवरी 2010 को ‘करुण्यकारा ने ब्राह्मणों का अपमान किया’ शीर्षक से प्रकाशित आपके रिकार्डेड साक्षात्कार के संदर्भ में है। यही साक्षात्कार 20 फरवरी 2010 ‘जनतंत्र डॉट कॉम’ पर एक अलग शीर्षक से छपा। इसमें आपने कर्मचारी संघ के अध्यक्ष, कार चालक श्री विजय पाल पांडेय की शिकायत पर आधारित एक बयान दिया है कि मैंने (करुण्यकारा ने) आंबेडकर में आपत्तिजनक भाषा में ब्राह्मणों का अपमान किया। आपका यह बयान सच्चाई से परे है। मैं इस तथ्यहीन और गलत नीयत से लगाए गए आरोप का विरोध करता हूं। आपने आज तक इस संबंध में न तो मुझसे निजी तौर पर और न ही फोन पर इस बारे में कोई बात की है। मुझे आपके इस तथाकथित आरोप के बारे में ‘मोहल्लालाइव’ वेबसाइट को दिए गए साक्षात्कार से ही मालूम हुआ। आपका यह बयान एक सोची-समझी साजिश के तहत मेरे खिलाफ गलत मामले खड़े करना है।
आंबेडकर रैली में मेरी भागीदारी को लेकर आपने मुझे तीन नोटिसें (11.12.2009, 17.12.2009 और 31.12.2009) भेजी हैं। इनमें से किसी भी नोटिस में आपने अपने इस तथाकथित शिकायत का जिक्र नहीं किया। आंबेडकर रैली के दौरान या उसके बाद विश्वविद्यालय परिसर में किसी किस्म की शांति और सद्भाव पर कोई खतरा न होने के बावजूद आपने अपने तीनों नोटिसों में लगातार मुझ पर रैली में भागीदारी के लिए विश्वविद्यालय का अनुशासन और व्यवस्था भंग करने का आरोप लगाया।
17 दिसंबर 2009 को आपके पहले नोटिस पर अपने पांच पेज के जवाब में मैंने साफ-साफ कहा था कि एक शिक्षाविद के नाते मुझे आंबेडकर की विचारधारा का प्रसार करने और भारत के संविधान निर्माता की जयंती पर होने वाली रैली में भाग लेने का पूरा अधिकार है। मैंने अपने जवाब में यह भी कहा था कि रैली में जातिवाद के विरोध में नारे लगाए गए थे और उसमें ब्राह्मणों सहित बहुत सारे लोगों ने भाग लिया था। मैंने उसी जवाब में आगे यह कहा था- ‘मुझे लगता है कि आंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर आयोजित रैली में मेरी भागीदारी और नारेबाजी को लेकर अपने जातीय पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर विश्वविद्यालय में एकमात्र दलित प्रोफेसर को अपमानित और मानसिक तौर पर उत्पीड़ित करने की नीयत से आपने नोटिस भेज कर स्पष्टीकरण मांगा।’ आपने उसके बाद मुझे दो और नोटिस भिजवाए। और ‘मोहल्लालाइव’ पर छपे साक्षात्कार के मुताबिक आपने चेतावनी के लहजे में मुझे ऐसी किसी भी गतिविधि में भाग न लेने की सलाह दी है, जिससे विश्वविद्यालय में शांति और सदभाव भंग होने का खतरा पैदा हो। आपने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय के नियमों के मुताबिक मेरा जवाब संतोषजनक नहीं है। मानो आंबेडकर रैली में मेरे हिस्सा लेना विश्वविद्यालय की शांति और सदभाव के लिए ‘खतरनाक’ है, जैसा आपने अपने नोटिसों में चेतावनी के लहजे में मुझे ‘आगाह’ किया है।
यह बेहद दिलचस्प है कि अब तक आपने न तो रैली के आयोजक ‘आंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम’ को नोटिस जारी किया है और न रैली में भाग लेने वाले गैरदलित अधिकारी और छात्रों को। आपके नोटिसों में यह कहा गया है कि रैली में बाहरी तत्त्वों की भागीदारी थी। जबकि सच्चाई यह है कि विश्वविद्यालय में निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों ने अन्य लोगों के साथ भाग लिया था, जो सबके लिए खुली थी। रैली के आयोजकों ने मुझे यह भी बताया था कि रविवार की शाम आयोजित उस रैली में भाग लेने का न्योता आपको भी भेजा गया था। दुर्भाग्यवश इस किस्म के आयोजन में भाग लेकर विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक खाई को पाटने के बजाय आपने इस पर सवाल उठाना और मुझ पर निशाना साधना ज्यादा जरूरी समझा। ऐसा क्यों हुआ, यह आप बेहतर जानते हैं।
यह अजीब बात है कि आंबेडकर रैली के दो महीने से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद अचानक मीडिया के माध्यम से आप यह जाहिर करते हैं कि करुण्यकारा के खिलाफ एक मामला लंबित है और यह बयान देते हैं कि करुण्यकारा ने ब्राह्मणों का अपमान किया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि विश्वविद्यालय के अनुशासनात्मक नियम-कायदे और पेशेवर नैतिकताओं का जरा भी खयाल किए बिना आपने मीडिया का इस्तेमाल मेरे खिलाफ दुष्प्रचार करने में किया। वह भी एक ऐसे व्यक्ति के बेसिर-पैर के आरोपों के आधार पर, जो खुद संदिग्ध है और जो मेरे खिलाफ नफरत फैलाने के लिए ही जाना जाता रहा है।
जैसा कि आप अच्छी तरह जानते हैं कि वित्तीय अधिकारी के तौर पर मेरे कार्यकाल के दौरान श्री विजय पाल पांडेय का कंप्यूटर लोन का आवेदन मैंने खारिज कर दिया था, क्योंकि नियमों के मुताबिक वह इसकी पात्रता नहीं रखता था। इस बारे में उसने आपको बताया। बहरहाल, मैंने औपचारिक तौर पर उसके आवेदन को इस आधार पर खारिज किया कि किसी व्यक्ति विशेष के लिए नियमों को तोड़ा नहीं जा सकता।
इसका परिणाम यह हुआ कि उसने तथ्यहीन आधारों पर वित्तीय अधिकारी के पद से मुझे हटाने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया। और इस मामले में आपने भी बिना समय गंवाए मुझसे स्पष्टीकरण मांग लिया। कुलपति के तौर पर अपने एक साल के कार्यकाल में मुझे नोटिस जारी करने के हर ‘मौके’ का आपने उपयोग किया है। ऐसा लगता है कि मुझसे निपटने के लिए संवाद या बातचीत करने के बजाय मुझे नोटिस भेजना आपको ज्यादा रास आता है।
हालांकि मेरे अनिच्छा जाहिर करने के बावजूद आपने ही विश्वविद्यालय के हित में वित्तीय अधिकारी का अतिरिक्त कार्यभार संभालने का मुझ पर दबाव डाला था। अलग-अलग वित्तीय मामलों में बरती गई अनियमितताओं का पर्यवेक्षण करने के बाद मैंने आपसे विश्वविद्यालय के वित्तीय प्रशासन को पारदर्शी बनाने का कई बार अनुरोध किया था।
उदाहरण के तौर पर सौ कंप्यूटरों की खरीद में कई किस्म की अनियमितताएं थीं। इस संबंध में मेरी आपसे बातचीत हुई थी और मैंने इससे संबंधित फाइल का निष्पादन करने से इनकार कर दिया और मैं अवकाश पर चला गया था। बाद में श्री राकेश श्रीवास्तव (विशेष कार्य अधिकारी- संस्कृति) को वित्तीय अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई और उन्होंने भुगतान की स्वीकृति दे दी। अवकाश से लौटने के बाद मैंने आपकी शिमला और अन्य जगहों की यात्रा भत्ते पर सवाल उठाए थे। मैंने आपसे विश्वविद्यालय परिसर में बाहरी कलाकारों द्वारा अक्सर पेश किए जाने वाले सांस्कृतिक गतिविधियों में अंधाधुंध खर्चों के संबंध में भी चर्चा की थी। मैंने आपके साथ हुई एक बातचीत के दौरान विशेष कार्य अधिकारियों के वेतनमान और विश्वविद्यालय परिसर में दी जाने वाली अन्य सुविधाओं पर भी सवाल उठाया था। मेरी राय में यह सब नियमानुकूल नहीं था, क्योंकि ये पद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा स्वीकृत नहीं थे।
मैंने आपको यह भी सूचित किया था कि किसी अस्वीकृत पद पर किसी व्यक्ति की प्रतिनियुक्ति नहीं की जा सकती, जैसा कि हमारे विश्वविद्यालय में विशेष कार्य अधिकारी के मामले में किया गया। मैंने ये सारे सवाल एक वित्तीय अधिकारी के तौर पर आपसे अलग-अलग चर्चा के दौरान इसलिए उठाए क्योंकि इससे सार्वजनिक कोष पर बोझ बढ़ रहा था और विश्वविद्यालय को ही अधिक खर्चों का बोझ उठाना पड़ता है। मैं जानता हूं कि वित्तीय प्रक्रियाओं के दौरान मेरे द्वारा उठाए गए सवालों से आप खुश नहीं हैं। हालांकि मेरे पास यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन ऐसी चर्चा है कि मेरे विरुद्ध श्री विजय पाल पांडेय द्वारा चलाए गए हस्ताक्षर अभियान के पीछे और आप ही हैं।
यह अफसोसनाक है कि मेरे विरुद्ध लगाए गए किसी आरोप की मुझसे छानबीन करने के बजाय हमेशा मुझे नोटिस जारी करना आपने बेहतर समझा। मैंने पुरजोर तरीके से यह मानता हूं कि श्री पांडेय का उपयोग मेरे खिलाफ झूठे मामले बनाने और मेरे अकादमिक करिअर को बर्बाद करने के लिए किया जा रहा है। मेरा मानना है कि मीडिया (वेबसाइट) में मेरे विरुद्ध झुठे आरोप लगा कर मेरी छवि को सार्वजनिक रूप से खराब करने का आपका कोई अधिकार नहीं है।
एक कहानीकार ऐसी कहानी लिख सकता है, जिसके मुख्य पात्र शराब और तंबाकू का सेवन नहीं करता हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कहानीकारी को भी शराब और तंबाकू की लत न हो। जातिवाद के संदर्भ में भी यह बात लागू होती है। एक व्यक्ति का आकलन सिर्फ उसके लेखन से नहीं, बल्कि उसके आचरण, व्यवहार और कार्यकलापों के आधार पर होना चाहिए।
एक शिक्षाविद के अधिकारों के संबंध में मैं आपको हाल का एक उदाहरण देता हूं। उस्मानिया विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर कोदांतरम तेलंगाना आंदोलन के ज्वाइंट एक्शन कमिटी का नेतृत्व कर रहे हैं। मैं ऐसा नहीं समझता कि उस्मानिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन पर कोई बंदिश लगाई है। और मैंने तो सिर्फ आंबेडकर रैली में शिरकत की थी और जातिवाद के खिलाफ नारा बुलंद किया था। लेकिन मुझे तीन नोटिसें थमा दी गईं और मीडिया (वेबसाइट) के जरिये मेरी छवि बिगाड़ी गई। मुझसे कोई बातचीत किए बगैर आंबेडकर रैली में मेरी भागीदारी पर आपने मुझे नोटिसें जारी कीं और अब दुष्प्रचार कर मेरा एकेडमिक करिअर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
ऊपर लिखे परिस्थितिजन्य सबूतों से यह साबित होता है कि आप मेरे एकेडमिक करिअर को नुकसान पहुंचाने की नीयत से लगातार दुष्प्रचार में संलग्न हैं और अपने जातीय पूर्वाग्रह के कारण मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं। आपने सोच-समझ कर मीडिया का इस्तेमाल मेरी छवि बिगाड़ने के लिए किया है, वह भी मुझसे कोई प्राथमिक जानकारी लिए बगैर।
आंबेडकर रैली के दो महीने से ज्यादा वक्त गुजर जाने के बाद भी आप मुझे मानसिक रूप से लगातार प्रताड़ित करने से चूंकि बाज नहीं आ रहे हैं, इसलिए अगर मेरे साथ कुछ भी बुरा घटित होता है तो इसके लिए जिम्मेवार आप होंगे। मुझे नुकसान पहुंचाने की आपकी भूख मुझे अनुसूचित जाति/ जनजाति आयोग और अन्य उचित एजेंसियों में न्याय की गुहार लगाने और आपकी शिकायत करने के लिए मजबूर कर रही है।
आपका
लैला करुण्यकारा
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