साल भर का हुआ जनतंत्र, सफर जारी है

जनतंत्र को एक साल हो गया है। बीते साल मार्च में यह वेबसाइट शुरू हुई थी। अप्रैल में उसे नए सिरे से लॉन्च किया गया था। इस साल भी अप्रैल में आप जनतंत्र को नए अवतार में देखेंगे। जिसमें बहस के साथ ख़बरों पर भी जोर होगा। ख़बरों के पीछे के खेल पर भी नज़र रहेगी।

साथियों अभी यह शुरुआत है। हम चंद कदम ही चले हैं। सफ़र बहुत लंबा है और काफी मुश्किल भी। बीते एक साल में कई ऐसे मौके आए जब लगा कि जनतंत्र बंद कर दें। लेकिन बंद करने का मतलब हार मानना था। और हार मानने से कुछ हासिल नहीं होता। यही सोच कर हमने, इसे बंद नहीं किया। इसे ऐसे मंच के तौर पर विकसित करने की कोशिश में लगे रहे जहां आप और हम खुल कर अपनी बात कह सकें। स्वस्थ बहस कर सकें। एक दूसरे के ग़लत कदमों की निंदा कर सकें, आलोचना कर सकें। सरकार और मीडिया की भूमिका पर चर्चा कर सकें।

साल भर के इस सफ़र में जनतंत्र को आप सभी का प्यार मिला। उसी प्यार की बदौलत आज जनतंत्र पर करीब चालीस से ज़्यादा पत्रकार लिखते हैं। कुछ नियमित तौर पर। कुछ कभी-कभार। कुछ पत्रकार अख़बारों में छपे लेख हमें भेजते हैं। कुछ अख़बारों में छपे लेखों को हम खुद-ब-खुद उठाते हैं। साभार देकर छापते हैं, इस उम्मीद में कि बहस जारी रहे। हम उन सभी साथियों और मीडिया संस्थानों के आभारी हैं। इसलिए कि बिना किसी आर्थिक स्वार्थ के उन सभी ने जनतंत्र को सहयोग जारी रखा। ऐसा नहीं कि हम उनके श्रम का सम्मान नहीं करते। बात बस इतनी है कि फिलहाल हमारे पास सिवाए प्रेम, सम्मान और आभार के कुछ भी ऐसा नहीं है जो दे सकें।

लेकिन यह सूरत हमेशा नहीं रहेगी। हमें उम्मीद है कि वो दिन भी ज़रूर आएगा जब हम जनतंत्र से जुड़े साथियों को उनके श्रम की उचित कीमत देने की स्थिति में होंगे। उनकी मेहनत और काबिलियत का आर्थिक तौर पर भी सम्मान कर सकेंगे। उसी उम्मीद के सहारे हम आपसे अपील करते हैं कि आप सभी जनतंत्र को सहयोग जारी रखें।

अभी हम इक्का दुक्का मुद्दों पर बहस चलाते हैं। आगे कोशिश होगी कि देश के सबसे निचले तबके के हितों से जुड़े तमाम मुद्दे उठाए जाएं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे विषयों पर बहस हो। विकास परियोजना का सच जानने की कोशिश हो। यह आसान नहीं है। ऐसी व्यवस्था बनाने और जनतंत्र को उस हैसियत तक पहुंचाने के लिए काफी कुछ करने की ज़रूरत है। जो हमसे बन पड़ रहा है वो हम कर रहे हैं। आप साथ बनाए रखिए। हो सके तो नए-नए साथियों को जोड़िए। उन्हें बेखौफ अपनी बात कहने के लिए प्रेरित कीजिए। हम कामयाब ज़रूर होंगे।

आखिर में बस इतना ही कि अभी हमारी आवाज़ बहुत कम लोगों तक पहुंचती है। पाठकों की संख्या चार-पांच हज़ार ही है। धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ रही है। यह संख्या जितनी अधिक बढ़ेगी, जनतंत्र की आवाज़ भी उतनी ही बुलंद होगी।

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Posted by on Mar 21 2010. Filed under तीर-ए-नज़र. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

11 Comments for “साल भर का हुआ जनतंत्र, सफर जारी है”

  1. हमें जनतंत्र के नए कलेवर और असर का इंतजार रहेगा।..

  2. रतन ओझा

    बधाई हो गुरू. साथ था, है और रहेगा. तुम लगे रहो. जनतंत्र कामयाब जरूर होगा. कुछ काम हो तो बताना.

  3. I am proud to be following and subscribing Janatantra since its inception, I believe. Today, I feel proud as it completes one successful year. Congratulations Janatantra. Wishing you all the best. I am always with you.

  4. शुभकामनाएं और बधाई, दोनो. नाउम्मीदी और मुश्किलों के दौर से जो बिना हार माने आगे बढ़ ले, वही विजेता और उसी के कदमों में सफलता.

  5. कप्लना

    जनतंत्र की टीम को बधाई और शुभकामनाएं

  6. इमरान

    बधाई हो

  7. congrats. It is really heartening to see such sites running without any help or pressure from outside. Hope Jantantra will carve new niche for itself.

  8. Anu Singh

    जनतंत्र की टीम को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं। साथ था, रहेगा। नए रूप को बेसब्री से इंतज़ार है। और हां, देश के सबसे निचले तबके की आवाज़ उठाने की बात पर कायम रहिएगा। हमसे जितना बन पड़ेगा, करेंगे।

  9. हौसला बढ़ाने के लिए आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद। सच में आप लोगों का साथ नहीं होता तो ये वेबसाइट बहुत पहले बंद हो गई होती।

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