“जीतने के लिए पूरी दुनिया है”

कानू सान्याल के इंटरव्यू का कुछ हिस्सा हमने जनतंत्र पर प्रकाशित किया था। उसमें उन्होंने मौजूदा दौर के नक्सली आंदोलन को आतंकवाद के समकक्ष खड़ा किया था। अब हम भारत में नक्सल आंदोलन के संस्थापकों में से एक कानू सान्याल का वो बयान आपसे साझा कर रहे हैं जो उन्होंने “पार्वथीपुरम नक्सलवादी षणयंत्र केस” में विशाखापट्टनम में स्पेशल मजिस्ट्रेट की अदालत में 31 मई, 1973 को दिया था। यह बयान वीर भारत तलवार की पुस्तक नक्सलबाड़ी के दौर में…. से लिया गया है और इसका अनुवाद विश्वदीपक ने किया है। – मॉडरेटर

सबसे पहले हम उन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जो इस प्रतिक्रयावादी सरकार द्वारा बर्बरतापूर्वक मार डाले गए हैं। इस समय जबकि यह षणयंत्र का मुकदमा चल रहा है, सभी साम्राज्यवादी और उनकी पूंजीवादी व्यवस्था, जिसका सरदार अमेरिका है और सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद उस गहरे संकट का सामना कर रहे हैं जो संपूर्ण पूंजीवादी व्यवस्था में सड़ांध पैदा कर रहा है। डॉलर के अवमूल्यन तथा वाटरगेट कांड ने अमेरिकी साम्राज्यवाद की ताकत के मिथक को तोड़ दिया है। उनके अंदरूनी अंतर्विरोधों के तीव्र हो जाने के फलस्वरूप पश्चमी यूरोप में और दूसरी जगहों पर भी उनकी गति में अवरोध आया है। जबकि समाजवादी देश जनवादी चीन के नेतृत्व में तेजी से आगे की ओर बढ़ रहे हैं। पूरी दुनिया में लोग राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लड़ रहे हैं और जीत हासिल कर रहे हैं। तीसरी दुनिया अर्थात एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अपने संगठन बना रहे हैं और अपनी स्वाधीनता और प्रभुसत्ता को बचाने के लिए संग्राम कर रहे हैं।

मार्क्सवाद जन्म के समय से ही शोषकों और प्रतिक्रियावादियों ने दुनिया में सब जगहों पर जुल्म ढाने के लिए कम्युनिस्टों पर षणयंत्र करने का आरोप लगाकर मुकदमें चलाए हैं। क्योंकि कम्युनिस्ट शोषित जनता की मुक्ति के लिए इस दमनकारी समाज व्यवस्था के खिलाफ लड़ता है। 1852 ई. में हुए ‘कोलोन मुकदमें’ से लेकर कम्युनिस्टों ने आज तक अपने ऊपर लगाए गए षणयंत्रों के आरोपों का पूरी घृणा के साथ प्रतिवाद किया है। और इससे इनकार किया है। जैसा कि लेलिन ने कहा था –‘ एक राजनीतिक संषर्ष को षणयंत्र कहकर संकुचित करने का हमने प्रतिवाद किया है और आगे भी करते रहेंगे । षणयंत्र मार्क्सवाद विरोधी चीज है और दुनिया में कहीं भी षणयंत्रों द्वारा क्रांति संपन्न नहीं हुई है।’

हम लोग सीपीआई (एमएल) के सदस्य हैं। और हमारी पार्टी भारत और विदेशों के कम्युनिस्ट आंदोलनों के लंबे अनुभवों से शिक्षा प्राप्त कर इस नतीजे पर पहुंची है कि जनवादी क्रांति को, उसकी अगली अवस्था समाजवाद के साथ, पूरा किए बिना और जनता के हाथों में राजसत्ता को सौंपे बिना हमारे देश की समस्याओं को सुलझाया नहीं जा सकता। हमारी प्यारी मातृभूमि भारतवर्ष की संस्कृति प्राचीनतम संस्कृतियों में एक हैं। यहां काफी खनिज संपदा और खूब उपजाऊ भूमि तथा मेहनत करनेवाली करोड़ों की जनता है। लेकिन 200 वर्षों तक ब्रिटिश सम्राज्यवाद के निर्मम शोषण ने हमारे देश को दुनिया के सबसे गरीब और पिछड़े देश में बदल दिया है।

कांग्रेसी शासन के अंतर्गत भारत सिर्फ नाम मात्र के लिए आजाद हुआ है। हकीकत में यह एक अर्ध-उपनिवेशिक, अर्ध-सामंती देश है। कांग्रेसी प्रशासन भारतीय सामंतों, राजकुमारों बड़े जमीदारों तथा दलाल नौकरशाहों और पूंजीवादों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है। घरेलू तौर पर यह बिना किसी दया भाव के भारतीय जनता का उत्पीड़न करता है औऱ उनका खून चूसता है।

कांग्रेसी शासन के 25 साल बाद भी जनता के सामने सिर्फ और सिर्फ अंधकार को छोड़कर और कुछ नहीं है। 41.2 प्रतिशत लोग हमेशा भुखमरी की हालत में रहते हैं जिनकी मासिक आय 20 रुपये से भी कम है। शहरों की 53 प्रतिशत जनता और देहातों की 78 प्रतिशत जनता प्रतिदिन सिर्फ 93 पैसे कमाती है।

खाद्यान्न में निर्भरता के बावजूद इस कृषि प्रधान देश को हर साल खाद्य की विकट कमी पड़ती है। और हजारों करोड़ रुपये साम्राज्यवादियों से उनकी शर्तों के साथ अनाज खरीदने में खर्च करने पड़ते हैं। …जनता खाना और रोजगार मांगती है तो प्रतिक्रियावादी सरकार उसे गोलियों से जवाब देती है। सरकार अपनी दमनकारी मशीनरी को और भी विस्तृत कर रही है। फौज और पुलिस की तैयारियों में विशाल बजट खर्च किया जा रहा है।

यह अवश्यसंभावी है कि भारतीय जनता विद्रोह करेगी क्योंकि प्रतिक्रियावादी कांग्रेसी शासन ने उनके लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं छोड़ा है। आज देश में जनता के हर तबके में और जीवन के हर क्षेत्र में विद्रोह हो रहा है। मजदूर वर्ग भारत में हर जगह संघर्ष कर रहा है। सरकार इतनी भयभीत है कि हर राज्य में हड़ताल विरोधी कानून पास करने की तैयारी कर रही है।

नक्सलबाड़ी के इतिहास का निर्माण करने वाले किसानों ने संशोधनवादियों और नव संशोधनवादियों की घृणित भूमिका के साथ-साथ प्रतिक्रियावादी शासकों के गांधीवाद और जनता को पंगु बनाने वाली अफीम संसदीय प्रणाली की घृणित भूमिका का पर्दाफाश किया है। नक्सलबाड़ी के वीर किसानों ने बड़े ही जोरदार तरीकों से किसान जनता को साहसपूर्वक जागृत करने, उन पर भरोसा करने उन्हे संगठित तथा हथियार बंद के महत्व को और कृषि क्रांति संपन्न करने की अनिवार्यता को स्थापित कर दिखाया अर्थात जनयुद्ध के रास्ते को स्थापित कर दिखाया जो 56 करोड़ भारतीय जनता की मुक्ति का रास्ता है।

सशस्त्र कृषि संग्राम के विकास से भयभीत होकर ही प्रतिक्रियावादी भारतीय शासक वर्ग ने नक्सलबाड़ी के समय से ही संघर्षशील जनता को निर्ममता के साथ दबा देने की कोशिश की। एक तरफ तो उन्होंने असंख्य किसानों और हमारे मूल्यवान कॉमरेडों की हत्याएं कर दीं, गांवों को नष्ट कर मैदानों में बदल दिया, औरतों के साथ बलात्कार किया, पाश्विक यंत्रणाएं दीं, झूठे इलजाम में फंसाकर हजारों किसानों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल के अंदर भर दिया। और जेल के अंदर ही बंदियों की हत्याएं की। दूसरी तरफ इन्हीं प्रतिक्रियावादी शासकों ने, समूची जनता के खिलाफ षणयंत्र करने वाले इन मुट्ठीभर षणयंत्रकारियों ने, हम लोगों पर षणयंत्र के मुकदमें और कितने ही दूसरे मुकदमें चलाए।

प्रतिक्रियावादी हम पर हमेशा प्रहार करेंगे क्योंकि वे सच्चे कम्युनिस्ट से भय खाते हैं। हम सदा ही आज से 125 साल पहले महान मार्क्स और एंगेल्स द्वारा लिखे ‘कन्युनिस्ट घोषणापत्र’ के साथ हैं कि कम्युनिस्ट अपने उद्देश्य और विचारों करो छिपाना घृणित समझते हैं। वे खुलेआम कहते हैं कि उनका उद्देश्य सिर्फ तभी पूरा हो सकता है जब मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों को बलपूर्वक उखाड़कर फेंका जाय। शासक वर्ग कम्युनिस्ट क्रांति से कांपता है तो कांपने दो। मजदूर वर्ग के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा और कुछ नहीं। जीतने के लिए उनके सामने पूरी दुनिया है।

((युवा पत्रकार विश्वदीपक देश के नंबर वन न्यूज़ चैनल आज तक से जुड़े हैं। आप उनसे vishwa_dpk@yahoo.com पर संपर्क कर सकते हैं।))

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Posted by on Mar 25 2010. Filed under तीर-ए-नज़र. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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