चार साल में नहीं मिला एक भी आदिवासी छात्र!
माल-ए-मुफ़्त, दिल-ए-बेरहम…. छत्तीसगढ़ की एक खबर ने इस जुमले को बेमानी बना दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार को रायपुर और जगदलपुर में आदिवासी छात्रों के लिए खोले गए कोचिंग संस्थान और हॉस्टल बंद करने पड़ रहे हैं। वजह कोई पैसों की कमी नहीं है। बल्कि वजह ये है कि 2006 में खोले गए इन कोचिंग संस्थानों में आज तक एक भी छात्र ने रजिस्ट्रेशन ही नहीं कराया।समाचार एजेंसी आईएएनएस की इस खबर में ये तो नहीं बताया गया है कि छात्रों की इस उदासीनता की वजह क्या है, अलबत्ता ये जानकारी ज़रूर दी है कि एक भी छात्र नहीं आने के बावजूद सरकार के करीब 35 लाख रुपये इन कोचिंग संस्थानों पर खर्च हो गए। बड़ी हैरानी की बात है कि सरकार छात्रों के लिए कोई सहूलियत मुहैया कराए और छात्र उसका फायदा न उठाना चाहें। लेकिन रायपुर और जगदलपुर में ऐसा ही हुआ है।
सरकार ने ये कोचिंग संस्थान इसलिए खोले थे ताकि आदिवासी छात्र, संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी बेहतर ढंग से कर सकें। वो भी सरकारी खर्चे पर। लेकिन इस सुविधा का फायदा उठाने के लिए चार साल में एक भी छात्र आगे नहीं आया। आखिर क्या हो सकती है इसकी वजह? क्या छत्तीसगढ़ के आदिवासी छात्र आईएएस, पीसीएस अफसर बनना ही नहीं चाहते? धरती पर भगवान की तरह सर्वशक्तिमान समझे जाने वाले इन ओहदों के लिए क्या उनमें ललक नहीं रह गयी है? ऐसा तो नहीं हो सकता।
तो क्या सरकारी संस्थानों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दी जा रही सहूलियतें इतनी खराब थीं कि किसी छात्र ने उन्हें इस्तेमाल करने लायक ही नहीं समझा? तमाम शहरों में दड़बे जैसे छोटे-छोटे कमरों में अधकचरे शिक्षकों के बलपर चलने वाले हज़ारों कोचिंग सेंटरों में मोटी फीस के बावजूद उमड़ती छात्रों की भीड़ देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि सरकारी कोचिंग संस्थानों को खराब सुविधाओं के चलते एक भी छात्र नहीं मिला होगा। फिर इन संस्थानों में तो छात्रों के लिए हॉस्टल की सुविधा भी दी जा रही थी। (ये बात आईएएनएस की खबर में राज्य के जनजातीय कल्याण विभाग के एक बड़े अफसर के हवाले से बतायी गई है।) ऐसे में कम से कम मुफ्त में रहने के इंतज़ाम का फायदा उठाने के लिए तो कुछ छात्रों को आना ही चाहिए था। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ।
सबसे आसान तो ये होता कि इन कोचिंग संस्थानों की नाकामी का ठीकरा माओवादियों के सिर फोड़ दिया जाता। लेकिन जब राज्य सरकार ऐसा नहीं कह रही है, तो फिर हम कैसे कह सकते हैं। काफी दिमाग खपाने के बाद भी हमें कोई ऐसी ठोस वजह नहीं मिल रही, जिसे छात्रों की इस उदासीनता के लिए पक्के तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया जा सके। आपको कुछ समझ आए, तो हमें भी बताइएगा।
(छत्तीसगढ़ की ये खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।)
Last 5 posts by अनिकेत तिवारी
- चंदन मित्रा के नाम एक खुला पत्र - August 15th, 2009
Short URL: http://www.janatantra.com/news/?p=7474







ये भी खूब रही !