अब गांव से विधानसभा पहुंचना चाहती है संजो
संजो कौल बुलंद हौसले की एक जीती-जागती मिसाल है। समाज के निचले पायदान से उठकर अपने लिए एक अलग मुकाम बनाने वाली चित्रकूट की यह महिला संघर्ष का लंबा दौर पार करते हुए आज बतौर ग्राम प्रधान भी मिसाल कायम कर रही है। अब उसका ख्वाब विधायक बनकर विकास और जनसेवा की बड़ी कहानी लिखने का है।
चित्रकूट के मानिकपुर विकास खंड में स्थित गैर सरकारी संगठन ‘अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान’ से सियासत की बारीकियां सीखने वाली महिला संजो कोल ने तमाम मुश्किलों का सामना कर आज समाज में अपने लिए एक अलग मुकाम बनाया है। बचपन से ही समाज में कुछ करने की तमन्ना रखने वाली संजो बाल विवाह का शिकार हुई थी। गरीबी से बेजार उसके पिता खुदीराम ने इटवा डुड़ैला गांव में उसकी शादी कर दी थी। वह महज 16 साल की उम्र में एक बेटी की मां भी बन गईं। उस पर सामाजिक कार्यों का जुनून इस कदर चढ़ा कि पति से उसकी अनबन हो गई। इसके बाद उसे बेटी के साथ घर से निकाल दिया गया लेकिन उसने हार नहीं मानी।
मायके में रह कर उसने इस संगठन के संस्थापक गोपाल भाई के संरक्षण में कदम आगे बढ़ा दिए। 35 साल की उम्र में उसने इस संगठन की मदद से आठवीं कक्षा पास की और राजनीति के गुर भी सीखे। वर्ष 2005 में ग्राम पंचायत गिदुरहा का प्रधान पद जनजातीय महिला के लिए आरक्षित हुआ तो गांव के लोगों ने चुनाव लड़ाने की ठान ली। वहीं एक पूर्व प्रधान ने मतदाता सूची से संजो नाम ही कटवा दिया। कड़ी मशक्कत के बाद नाम दर्ज हुआ तो डकैत ददुआ ने उसकी सहेली मदिया को उठवा लिया। संजो ग्राम प्रधान का चुनाव न लड़े, इसके सारे जतन हुए लेकिन वह झुकी नहीं और लोगों ने उसे भारी मतों से जिताया।
ग्राम प्रधान के रूप संजो ने विकास कार्य से जुड़े बुहत काम किए। उसके कार्यों और हौसले को देखते हुए ‘सोशल साइंस इंस्टीट्यूट’ नई दिल्ली के सौजन्य से हाल ही में विश्व युवा केन्द्र के सभागार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण कौर के हाथों उसे सम्मानित किया गया। अब वह विधानसभा पहुंचना चाहती है। मऊ मानिकपुर विधानसभा क्षेत्र से उसने चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। बकौल संजो, ‘राजनीति का अपराधीकरण हो गया है, जनप्रतिनिधि बेलगाम हैं, इसलिए पाठा क्षेत्र की यह दुर्दशा है। खुद विधायक बनकर लोगों की सेवा करना चाहती हूं।’ (आईएएनएस)
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