रणनीति में पिटा विपक्ष

कहने को तो हमारे तमाम विपक्षी नेता घोर अनुभवी हैं, लेकिन संसद के मौजूदा सत्र में ये तार-तार हो गया कि उनमें से कोई भी दूरदर्शी नहीं है। कोई भी आव्वल दर्ज़े का रणनीतिकार नहीं हैं। विपक्ष सिर्फ अहंकारी योद्धाओं से अटा पड़ा है। ये मध्यकाल के छोटे-छोटे रजवाड़ों या सामंतों की तरह ही हैं जिन्हें सिर्फ अपनी जीत की फ़िक्र रहती थी, अपनों की जीत की नहीं। विपक्ष की ऐसी ही अदूरदर्शिता के चलते मनमोहन सिंह सरकार आज बेहद आरामदायक दशा में है।

फरवरी में जब बजट सत्र की शुरुआत हुई तो लगा कि विपक्ष महंगाई के मुद्दे पर सरकार की चूलें हिला देगा। विपक्ष की एकता को देखकर जेपी का जमाना याद आया। एक बार को तो विपक्ष की छोटी-बड़ी करीब 20 पार्टियां एकजुट दिखाईं दीं। लालू, मुलायम और मायावती ने उस सरकार को आंख दिखाना शुरू किया जिसे दस महीने पहले उन्होंने ही बिना शर्त बाहर से समर्थन देकर खुद को निहाल किया था। लेकिन बजट सत्र में सरकार और विपक्ष के रणनीतिकारों की अग्नि-परीक्षा हो गयी।

विपक्ष ने महंगाई पर संसद जाम किया तो सत्ता पक्ष ने अपने पिटारे से महिला आरक्षण बिल के जाने-पहचाने ब्रह्मास्त्र को निकाल लिया। महंगाई पर एकजुट विपक्ष महिला आरक्षण पर बिखर गया। किसी के पाला बदलने की नौबत नहीं आयी। सत्ता पक्ष ने तो सिर्फ विपक्षी खेमे में पहले से बिछी बारूदी सुरंगों को तीली भर ही दिखायी थी। राज्यसभा में वो सब कुछ दिखायी दिया जिसकी झलक 14 साल पहले लोकसभा में दिख चुकी थी। मज़ेदार बात सिर्फ इतनी थी कि कुछ भी अचानक या अप्रत्याशित तरीके से नहीं हुआ। सरकार और विपक्ष दोनों को एक-दूसरे की रणनीति का पता था। सब कुछ पूर्व नियोजित तरीके से ही हुआ। इसीलिए सब संतुष्ट थे। सत्ता पक्ष की मुरादें पूरी हुईं। विपक्ष बिखर गया। किसी को भी न तो ताज्ज़ुब होना था और ना ही हुआ।

सरकार से पटखनी खाने के बाद चंद दिन ही बीते थे कि आईपीएल और शशि थरूर विवाद के रूप में विपक्ष के हाथ बहुत बड़ा ज़खीरा आ गया। बिल्ली के भाग से छीका टूट गया। जल्द ही फोन टैपिंग और टेलिकॉम स्पेक्ट्रम विवाद के रूप में हथियारों की नयी खेप भी विपक्ष खेमे में पहुंच गयी। उसका उत्साह देखते ही बनता था। इन नये हथियारों से उसने सरकार के छक्के भी छुड़ाए। सरकार में बैठे कई महारथी घायल नज़र आये। शशि थरूर वीरगति को प्राप्त हुए। विपक्ष का हौसला सातवें आसमान पर था। लेकिन शशि थरूर की कुर्बानी के बाद विपक्ष ने संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच की मांग करके सरकार की ओर ऐसा गोला दागा जिसे फुस्स होना ही था। यहां रणनीति बुरी तरह से गच्चा खा गयी। जेपीसी का विचार वामपंथी नेताओं के दिमाग की उपज थी। जिसे उनके कट्टर विरोधियों ने भी आंख मूंदकर अपना लिया। शशि थरूर की शहादत के बाद विपक्ष का अगला दांव अगर जांच पूरी होने तक बाकी दागी मंत्रियों को सरकार से बाहर करवाने का होता तो बात कुछ और ही हो सकती थी। सरकार के बड़े अहम सहयोगियों एनसीपी और डीएमके सीधे निशाने पर होते। विपक्ष ये सुनहरा मौका चूक गया। विपक्ष भूल गया कि किस तरह से 26/11 के बाद उठे राजनीतिक बवंडर के चलते शिवराज पाटिल, विलास राव देशमुख और आर आर पाटिल ज़मींदोज़ हो गये थे!

विपक्ष फिर महंगाई के मुद्दे पर लौटा। आनन-फानन में गैर-यूपीए और गैर-एनडीए वाली पार्टियों को तीसरे मोर्चे की याद आ गयी। अफ़सोस कि इस टीम का सबसे बड़ा महारथी कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत अब दूर बैठकर भी रणनीति बनाने के लिए मौजूद नहीं था। महंगाई को लेकर 12 अप्रैल को ऐसी 13 पार्टियां सरकार के खिलाफ लामबंद हुईं जिनकी लोकसभा में ताकत सिर्फ 87 सांसदों की है। इस कवायद को पहला झटका तो बैठक शुरू होने के वक्त ही लग गया। 22 सांसदों वाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी इससे दूर रही।

दो-ढाई घंटे की माथापच्ची के बाद, ज़िन्दगी भर विपक्ष में बैठने का अनुभव रखने वाले नेताओं के पिटारे से इतनी लचर रणनीति निकलेगी, ये सोचना भी मुश्किल था। तय हुआ कि 27 को भारत बंद किया जाएगा और कटौती प्रस्ताव लाया जाएगा। बैठक के फ़ौरन बाद ही मुलायम और लालू जैसे नेताओं ने साफ कहा कि कटौती प्रस्तावों के जरिये उनका मकसद सरकार गिराना नहीं, बल्कि उस पर महंगाई को काबू में लाने का दबाव बनाना है। महंगाई के नाम पर विपक्ष बंटा हुआ ना दिखे इसीलिए एनडीए ने भी कटौती प्रस्ताव लाने का एलान किया। फिर क्या था, विपक्ष में ही एक-दूसरे को पछाड़ने की दौड़ छिड़ गयी। खुद को सबसे बड़ा रणनीतिकार मानने का भ्रम पालकर दशकों से सियासत बिसात सज़ाते रहे वामपंथियों ने तय कर दिया कि वो कटौती प्रस्ताव सिर्फ लाएंगे ही नहीं उस पर मतदान भी कराएंगे। हारी हुई जंग को लड़ने का ये दुस्साहस नहीं तो और क्या था!

संसद के राजनीतिक इतिहास में वामपंथी पहले भी ऐसे आत्मघाती फैसले लेते आये हैं। कटौती प्रस्ताव पर मतदान के वक्त उनके साथ सरकार को पछाड़ने लायक लोग जुट जाएंगे, ये सभी की समझ से परे था। मतदान से सरकार की नाक में दम करने का सपना देखने वाले रणनीतिकारों की ये एक और भयंकर भूल साबित हुई। वो अच्छी तरह जानते थे कि सरकार अल्पमत में नहीं है। मंसूबा था कि कहीं ममता बनर्जी की तृणमूल भी उनके साथ आ गयी तो सरकार के दांत खट्टे हो जाएंगे। विपक्ष ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया कि सरकार में भी रणनीतिकार बैठे हैं। सरकार डूबने की नौबत आएगी तो सही-गलत, सारे हथकंडे अपनाये जाएंगे।

संख्या की लड़ाई तो संख्या से ही लड़ी जाती है। तथाकथित तीसरे मोर्चे के 87 सांसदों में एनडीए के 153 को जोड़ने पर आंकड़ा 240 तक ही पहुंचता है। मायावती पहले दिन से ही इस खेमे से छिटकीं रहीं। अगर साथ ही रहतीं तो उनके 21 सांसद को जोड़ने पर आंकड़ा 261 तक ही पहुंचता। 543 सदस्यों वाली लोकसभा के लिए जादुई आंकड़ा 272 का है। ये जोड़-घटाव सबको मालूम था। फिर भी विपक्ष हारी हुई जंग लड़ने पर आमादा रहा। सरकार और एनडीए में 19 सांसदों के साथ बैठी ममता बनर्जी से ये उम्मीद करना नादानी ही थी कि वो पश्चिम बंगाल के चुनाव से साल भर पहले ही सत्ता का दामन छोड़कर विपक्ष के साथ खड़ा होने की बेवकूफी करेंगी। वो भी तब, जबकि ऐसे मोर्चे में उनके सबसे बड़े विरोधी वामपंथी पहले से मौजूद हों। ममता की ओर से कभी ऐसा कोई संकेत भी नहीं दिया गया।

अब कांग्रेस के रणनीतिकारों ने अपना कौशल दिखाया। मायावती से सौदा हुआ कि एक तो उन पर चल रहे आमदनी से ज़्यादा की सम्पत्ति के मामले में सीबीआई हल्का हाथ रखेगी। दूसरा, ग्रेटर नोएडा में अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे की योजना में जान फूंकने का रास्ता तलाशा जाएगा। मामूली की मशक्कत के बाद ये रणनीति कामयाब हो गयी। हवाई अड्डे के निर्माण में आ रही कानूनी अड़चनों को दूर करने का ज़िम्मा सरकार में बैठे उन मंत्रियों को सौंपा गया जो वकालत में खासा दख़ल रखते हैं। चिदम्बरम इस मंत्रिमंडलीय समिति के मुखिया बनाये गये। साथ में, वीरप्पा मोइली और कपिल सिब्बल सरीखे लोग भी हैं। साफ है कि मायावती ने जबरदस्त राजनीतिक सूझ-बूझ दिखायी। जीत रही सरकार के साथ जा खड़ी हुईं और अपने फायदा करा लिया। ये मौका परस्ती नहीं, राजनीति है। सभी पार्टियां ऐसा ही करती रही हैं।

सरकार की अगली रणनीति मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव को साधने की थी। इन दोनों ने भी मनमोहन सिंह सरकार को बगैर मांगे बाहर से समर्थन दिया था। पुराने दोस्त रह चुके हैं। महिला आरक्षण पर खटास बढ़ी तो छिटकने लगे। समर्थन वापसी की बातें तो की गयीं लेकिन राष्ट्रपति भवन कोई नहीं गया। इनसे भी दो सौदे हुए। पहला, सरकार राज्यसभा की तरह लोकसभा में भी मार्शल के ज़रिये महिला आरक्षण के विरोधियों को सरकार सदन से जबरन बाहर नहीं कराएगी। यानी लोकसभा में महिला आरक्षण बिल गया ठंडे बस्ते में। एनडीए भी मार्शल के इस्तेमाल के खिलाफ था। वामपंथी भी कोई और रास्ता तलाशने की बात करके सरकार को ढुलमुल तरीका अपनाने की जगह दे चुके थे। फिर क्या था, सरकार ने भी कह दिया कि वो भी ज़ोर-जबरदस्ती के हक़ में नहीं है। यानी महिला आरक्षण की भैंस फिर चली गयी पानी में।

सरकार की ओर से मुलायम और लालू से सौदेबाज़ी का दूसरा पैंतरा बेहद दिलचस्प है। सरकार के रणनीतिकारों ने दोनों नेताओं को संदेश भेजा कि सरकार का विरोध करने तक अगर वो कटौती प्रस्ताव के साथ खड़े रहते हैं तो भी उन्हें दोस्त ही माना जाएगा, बशर्ते कि वो मतदान में सरकार के खिलाफ वोट नहीं डालें। खिलाफ वोट डाला तो सरकार के पास उन्हें दुश्मन समझने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। यानी फिर सरकार को छूट होगी, दुश्मन के साथ अपने तरीके से पेश आने की। कांग्रेसियों को राज करने आता है! ये चुटकियों में दिख गया।

दोनों यादवों को झट से आंकड़ों की सच्चाई और सरकार की रणनीति की गहराई समझ में आ गयी। वो जानते थे कि सरकार गिरेगी नहीं। कोई गिराना भी नहीं चाहता था। साल भर के भीतर नये जनादेश की नौबत से हिले हुए थे। दोनों यादव साध लिये गये। मतदान के वक्त गैरहाज़िर रहने की रणनीति बनी। वामपंथियों का सपना चकनाचूर हो गया। लोकसभा में पहली बार कटौती प्रस्ताव पर मतदान की नौबत आयी। विपक्ष की सारी एकता ताश के पत्तों की तरह ढह गयी। बाकी भारत बंद का असर वहीं-वहीं हुआ जहां राज्य सरकारों ने उसे कामयाब बनाना चाहा। कटौती प्रस्ताव पर मतदान के दौरान ही शिबू सोरन की हरक़त बीजेपी के लिए बिन बुलाई फज़ीहत साबित हुई। पार्टी की सांप-छछूंदर वाली हालत सबके सामने है।

विपक्ष ने बीती घटनाओं से भी कोई सबक नहीं लिया और अपनी भद्द पिटवा ली। झारखंड मुक्ति मोर्चा घूसकांड और वामपंथियों की समर्थन वापसी के अनुभवों की अनदेखी की गयी। क्यों हमारे विपक्षी नेता राजनीतिक लड़ाई में अपने नफे-नुकसान का ठीक से अंदाज़ा लगाने में चूक जाते हैं? वो कैसे भूल गये कि कांग्रेस अपनी सरकार या उसकी साख को बचाने के लिए किसी भी सीमा तक जाएगी! राजनीति का यही नियम है और दस्तूर भी। सभी पार्टियां ऐसा ही करती हैं। दरअसल, संख्या नहीं जुटने पर ही नैतिकता का उपदेश दिया जाता है। ये कांग्रेसियों की रणनीति का ही कमाल था कि उनकी वामपंथियों की समर्थन वापसी के बाद ना सिर्फ अपनी सरकार बचाई बल्कि परमाणु करार को भी परवान चढ़ाया! विपक्ष ने पिछले जनादेश से भी कोई सबक लिया है, ऐसा कभी नहीं लगा।

पूरे घटनाक्रम से सिर्फ इतना ही साफ हुआ कि सत्ता पक्ष के मुकाबले विपक्ष के रणनीतिकार कितने बौने, अपरिपक्व और अदूरदर्शी हैं! अब सरकार को संजीवनी की खेप मिल चुकी है। संजीवनी के सौदागरों को साधने का कौशल वो एक बार फिर दिखा चुकी है। बाकी महंगाई को लेकर आम जनता का दुःख-दर्द अब भी, पहले की ही तरह, बदस्तूर कायम है। लोकतंत्र में टक्कर और जीत-हार सिर्फ रणनीति की ही होती है। संख्या से ही सरकार बनती है। संख्या बल में विपक्ष तो कमज़ोर होता ही है। तभी तो मज़बूत से टकराने के लिए चुस्त रणनीति की अहमियत है।

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Posted by on May 3 2010. Filed under ब्लॉग. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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