हिंदुओं, पहले अपना ही हिंदुपन तो तय कर लो!
छम्मकछल्लो की समझ में नहीं आता कि वह अपने ही धर्म के भाई लोगों को क्या कहे? भाई लोग कहते हैं कि वे सच्चे हिंदू हैं, नारे भी देते हैं कि “गर्व से कहो, हम हिंदू हैं” और अपने इसी गौरवांवित धर्म की ऐसी की तैसी कर देते हैं।
हिंदू धर्म कहता है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” और हिंदू भाई लोग अपने ही इस मंत्र के विरुद्ध चले जाते हैं। धर्मकहता है, ‘कर्म किये जाओ, फल की चिंता मत करो’ और मानने की बात पर हिंदू भाई लोग अपने जन्म पर आधारित धर्म और जाति की बात करने लगते हैं। यह इन पढे-लिखे, उच्च विचार वाले हिंदुओं से कैसे कहा जाए कि हिंदू होना अपने कर्म के ऊपर नहीं है। जिस तरह से अपने मां बाप को चुनना किसी के बस में नहीं है, उसी तरह किसी धर्म विशेष में जन्म लेना भी। हमने-आपने जिस मां-बाप के यहां जन्म ले लिया, ले लिया, इसी तरह जिस धर्म या देश के परिवार में पैदा हो गए, हो गए। उस लिहाज़ से छम्मकछल्लो भी एक हिंदू घर में पैदा हो गई, इसलिए वह भी हिंदू हो गई। और छम्मकछल्लो को अपने हिंदू होने पर गर्व है, जब वह अपने ही धार्मिक ग्रंथों में इतनी इतनी प्रगतिशील बातें पाती हैं।
लेकिन, हिंदू भाई लोग धर्म की बात आने पर राधा-कृष्ण को पूजेंगे और अपने बच्चों के प्रेम की बात आने पर उसे धमकी देंगे और निरुपमा पाठक की तरह उसे जान से भी मार देंगे।
देखिए न, सभी धर्म-परायण हिंदू भाई लोग अपने यहां की स्त्रियों से साल में एक दिन हरतालिका व्रत करने की बात करते हैं। जो इस व्रत को जानते हैं, उन्हें पता है कि हिमराज ने जब अपने पुत्री पार्वती का ब्याह विष्णु के साथ तय कर दिया तो शिव को चाहनेवाली पार्वती तुरंत घर छोडकर चली जाती है। देवी-देवताओं की उम्र शायद हज़ारों-लाखों साल की होती है, इसलिए पार्वती हज़ारों–हज़ारो साल तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है- पति रूप में। छम्मकछल्लो अपनी मां से पूछती थी कि अगर आज कोई लडकी ऐसे अपने पति या प्यार को पाने के लिए घर छोडकर चली जाए तो? मां तो मुस्कुरा कर रह जाती थी, मगर आज छम्मकछल्लो के सामने जवाब के रूप में है- निरुपमा पाठक जैसी कई-कई लडकियां।
आज लडकियां बिन ब्याहे मां बन जाए तो भूचाल आ जाता है। मगर हिंदू धर्मवाले जानते हैं कुंती को, वेदव्यास की माता सत्यवती को। सत्यवती ने बाद में अपनी ही बहुओं को वेदव्यास के पास भेजा, संतान प्राप्ति के लिए। बहुओं से बात नहीं बनने पर दासी को भेज दिया। बहुओं ने धृतराष्ट्र और पांडु दिए तो दासी ने विदुर। अब कोई बताए कि जाति या पद से ओछा होने से क्या संतान निर्बुद्धि पैदा होता है, जैसा कि लोग कहते हैं दूसरी जाति में ब्याह करने पर संतान वर्ण संकर होता है। इस वर्ण संकर के भी बडे लफडे हैं भाई। इस पर फिर कभी।
पांडु-पत्नी कुंती कुंवारी मां बनी और ब्याह के बाद भी अन्य पुरुषों के संसर्ग से संतान पैदा किए। यही नहीं, मन में कहीं कोई चोर बैठा होगा, इसलिए अपनी सौत माद्री को भी दूसरे पुरुषों के संसर्ग से संतान उत्पन्न करवाए और अपनी बहू द्रौपदी को भी अपने पांच बेटों में बांट दिया। द्रौपदी आजन्म कृष्ण को अपना सखा मानती रही। आज कोई ब्याहता किसी अन्य पुरुष के लिए ऐसा सोचे तो उसका अपना ही पति उसे सबसे पहले दुश्चरित्र ठहराएगा। रावण के मरने के बाद मंदोदरी का ब्याह श्री राम विभीषण से और बाली के मरने के बाद उसकी पत्नी तारा का ब्याह उसके देवर सुग्रीव से करवा देते हैं। इंद्र द्वारा गौतम पत्नी अहिल्या से व्यभिचार करने के बाद श्रीराम अहिल्या को व्यभिचारिणी और दुश्चरित्रता के आरोप से मुक्त कराते हैं।
इन सबसे यह तो पता चलता है कि समाज जिसे स्वीकार कर ले, उसपर कोई आंच नहीं उठाता। आज के हिंदू दावा तो करते हैं बडे हिंदू होने का, मगर कैसा दावा और किसका दावा यार! सच्चे हिंदू हो तो अपनी ही परम्परा का पालन करो ना। अपनी बेटियों को कुंती, अहिल्या, द्रौपदी, तारा, मंदोदरी जैसी पन्चकन्या या पार्वती जैसी प्रेम की पक्की होने तो दो। बिना ब्याह के भी वेदव्यास जैसा तपस्वी पैदा तो करने दो। अगर नहीं तो अपने हिंदूपने पर गर्व करना छोड दो। अपने इस तथाकथित हिंदुत्व को भी छोड दो। सनातन धर्म क्या कहता है, क्या पता। परंतु हिंदू ग्रंथ तो ये सब कहते ही हैं ना। अब या तो इन धर्म ग्रंथों को मिटा दो या अपनी विचारधारा में भर आए कूडे-कर्कट को साफ करके उसे स्वच्छ-शुद्ध कर लो। शास्त्रों में कुछ और, और अपनी करनी-कथनी में कुछ और! महान हिंदू धर्म यह तो कतई नहीं कहता। हिंदू धर्म की बातों को ही गलत ठहरानेवाले और उसी हिंदू धर्म पर गर्व से सर को हिमालय से भी अधिक ऊंचा करनेवाले हे तथाकथित हिंदुओ! तुम्हारी जय (?) हो!
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Love not required permission and care of other ,
If any nature expectation from other is their then love is not their and collective expectation arise , which is also hidden desire of commerce ,even for inheritances,
basically the commerce is so supreme and its invisible color which en groused desire for our identity and once the thought of identity arise then only rule of power function , justice never prevail their, either of us if you seen in your own eyes, right or wrong , evil and good use to be decided as our desire and favoritism .
Aapki bebak zaban ko salaam !!
sabse pahle to tarkik aadhar par mera jai ho jai ho, aap kabul farmayein…..
Bibha jee ,
hindu samaj ka domuhapan ujagar karne ke liye badhayee kabul karen.