नक्सल और विकास में भिड़न्त
नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी चुनौती है। लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ी बीमारी है। इसका इलाज़ करना होगा। इन बातों से भला कोई भी कैसे असहमत हो सकता है? इसीलिए बड़ा सवाल ये है कि इलाज़ क्या है, कैसे होगा, कौन करेगा? क्या इलाज़ कारगर भी होगा? मर्ज़ ठीक हो जाएगा? ये सवाल आज देश और हमारे हुक्मरानों के सामने ‘यक्ष-प्रश्न’ बनकर खड़े हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि नक्सलियों के प्रभाव वाले इलाके बेहद ग़रीब, पिछड़े हुए और विकास-विहीन हैं। पूरा देश और सरकारी तंत्र की हरेक सत्ता इसके लिए बराबर की ज़िम्मेदार है। ज़िम्मेदार हमारे देश के तमाम छोटे-बड़े औद्योगिक घराने भी हैं, जिन्होंने पिछड़े या नक्सल प्रभावित इलाकों का सिर्फ दोहन और शोषण ही किया है। ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफा कमाने के लिए। इस काम में आकंठ भ्रष्ट और गैरजबावदेह सरकारी अमले की पूरी मिलीभगत भी रही है। लेकिन क्या इन तमाम करतूतों को दुरुस्त करने की जगह नक्सलियों को वही करने देने की छूट जारी रखी जा सकती है, जैसा वो सालों-साल से करते चले आ रहे हैं? कुलमिलाकर यही नक्सलवाद जैसी घातक बीमारी के लक्षण हैं।
मरीज़ के पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी और फिज़ियोलॉजिकल टेस्ट का निचोड़ भी यही है। लेकिन बीमारी तो सामाजिक, प्रशासनिक और लोकतंत्रिक है। लिहाज़ा इलाज़ भी इन्हीं विधाओं के नियमों से तलाशने होंगे। बेशक, नक्सलवाद की चपेट में रहने वाले आदिवासियों को विकास की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। वो बुरी तरह से कुपोषित हैं। उनके पास सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी कोई भी बुनियादी सहुलियत नहीं है। नये ज़माने के रोज़गारों से भी वो कोसों दूर हैं। सरकार की किसी योजना का फायदा उन तक नहीं पहुंचता है। दरअसल, जहां वो रहते हैं, वहां सरकार नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। ये तथ्य बिल्कुल सही हैं। लेकिन क्या बाकी देश को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए?
यूपीए सरकार की कम से कम 11 योजनाएं ऐसी हैं, जिन्हें ऐसे ही आदिवासियों और ग़रीबों के लिए बनाया गया है, जो शोषित और कुपोषित हैं। ऊंची शिशु मृत्यु दर, कुपोषित माताएं, अशिक्षा, साफ पीने के पानी जैसी समस्याएं सबसे ज़्यादा इन्हीं लोगों में हैं। ये ग़रीबी और लाचारी से अभिशप्त हैं। सरकार कहती है कि ग़रीबों के लिए पैसों की कोई कमी नहीं है। ये झूठ भी नहीं है। लेकिन सच किसी से छिपा भी नहीं है कि ग़रीबों के लिए केन्द्र सरकार की ओर से जाने वाला पैसा उन तक पहुंचता ही नहीं है। उसे वो बिचौलिए डकार जाते हैं जो तथाकथित सभ्य समाज, सत्ता और लोकतंत्र की नुमाइंदगी करते हैं। कानून के राज के पैरोकार हैं, लेकिन पीढ़ियों से कानून के नाम पर लाचारों पर ज़ुल्म करते आ रहे हैं। वैसे ये तबका देश के उन इलाकों में भी उतना ही भ्रष्ट, निकम्मा और बर्बर है, जितना कि नक्सल प्रभावित इलाकों में रहा है।
सवाल है कि विकास कैसे उन लोगों तक पहुंचेगा, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है? सरकार जानती है कि वो मौजूदा तंत्र या ताने-बाने में रहकर हालात में सुधार नहीं ला सकती। खुद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कई बार सार्वजनिक तौर पर इसे कबूल भी किया है। नक्सली इस काम को करना नहीं चाहते हैं। उनका ज़ोर एक ओर अपने कब्ज़े वाले इलाके को विकास से दूर रखना है, दूसरा मकसद उन इलाकों में पहुंचने वाले गैरनक्सली और गैरआदिवासी लोगों से तरह-तरह की फिरौती वसूलना है। सरकार की मौजूदगी को किसी भी रूप में नकार देना है। पुलिसिया ज़ोर-जबरदस्ती का ऐसा हिंसक प्रतिकार करना है कि लोगों की रूह कांप जाए। आदिवासियों में से भी अगर कोई उनसे इत्तेफाक़ नहीं रखे तो उसे मुखबिर बताकर बेरहमी से मौत की नींद सुला देना है। कुलमिलाकर, नक्सली, सरकार के भ्रष्ट और निकम्मे तंत्र का ऐसा विकल्प बनकर ही रह गये हैं, जो अपनी प्रजा का भी कोई भला नहीं करता है। जिसका मकसद लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने का है। अराजकता की ऐसी सत्ता कायम करने का है, जिसमें न्याय और समता की कोई जगह नहीं है। इसीलिए नक्सलवाद का सफाया ज़रूरी है।
नक्सलियों का सफाया इसलिए भी ज़रूरी है कि वो विकास विरोधी हैं। बिजली आदिवासियों को भी चाहिए। लेकिन वो बिजलीघर के विरोधी हैं। प्रकाशम, मुंदरा, रत्नागिरि, रायगढ़, बीड, अमरावती, अमृतसर, बांसवाड़ा, इलाहाबाद, एटा – ये देश के कुछ ऐसे ज़िले हैं जहां बिजली की भारी किल्लत है। वहां के लोगों को बिजली तो चाहिए, लेकिन वो बिजलीघर के खिलाफ हैं। बिजलीघर नहीं होंगे तो बिजली आएगी कहां से? देश के 16 प्लांट भारी मुश्किल में हैं। उन्हें पर्याप्त कोयला नहीं मिल पा रहा है। जहां कोयला का भंडार है, वहां नक्सली कुंडली मारकर बैठे हैं। कोई बाहरी वहां पहुंच नहीं सकता। पहुंच भी जाए तो नक्सलियों को साधे बगैर जीना मुश्किल है। उद्योग-धंधों की तो बात बहुत दूर की है।
अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में क़दम-क़दम पर चीन से हमें कड़ी चुनौती मिल रही है। भारत ने पांच साल में 78,700 मैगावॉट बिजली की उत्पादन क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन हम 50 हज़ार मैगावॉट का आंकड़ा भी छूने की हालत में नहीं हैं। जबकि चीन हर साल बिजली उत्पादन की अपनी क्षमता में एक लाख मैगावॉट का इज़ाफा कर रहा है। पर्याप्त और सस्ती बिजली मुहैया होने के चलते वहां इतने सामान की उत्पादन हो रहा कि आधी दुनिया ‘मेड इन चाइना’ वाले सामानों से अटी पड़ी है। बदले में चीनी आबादी को रोज़गार मिल रहा है। रोज़गार से हर तरह की खुशहाली उनके पास पहुंच रही है। लेकिन चीनी में लोकतंत्र नहीं है। वहां के हुक्मरानों को मानवाधिकार की वैसी कोई परवाह नहीं है, जैसी कि भारत के मामले में आये दिन दिखाई देती है। चीन में सरकार को असीमित अधिकार हैं और वहां उन अधिकारों को कुशलता से इस्तेमाल करने का रिवाज़ है। हमारे यहां तो कब सड़क-रेल जाम हो जाए, कहना मुश्किल है।
माओ के चीन में माओवाद नहीं है। हमारे यहां उसका विकराल और वीभत्स रूप हमारे सामने है। हमारे नक्सली सरकार के विरोध के नाम पर ग़रीबों और आदिवासियों के हितों के दुश्मन बन गये हैं। वो इनका भला नहीं चाहते हैं। उनके पास विकास का कोई मॉडल नहीं है। तमाम सरकारी उपेक्षाओं, भेदभाव और भ्रष्टाचार के बावजूद कहीं-कहीं जो कुछ मामूली सा विकास नक्सल प्रभावित इलाकों में पहुंचा भी उसे भी नक्सलियों ने मिटा डालने की ही कोशिश की। साल 2009 में नक्सलियों ने 71 स्कूल भवन, 23 पंचायत भवन, 7 हाई ट्रांसमीशन इलेक्ट्रिक टॉवर, 67 मोबाइल टॉवर, 2 बिजलीघर और 7 खानों को बर्बाद कर दिया। सैकड़ों जगहों पर सड़कों का नामोनिशान मिटा दिया। इससे किसका भला हुआ? सड़क नहीं होगी तो सम्पर्क कैसे होगा? संचार तंत्र नहीं होगा तो जानकारी कैसे मिलेगी? सरकारी योजनाओं को फायदा उन लोगों तक कौन पहुंचाएगा, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?
सरकार के काम करने का तरीका बेहद जटिल होता है। अगर नीयत साफ भी हो तो भी मामूली से काम को भी करने में वक्त काफी लगता है। आज़ादी के 63 साल बाद भी जहां स्कूल नहीं है। वहां स्कूल शुरू करने में कम से कम पांच साल लग जाते हैं। फर्ज़ कीजिए, स्कूल की योजना बनी। लागू करने का ज़िम्मा राज्य को मिला। ज़मीन हासिल की गयी। नक्शा बना। पास हुआ। निर्माण के लिए पैसा जारी हुआ। टेंडर हुआ। ठेका मिला। भवन बना। स्कूल में अध्यापक को तैनात करने का ज़िम्मा शिक्षा विभाग या पंचायत को दिया गया। किसी की नियुक्ति हुई। विद्यार्थी जुटे। अभी शिक्षा का दीप ठीक से जला भी नहीं कि नक्सलियों ने स्कूल भवन को उड़ा दिया। अब ज़रा सोचिए, नया स्कूल बनने में जो पांच साल और लगेगा तब तक क्या होगा पिछड़े इलाके के लोगों का?
एक तो वैसे ही सरकारी तंत्र निकम्मा है। बड़ी मुश्किल से गिर-पड़ कर एक अदद स्कूल उस इलाके में पहुंचा भी तो नक्सली को बर्दाश्त नहीं हुआ। यहां हम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहते हैं कि अच्छा पैसा खर्च करने के बावजूद नया स्कूल भवन घटिया बना है। पूरी उम्मीद है कि स्कूल में बिजली, पानी, शौचालय और बुनियादी फर्नीचर भी नहीं हो। ज़रूरत पांच अध्यापकों की है। लेकिन नियुक्ति एक या दो की ही हो पायी है। ऐसी दशा में नियुक्ति हो जाने के बावजूद अध्यापक आये दिन स्कूल से गैरहाज़िर रहता है, क्योंकि पास-पड़ोस के कस्बे से भी दूर-दराज़ के इलाके में अध्यापक का रोज़ाना पहुंच पाना आसान नहीं है। अगर नक्सली खौफ़ का साया प्रचंड हो तो फिर ज़रा उसके बारे में सोचकर देखिए। वो ठीक से नौकरी करने के बजाए हरेक ऐसी जुगत भिड़ाने में ही लगा रहता है कि किसी तरह से उसका तबादला वहां से हो जाए। उसकी उन लोगों से भी मिलीभगत रहती है जिनका काम उसके काम की निगरानी का होता है। कुछ ही समय में अध्यापक का तौर-तरीका गैरज़िम्मेदार सरकार की प्रतीक बन जाता है।
ऐसी ही हालत अस्पताल-डिस्पेंसरी, या बिजली-पानी-सड़क मुहैया करवाने वाले उन तमाम महकमों की भी होती है जिनको सरकारी भारी झंझट झेलकर किसी तरह से ग़रीबों तक पहुंचाने की कोशिश करती है। इन सबसे बीच अगर पुलिस-थाना और वन विभाग जैसे महकमे भी हैं तो फिर समझ लीजिए कि ग़रीबों और आदिवासियों पर ज़ुल्म-ज़्यादती करने वाला सारा भ्रष्ट तंत्र वहां मौजूद है। सरकारी ज़ुल्म के खिलाफ गुहार का कोई तंत्र नहीं है। कोर्ट-कचहरी से गैरनक्सली इलाके को लोगों को तो इंसाफ मिलता नहीं है, तो फिर बेचारे आदिवासियों को मिलता होगा? इसकी कल्पना करना भी बेमानी है। इससे ग़रीब जनता का सरकार से भरोसा उठ जाता है। कानून के राज में उसकी कोई निष्ठा नहीं होती। हो भी नहीं सकती। बाकी भारत में भी कितनी है?
इसीलिए समाधान चाहिए तो सरकारी तंत्र को दुरूस्त करना होगा। सिर्फ नक्सलियों से ही ये उम्मीद करने से बात नहीं बनेगी कि वो खाई में नहीं कुएं में गिरें। देश दो तबकों में बंटा हुआ है। एक है जो सरकार को नकारा और अपना दुश्मन मानता है। दूसरा वो है जो इस तबके की दुर्दशा से बेपरवाह है। देश का विशाल क्षेत्र गहरे संकट में है। युद्ध क्षेत्र बना हुआ है। ये जान लीजिए कि अगर सरकारी व्यवस्था नहीं बदली तो नक्सलवाद नहीं मिटेगा। नक्सलवाद मिटा नहीं तो फैलेगा ही। फैलेगा तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। तमाम खामियों के बावजूद इंसान अभी तक लोकतंत्र से बेहतर शासन प्रणाली नहीं विकसित कर सका है। ज़रूरत सिर्फ लूट-खसोट का मौजूदा स्वरूप को खत्म करने की है।
लूट-खसोट ही भ्रष्टाचार है। यही कानून के राज की जड़ों में दीमक का काम कर रहा है। कानून का राज चाहिए तो अदालतों पर भारी निवेश करना होगा। पुलिस में सुधार लाना होगा। लोगों को जल्द इंसाफ दिलाना होगा। ये ठीक तो राजनीतिक तंत्र सुधरेगा। वो सुधरा तो हुकूमत सही होगी। ग़रीबों को उनका हक़ देने की कोशिश होगी। ग़रीबों का भला होने लगेगा तो समझिए कि जंग में जीत करीब है। पुलिस और अदालतों पर होने वाला भारी खर्च भी अनुत्पादक निवेश नहीं हैं। ये हमारे रक्षा बजट की ही तरह है।
अर्थनीति में रक्षा बजट को उस सम्पत्ति के लिए बीमे की किश्त की तरह से देखा जाता है, जो देश के भीतर मौजूद है। इसी तरह से अदालत और पुलिस पर होने वाला निवेश भी देश की सम्पत्ति के सही सार-संभाल के लिए ज़रूरी है। जैसे किसी भवन की सुरक्षा के लिए जहां चौकीदार ज़रूरी हैं। उसी तरह से भवन को ठीक-ठाक रखने के लिए नियमित रंगाई-पुताई और रोज़मर्रा की टूट-फूट की मरम्मत का इंतज़ाम होना ज़रूरी है। यहां चौकीदारी का खर्च रक्षा बजट जैसा है, जबकि पुलिस और अदालत का खर्च बाकी देख-रेख के जैसा है। सरकार के इक़बाल के लिए इनका दुरुस्त होना ज़रूरी है। लेकिन इनका देश में क्या हाल है, ये किसी से छिपा नहीं है!
नक्सलवाद और उसके समर्थकों को हर हाल में ये समझाना होगा कि विकास से ग़रीबों को दूर रखने का सिलसिला अनंत काल तक जारी नहीं रह सकता। देश ग़रीबों और आदिवासियों को सिर्फ उनकी किस्मत के भरोसे ही नहीं छोड़ सकता। उस ज़मीन को विकास से नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता है, जहां खनिज हैं। जहां बांध बन सकते हैं। जहां बिजलीघर के लिए कोयला मौजूद है। विकास के इस रास्ते का कोई और विकल्प नहीं हो सकता। अलबत्ता विकास सच्चा होना चाहिए। वर्ना उसके दावों पर कोई भला कैसे भरोसा करेगा?
उद्योग सरकार से बेहतर कानून-व्यवस्था चाहते हैं। लेकिन अपने फायदे के लिए वो ही सबसे पहले कानून-व्यवस्था को भ्रष्ट बनाते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में जाने वाले उद्योगों को सिर्फ अपने मुनाफे की परवाह करने तक नहीं छोड़ा जा सकता। उन्हें इलाके के विकास का ज़िम्मा भी लेना होगा। इसमें कोई शक नहीं कि निजी क्षेत्र की कार्यशैली में जबावदेही तेज़ी से तय होती है। तेज़ी से फैसले लेने के चलते ही निजी क्षेत्र, सरकारी तंत्र के मुकाबले ज़्यादा कारगर बनता है। समाज को सरकारी धन और निजी क्षेत्र की तेज़ी के बीच संतुलन बनाना सीखना होगा।
अब केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने गांवों के संम्पूर्ण विकास का काम एक साथ करने की एक बड़ी योजना का सपना देखा है। वैसे ये सपना उसे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दिखाया था। इसके तहत सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ किसी भी गांव में बिजली, सड़क, पानी, स्वास्थ्य, सीवर, नाली, स्ट्रीट लाइट वगैरह सारे विकास के काम का ज़िम्मा किसी एक कॉरपोरेट को सौंपेगी। पूरे प्रोजेक्ट में निजी क्षेत्र का निवेश 35 फीसदी और बाकी 65 फीसदी सरकार को होगा। तीन साल में प्रोजेक्ट को पूरा करके दस साल तक कॉरपोरेट को उसे चलाना होगा। बदले में वो जनता से सरकारी दाम पर सुविधाओं का पैसा वसूल करेगी। और उससे कारोबार चलाएगी। ये काम भी किसी गांव पर थोपा नहीं जा सकता। अगर वहां के लोग इसे चाहेंगे, तभी ये आगे बढ़ेगा। फिलहाल, देश की तमाम जानी-मानी कंपनियों ने ऐसे प्रोजेक्ट में रूचि दिखाई है। इस साल सरकार दस गांवों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसे चालू करेगी। अनुभव सफल रहा तो ऐसा प्रयोग हुकूमत के क्षेत्र में क्रांति ला सकता है।
ज़रूरत, पुराने लाइलाज़ मर्ज़ का ऐसा इलाज़ ढूढ़ने की है जो कारगर साबित हो। नयी दवाई विकसित करने पर भी काफी निवेश करना पड़ता है। ऐसा ही हमें पुलिस और अदालत के मामले में करके दिखाना होगा। ये ठीक होंगे तो तमाम बाकी भ्रष्टाचारों को रोकने में सहायक होंगे। इसी से सुधार मुमकिन होगा। समाधान सिर्फ इलाज़ की नया तरीका और नयी दवाईयां ही हैं। इन्हें ही विकसित करना होगा। वर्ना मौजूदा तंत्र तो पूरी तरह से विफल हो ही चुका है। किसी को उस पर एतबार नहीं है। सभी लाचारी में ही उसे झेल रहे हैं। आदिवासियों पर कब्जा करना आसान था, इसीलिए नक्सली वहां कामयाब हुए। बाकी जगहों पर भी नक्सलवाद की तरह ही भ्रष्टाचार, लोकतंत्र को जहर चटा रहा है। फिर भी लोकतंत्र को तो बचाना ही होगा। इस महायज्ञ में हमें और की भूमिका से ज़्यादा अपने योगदान को तव्वज़ो देनी होगी।
((मुकेश कुमार सिंह ज़ी न्यूज़ में विशेष वरिष्ठ संवाददाता हैं। आप उनसे mukesh1765@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))
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नक्सलवाद ka teekha jahar kaha or kab paida huaa. Jin logo ke pass tan dhakne ke liye kapdha or khana nahi , unke pass mahge asle -hatiyaar kaha se aaye hai. Enka aaka kown hai jo enko sabhi cheej muhaiya kara raha hai. Naksalvaad ne aatankvaad ka rup grahan kar liye hai. Pahle hum Paki atankvaadi se darte the . Aaj pura chhatishgad Naksali ki chapet me aa chuka hai. Rajeenti ke naam par vote ki rajneeti har pranta me hoti hai. Gareev aadvasio ko naksali ka chola pahna kar aatank ki nayee ped khada kiya ja raha hai. Kendra sarkaar chup hai. Har din ek naya hadas ho raha hai. Mujhe yaad hai . Jab patrakarita ke shruaati dour me jagdalpur me kuchh din coverage kiya tha. mere dimaag me aadvasi the . Mai janna chahta th. aakhir bah naksali kyo bante hai. usme kuchh ka javab sunya tha magar kuchh ke muh khul gaye . Hame roti -kapda milta hai. Sarkaar hame kuchh nahi deti hai. yah police vale hamari gharvali ki ejjat lut lete hai . Hmmm kya kare . Ek mahila to bahut tej thi . Jab vah hamari ejjat par haat dal dete hai to hamara aadmi goli nahi dal sakta hai. Hamara Mard mere sath kam banduk ke sath jayda sota hai. unke chehre par hajaro Q the. Jab hamare pass paisa nahi fir bhi yah neta humse sab kaam kara lete hai. yah humko sabkuchh dete hai. hame kisi cheej ki kami nahi hai . Pahle en logo ne hame use kiya hai , Ab hum use kar rahe hai. Matlab saaf tha. Nakalvaad ke peeche kuchh neta bhi the . chhatisgad me kuchh chhetra naksli prabhavit hai. Vaha ke MP- MLA hame surachha – paisa or hatiyaar dete hai. Sacha kaha jaye to kahi naksalvaad ke peeche khud aadvaasi hai to kahi Neta bhi sath de rahe hai. Eska jimmedaar kown hai.