बकबक मत कीजिए, दम है तो माहौल बदलिए
यह बहसतलब की ही कड़ियां हैं। अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी की बहस हैबिटैट से निकल कर यहां, मोहल्ला लाइव पर शुरू हुई। शीबा ने सवाल उठाया था कि हिंदी फिल्मों के लिए दलित एक रूमानी टूल है – विश्वदीपक ने हामी भरी और बहसतलब में ही कहीं गयी अनुराग कश्यप की बातों पर लगभग तंज कसे। शीबा का सवाल यहां देख सकते हैं : हमारी फिल्मों के दलित चरित्र इतने निरीह क्यों हैं? और विश्वदीपक का तंज यहां देख सकते हैं : कायदे से शीबा के सवालों के जवाब अनुराग को देने चाहिए। वहीं, जहां ये सारी बहस चल रही थी, अनुराग ने जवाब दिया है। सरल-साफ लहजे में। बिना किसी बौद्धिक व्याकरण के। हम उनकी प्रतिक्रिया पढ़ें : मॉडरेटर

विश्वदीपक, एनएफडीसी में कुछ सात फिल्में दलितों को लेकर पिछले दो सालों में बनी हैं और तैयार पड़ी हैं। जितने लोग इस ब्लॉग पर आते हैं, उतने भी मिल कर उन फिल्मों को रीलीज करवा लें, बाजार को नकार करके, तो मैं मान जाऊं…
आप आशावादी हैं, मैं यथार्थ में रहता हूं। आप चीजें, हालात बदलने के सपने देखते हैं, हम बाजार में अंदर से धीरे धीरे चीजों को बदल रहे हैं। आपकी मंशा सराहनीय है। लेकिन फिर उन चीजों को बदलने की बात मत करिए, उन्हें बदलिए। मेरी खुद की आंखों के सामने, बहुत सारे आप जैसे लोग आये, अनीश रंजन एक थे, एक आरके बजाज थे, सब आये, पैसे बनाये, चले गये। दलित वहीं रह गया।
मैं बात करने वालों का भरोसा नहीं करता, उसका करता हूं, जिसकी गांड में दम है कि वो मैदान में कूदे, हालातों को बदले, सिनेमा बदले, मैं झुक कर उसे सलाम करूंगा… और उसके पीछे आऊंगा। बोलना जो है, पादने जैसा होता है, बदबू ही फैलती है, बदलता कुछ नहीं है।
(अनुराग कश्यप। हिंदी सिनेमा में नये और मौलिक कंटेंट पर काम करने वाले युवा फिल्मकार। सत्या की पटकथा से चर्चा में आये। ब्लैक फ्राइडे, देवडी और गुलाल महत्वपूर्ण फिल्में। उड़ान के निर्माता। उनसे anuragkashyap2000@yahoo.co.in पर संपर्क कर सकते हैं।)
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