क्या पूंजी पत्रकारिता और पत्रकारों को खा गई है?
कांशीराम ने पत्रकारों पर हाथ लहराया था तो एसपी सिंह सड़क पर पत्रकारों के समूह को संबोधित करते हुए यह कहने से नहीं चूके कि राजनेता कमरों में बैठ कर जोड़-तोड़ करते हैं और जनतांत्रिक मूल्यों को ताक पर रख कर सत्ता पाना चाहते हैं; ऐसे में पत्रकार दिन भर जूझते हुए अपना काम करता है तो यह भी उन्हें बर्दाश्त नहीं होता। राष्ट्रपति भवन में ज्ञापन सौंपने जाते पत्रकारों के सामने एसपी सिंह पांच मिनट से ज्यादा नहीं बोले। लेकिन जो कहा उसका सार यही था कि सत्ता की मदहोशी में नेता संविधान और लोकतंत्र को भी ताक पर रख देते हैं, और पत्रकार जब इस सड़ी- गली राजनीति के बारे में बताता है तो यही राजनीति लोकतंत्र की दुहाई देकर मीडिया पर अंकुश लगाना चाहती है।
यह घटना चौदह साल पुरानी है। लेकिन इन चौदह सालों में मीडिया और राजनीति एक दूसरे के नजदीक आ गए गई और अब पत्रकार पर राजनीति से ज्यादा मीडिया सवाल दागने को तैयार है। ‘नंदीग्राम डायरी’ लिखने वाले पत्रकार पुष्पराज का अठारह जून को फोन आया कि उन्हें नंदीग्राम में पुलिस ने यह कह कर रोक लिया कि आपको यहां आने की जरूरत क्या है, यहां आपकी जान को खतरा हो सकता है। पुष्पराज ने जब सवाल किया कि सुरक्षा देने का काम तो आपका है, इस पर जवाब मिला कि सिर्फ नंदीग्राम की सीमा तक; आगे कौन क्या करता है वह हमारी सीमा में नहीं आता। सत्रह जून को आनंदस्वरूप वर्मा ने बताया कि नेपाल के माओवादियों पर बनाए उनके वृत्तचित्र को सेंसर बोर्ड ने यह कह कर रोक दिया है कि इससे भारत के माओवादियों की विचारधारा को शह मिलेगी। आनंदस्वरूप वर्मा का सवाल था कि नेपाल में माओवादी जनतांत्रिक तरीके से सत्ता में आए और उनके नेता प्रधानमंत्री भी बने और भारत सेराजनयिक संबंध भी बरकरार रहे, तो खतरा क्या है। जवाब मिला, फिलहाल देश में माओवादी गतिविधियों के मद्देनजर यह वृत्तचित्र आग में घी का काम कर सकता है। सोलह जून को कोलकाता में एक वैज्ञानिक और एक प्रोफेसर को माओवादी विचारधारा का समर्थन करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। दोनों ने सवाल किया, किसी धारा को पढ़ना-जानना उसको समर्थन करना कैसे हो सकता है? जवाब मिला, जब सरकार इस धारा को खतरा मानती है तो पढ़ने-जानने का मतलब भी सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करना होगा। इस तरह की तमाम खबरें सूचना से आगे नहीं बढ़ीं। इन तीनों घटनाओं में जो सत्ताधारियों के साथ खड़ा है वह सही और जो सवाल खड़ा कर रहा है वह अपराधी है। ऐसे में मीडिया की भूमिका क्या होनी चाहिए।
जाहिर है, दस साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी, लेकिन वर्तमान का सच यही है कि अगर सत्ता किसी खबर को सामने नहीं आने देना चाहती तो अधिकांश मीडिया पहले ही मान लेता है कि उस खबर को दिखाना सही नहीं है। असल में सत्ता अपनी ही नहीं, मीडिया की भी नई परिभाषा गढ़ने को तैयार है। खबरों को सूचना में बदलने की फिराक में सत्ता हमेशा रहती है और उसकी पहली कड़ी सूचना को भी बर्दाश्त नहीं कर पाना है। चौदह साल पहले सत्ता की जोड़-तोड़ में लगे कांशीराम से कौन नेता पिछले दरवाजे से कैसे मिल रहा है, इस सूचना को कांशीराम बर्दाश्त नहीं कर पाए और पत्रकार पर हाथ लहरा दिया। लेकिन बीते चौदह सालों की राजनीतिक सत्ता और मीडिया को देखें तो सत्ता की परिभाषा भी नई नजर आ सकती है। इस दौर में सत्ता का स्वाद हर राजनीतिक दल के नेताओं ने चखा। संयुक्त मोर्चे की सरकार से गठबंधन के दौर को राजग ने विस्तार दिया और यूपीए ने भी इसे स्वीकृति देकर इस सच पर ठप्पा लगा दिया कि सत्ता का मतलब सिर्फ इशारा है। यानी सत्ता बदलने पर नीतियों में परिवर्तन या विचारधारा में बदलाव की बात अब नहीं होती। मायने रखता है तो यह कि लोकतंत्र के चारों स्तंभ किसके इशारे को मानेंगे। सत्ता जिसकी होगी इशारा उसी का चलेगा।
ऐसा नहीं है कि चौदह साल पहले सत्ता इशारा नहीं करती थी या फिर मीडिया उन इशारों के खिलाफ इशारा कर जनता को संजीवनी और लोकतंत्र को आक्सीजन देने से नहीं घबराता था। मुश्किल यह है कि सत्ता की नई परिभाषा के घेरे में चौथा स्तंभ भी खुद को सत्ता मानने लगा है और उसका अपना इशारा भी सत्ता सरीखा हो चला है।
इसलिए मीडिया संस्थान खबरों को छोड़ कर खबरों पर सेमिनार कराने को तैयार हैं, और लकीर के इस और उस ओर के दोनों प्रतिद्वंद्वियों को खड़ा कर चौथा खंभा होने का धर्म अपना रहे हैं। दंतेवाड़ा से लेकर नंदीग्राम तक के सामाजिक-आर्थिक विकास का सच न्यूज चैनल पर कौन देखेगा, इस सवाल को उठाने वाले मीडिया संस्थान अगर दंतेवाड़ा पर ‘नक्सलवाद, राजनीति और मीडिया’ विषय पर एक सेमिनार करा लें, जिसमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से लेकर उनकी नीतियों का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का जमावड़ा एक मंच पर हो जाए, तो उनकी यह एक नई सफलता होती है।
विचित्र है कि एक ओर मीडिया से सरोकार की खबरें गायब होने लगीं, आम लोगों की जरूरतों से जुड़े मुद्दे हाशिए पर चले गए, ग्रामीण- आदिवासी का सवाल गैर-कानूनी सरीखा लगने लगा, और दूसरी ओर, इसी दौर में मीडिया संस्थानों ने सेमिनार और अलग-अलग आयोजनों में इन्हीं मुद्दों को उठाया। असल में मीडिया में खबरों के नरम होने से ज्यादा खतरनाक समाज के चुभते सवालों को पांचसितारा आयोजनों में धुएं में उड़ा कर ब्रांडिंग करना है। ब्रांडिंग का सीधा मतलब मुनाफा है, जिसमें प्रायोजक बन कर मुनाफा वही देते हैं जो मुद्दों की वजह होते हैं।
छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सत्ता से हमजोली कर खनन के जरिए करोड़ों रुपए कमाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ही अगर आदिवासियों के संकट पर होने वाले सेमिनार की प्रायोजक हो तो सवाल कौन खड़ा करेगा। मीडिया की अपनी भूमिका जब सत्तानुकूल है तो ऐसे सेमिनार स्थल ही मंच का काम करेंगे और उसमें राजनीति पर फिल्मकार प्रकाश झा भी अपनी बात रखेंगे। लेखिका अरुंधति राय भी विचार व्यक्त करेंगी। शोभा डे भी कुछ कहेंगी। मेधा पाटकर भी होंगी। किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का वरिष्ठ अधिकारी भी विकास के सवाल पर अपनी बात रखेगा और किसी सांसद या मंत्री की मौजूदगी के साथ कोई संपादक सरीखा पत्रकार भी होगा। यह कॉकटेल आयोजन के लिहाज से बिकाऊ भी होगा और मीडिया के लिहाज से टीआरपी देने वाला भी। यानी कमाऊ सोच का यह तरीका ही असल में मीडिया की नई परिभाषा के तौर पर उभरा है। लेकिन यह कहना बेमानी होगा कि यह वर्तमान का सच है, न्यूज चैनलों की हकीकत है और पहले ऐसा नहीं था।
‘आजतक’ शुरू होने के बाद उसका असर और मुनाफे का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ा उसने कथ्य और नब्ज पकड़ने का सवाल उठाया। कथ्य का मतलब सीधे मुद्दे को पकड़ना था और नब्ज का मतलब राजनीतिक सत्ता के कान मरोड़ना था। कांशीराम का हाथ यों ही हवा में नहीं लहराया था। कैमरा अगर तस्वीर पकड़ रहा था तो उसे ‘आजतक’ मथ कर जनता के कठघरे में ही ले जाकर छोड़ता था। राजनीति यह बर्दाश्त नहीं कर पाती। जबकि यही तरीका एसपी सिंह का था। उनके साथ के पत्रकार आज निर्णायक पदों पर हैं और कहते हैं कि अगर एसपी होते तो वे भी आज बाजार के दबाव में लोकप्रिय रौ में बह चुके होते। लेकिन यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वे उस दौर में सहयोगी रिपोर्टरों से जो स्टोरी कवर करवाते उसे कवर तो आज भी किया जाता है, लेकिन उसका असर एसपी सिंह की सामाजिक-राजनीतिक समझ से होता हुआ ‘आजतक’ के कार्यक्रम में दिखाई देता था। और यह समझ ही उस दौर में ब्रांड थी और एसपी सिंह खुद आजतक के ब्रांड थे। यानी बाजार की नब्ज अगर पत्रकार नहीं पकड़े तो फिर मीडिया की नब्ज बाजार पकड़ लेगा, इसे एसपी बारीकी से समझते थे। इसीलिए बाजार के तरीकों को पूंछ से नहीं सूंड़ से उन्होंने पकड़ा और पत्रकारिता के पैनेपन को ब्रांड बना कर दिखाया।
अब के दौर की मुश्किल यही है कि बाजार को ही मीडिया अपनी नब्ज पकड़ने का न्योता देकर अपनी लीक छोड़ने पर उतारू है। ब्रांड बनने की होड़ यहां भी है, मगर उसके तरीके पत्रकारिता पर नहीं, बाजार पर टिका दिए गए हैं। यह नया सलीका खबरों के लिए इंटरनेट और गूगल पर आ टिका है, जबकि एसपी सिंह साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ से लेकर ‘आजतक’ के दौर में एक समांतर पत्रकारिता का स्पेस भी बनाते रहे। बिहार के ‘जनशक्ति’ में छपी चार लाइन की खबर, भोजपुर में एक दलित बच्चे को कुएं में जमींदार ने लटकाया। बस एसपी की नजर गई और पटना के अंशकालिक रिपोर्टर नवेंदु को लिफाफे में अखबार की कटिंग भेज कर दो लाइन की चिट्ठी लिखी। इस खबर को पकड़ो, और दो अंक के बाद ‘रविवार’ की वह कवर स्टोरी बनी। देश में राजनीतिक हंगामा हुआ। लोगों ने जाना कि विकास का सच गांव से कैसे कोसों दूर है और जमींदारी तले लोकतंत्र अब भी कैसे पानी भरता है।
दूसरा तरीका आईपीएफ की पत्रिका ‘जनमत’ को बचाने के लिए वैकल्पिक आर्थिक स्रोत पर दिल्ली के शकरपुर में 1996 में नजर आया। तब जनमत के संपादक रामजी राय ने एसपी से कहा आप आजतक से करोड़ों का लाभ दिलाते हैं, क्या जनमत सरीखी पत्रिका महज बीस हजार के जुगाड़ में दम तोड़ देगी? एसपी का जवाब था, यहां मैगजीन के लिए पूंजी चाहिए और वहां पूंजी के लिए टीवी है। इसलिए अंतर तो होगा, लेकिन हमारी जिम्मेदारी दोनों जगहों से निगरानी की है और इस पत्रकारिता के तरीके अलग-अलग नहीं हैं। यह हमें समझना भी है और बिगड़ों को समझाना भी है। इसलिए आजतक की जरूरत भी है और जनमत की भी। नहीं तो पूंजी हम सबको खा जाएगी। एसपी सिंह की मौत के तेरह साल बाद पत्रकारों को सोचना है कि यह सवाल कितना मौजूं है कि पत्रकारिता निगरानी कर रही है या पूंजी सबको खा गई है। ((जनसत्ता से साभार))Last 5 posts by पुण्य प्रसून वाजपेयी
- आदिवासी नेता बिक जायेंगे तो पार्टियों का घुसपैठ आसान हो जाएगा - September 9th, 2010
Short URL: http://www.janatantra.com/news/?p=12390








धारा में इतना बह चुकने के बाद भी सरोकारों को याद रख पाने के लिए बधाई। सरोकारों की उसी पत्रकारिता की उपज यानी एसपी के चेले ही लगभग सभी चैनलों पर निर्णायक पदों पर काबिज है। बस यही बात समझ में नहीं आती… जिन पर हिफाजत की जिम्मेदारी थी वह भी लूट में शामिल है, कैसे? आखिर वो कौन-सी मजबुरी है जिसके आगे सब नतमस्तक है? पाठक-दर्शक-जनता जानना चाहती है… समझना चाहती है उस मजबुरी को।
… अगर ये लूट में शामिल नहीं है तो उस कुनबे को धारा से खुद को अलग कर लेना चाहिये। यकीन मानिये वे सारे लोग बाजार की भाषा में खुद “बड़े ब्रांड” हैं। ये सारे “सरोकारी ब्रांड” एक-साथ एक जगह खड़े भर हो जायें… वर्तमान धारा थम जायेगी। फिर मोड़ लें उसे सही दिशा में… आप भी उनमें से एक हैं… आइये आगे बढ़िये… नतीजे उम्मीद से भी बेहतर निकलेंगे।
Mai us peedhi me hun jisne poonji ki isi bahti hawa me hosh sambhala h. aap jase longo se sahi tasveer samjhne me madad milti h. Aapki bebak aur paini nazar ko salam!!