मैं हार मानता हूं, आप जीते, आपकी बात आखिरी …

अनुराग कश्यप ने यह टिप्पणी मोहल्लालाइव पर चल रही बहस के दौरान दी है। दिलीप मंडल के सवालों पर। इसके साथ ही मोहल्लालाइव पर फिल्मों में आम आदमी या दलित को लेकर चल रही जंग यही स्थगित की जा रही है। यह एक सही कदम है। क्योंकि यह बहस अब बहस नहीं रह गई थी। यहां लोग मजबूरियों पर चर्चा करने की जगह दूसरों की तुलना में खुद को श्रेष्ठ साबित करने में जुटे थे। और जब भी कोई बहस इस मोड़ पर पहुंच जाए, मुद्दा पीछे छूट जाता है। यहां भी मुद्दा बहुत पीछे छूट गया। - मॉडरेटर

हमारे यहां वो नहीं हो सकता, जो यूरोप और अन्‍य देशों में हुआ है। हमारे देश में डेमोक्रेसी के मायने अलग हैं। हमारे यहां पिक्‍चरों में मोची, चमार, बार्बर, तेली जैसे शब्‍द काट दिये जाते हैं, क्‍योंकि उनके जो पॉलिटिकल रिप्रजेंटेटिव हैं, वो आई और बी मिनिस्‍ट्री पे चढ़ बैठते हैं, जो सेंसर बोर्ड पे चढ़ बैठता है।

गुलाल में से सिर्फ दो शब्‍द सेंसर किये गये, जब पृथ्‍वी बना (गुलाल में एक किरदार) कहता है, सारे गोल चश्‍मे वाले ऐसे ही होते हैं, गांधी अंबेदकर। उनके चश्‍मे गोल थे, अंडरस्‍टैंडिंग भी गोल थी। गांधी और अंबेडकर काट दिया गया। वाक्‍य का मतलब क्‍या रहा?

आपका आइडियलिज्‍म जो है, यहां के यथार्थ में रह कर इस्‍तेमाल करिए। आप अपने न्‍यूज चैनल को क्‍यों नहीं बदल पा रहे? क्‍या रोकता है आपको? जो आपको रोकता है, हमें तो पनपने ही नहीं देता। हमसे ज्‍यादा ताकत आप न्‍यूज वालों के हाथ में है। आप एक बदलिए, फिर देखिए, हम भी दो बदलेंगे…

बाकी इस बहस से कुछ अच्‍छी कहानियां सामने आ रही हैं, वो पढ़ते हैं। मैं आपसे हार मानता हूं। आप जीते, आपकी बात आखिरी। फिर मिलेंगे, दस सालों में देखेंगे – किसने क्‍या बदला और कौन खुद बदल गया।

नमस्‍कार।

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Posted by on Jul 7 2010. Filed under ब्लॉग. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

1 Comment for “मैं हार मानता हूं, आप जीते, आपकी बात आखिरी …”

  1. राजेश

    ये जगहे ही ऐसी हैं। यहां कोई भी आता है तो हार कर ही जाता है।

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