हंस की गोष्ठी में अरुंधती के न आने से आखिर क्या धमाका होगा?

अरुंधती रॉय ने हंस के सालाना कार्यक्रम में जाने से इनकार कर दिया है। उन्होंने नीलाभ को ई-मेल करके सावधान करने के लिए धन्यवाद दिया है। नीलाभ ने उन्हें बताया था कि सत्ता से पैसे लेने के बाद बहेलिये (राजेंद्र यादव) ने अरुंधती का शिकार करने के लिए जाल बिछाया है। अरुंधती उस कार्यक्रम में गईं तो उनकी छवि मिट्टी में मिल जाएगी और उनकी सियासत ख़त्म हो जाएगी। हंस की “दुकानदारी” चमक जाएगी।

इस बारे में मेरी और अविनाश की राजेंद्र यादव से बात हुई। बहसतलब तीन का निमंत्रण देने हम दोनों उनके दफ़्तर पहुंचे थे। वहां हमने पहला सवाल यही किया कि क्या उन्होंने अरुंधती और विश्वरंजन के बीच दंगल कराने की योजना बनाई थी? वो काफी तनाव में थे और उन्होंने कहा कि अभी यह सब बातचीत के स्तर पर था। फाइनल नहीं हुआ था। इसलिए ना तो कहीं कोई न्योता भेजा गया था और ना ही कहीं कोई प्रचार किया गया था। हां, हंस के दफ़्तर में जो लोग आते थे उन्हें विषय जरूर बताया जाता। और यह भी कि किन-किन लोगों से बात चल रही है। उनके कार्यक्रम में हर साल अलग-अलग विचारधारा के लोग आते हैं। बीते साल भी अरुंधती आईं थी। वो अरुंधती का बहुत सम्मान करते हैं और इस बार भी उन्हें बुलाना चाहते थे। कई और लोगों से भी उनकी बात हुई थी। कुछ ने सहमती दी थी और कुछ ने सकारात्मक संकेत दिये थे। फाइनल न तो अरुंधती ने किया था और ना ही विश्वरंजन ने।

फिर मैंने पूछा कि अरुंधती के आने से आपकी दुकानदारी कैसे चमकेगी? इस पर वो बोले कि यह तो वही बता सकते हैं जो आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी मंशा इतनी ही थी कि राज्य की हिंसा पर बहस हो। वह बहस हो भी रही है। मीडिया के जरिए। अलग-अलग मंचों पर। लेकिन वो चाहते थे कि हंस के सालाना कार्यक्रम में एक जोरदार बहस हो। इससे अधिक उनकी कोई मंशा नहीं थी।

दरअसल, राजेंद्र यादव पर आरोप लगाने वाले नीलाभ जैसे लोगों की यही सीमा है। वो इससे ऊपर सोच ही नहीं सकते कि किस कार्यक्रम में किसने किसके साथ मंच साझा किया? और कौन कहां बुलाने पर भी नहीं पहुंचा? यही वजह है कि वो हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रहते हैं कि उनकी छवि खराब नहीं हो। उनकी सारी की सारी कवायद सामाजिक छवि को सहेजने में लगी रहती है। शायद उनकी सियासत और दुकानदारी इसी से चलती है!

नीलाभ जैसों की संकीर्ण मानसिकता के कारण ही आज वामपंथ का इतना बुरा हाल है। आज वामपंथी दलों में जितनी गुटबाजी है और जितने घड़े हैं वो किसी भी विचारधारा में नहीं है। न दक्षिणपंथी और न ही समाजवादी। इससे भी अधिक हैरानी की बात तो यह है कि सारे वामपंथी दूसरे वामपंथी दलों को खारिज करते हैं और यह दंभ भरते हैं कि सच्चे मार्क्सवादी वही हैं। नीलाभ जैसे लोगों की एक और बड़ी दिक्कत है। कोई उनकी राय से असहमत हुआ तो वो अचानक सत्ता का एजेंट और दलाल घोषित कर दिया जाएगा। जैसे उसके बैंक अकाउंट पर उनकी नजर हो और यह पता चल जाता हो कि सत्ता तंत्र में बैठे लोगों ने उस शख़्स को कितना पैसा दिया है!

यह सब जानते हैं कि राजेंद्र यादव ने कोई महल खड़ा नहीं किया है और ना ही मर्सिडीज में घूमते हैं। लालू यादव से पैसे लेने के बारे में वो कई बार जवाब दे चुके हैं कि उन्हें हंस चलाने के लिए पैसे चाहिए। यह बात सही भी है। कोई पत्रिका चलाना आसान काम नहीं है। वहां छह-सात लोग काम भी करते हैं। उनकी पगार देनी पड़ती है। और यह पगार नीलाभ जैसे लोगों के भरोसे नहीं दी जा सकती। और न ही उस बीस रुपये के भरोसे जितने में पत्रिका बिकती है। उसके लिए विज्ञापन भी लेना पड़ता है। और वैसे भी वह पैसा लालू यादव का नहीं था। वह पैसा सरकार का था।

लालू यादव के वाकये को जमाना बीत गया है। लेकिन उस गड़े मुद्दे को उठा कर नीलाभ क्या साबित करना चाहते हैं? यही न कि उनसे अधिक प्रतिबद्ध कोई नहीं है! यह भी खुद को बेचने का और अपनी दुकानदारी चमकाने का खास अंदाज़ है।

राजेंद्र यादव के दफ़्तर से निकलने के बाद मैं और अविनाश इसी प्रकरण पर बात कर रहे थे। अविनाश ने कहा कि सरकारी नीति का विरोध करने वाले एक मौका चूक गए। होना तो यह चाहिए था कि अरुंधती भी आती और उनके चाहने वाले भी आते। मंच पर विश्वरंजन होते और मंच के बाहर सैकड़ों की संख्या में वो लोग होते जो क्रूर राज्य सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। हाथों में तख्तियां और बैनर लिए … हेम चंद्र के हत्यारों को सज़ा दो … गरीबों का नरसंहार बंद करो… आदिवासियों का क़त्ल मत करो … आतंकवाद से बात हां जी हां जी, नक्सलियों से बात ना जी नाजी…. चाहो तो हमें क़त्ल कर दो मगर हम ज़मीन नहीं देंगे…. फिर मंच से अरुंधती सत्ता को ललकारतीं … दिल्ली वाले भी देखते कि हक़ और इंसाफ़ की आवाज दबाई नहीं जा सकती।

अगर राजेंद्र यादव ने सत्ता से साठगांठ करके ही तमाशे के लिए मंच सजाया था तो उस मंच को लूट कर यह साबित किया जा सकता है कि किसी के इरादे कितने ख़तरनाक क्यों न हो हम उसे कामयाब नहीं होने देंगे।

लेकिन ऐसा करने की जगह नीलाभ अपनी दुकानदारी चमकाने लगे। अरुंधती की सलाहकार बन गए और राजेंद्र यादव का “गणित” समझाने लगे। और शायद इसी नए ओहदे से उनकी दुकानदारी चल रही है। नीलाभ को यह दुकानदारी मुबारक हो! उन तमाम लोगों को भी जो इस दुकानदारी को चला रहे हैं। लेकिन इतना तय है कि ऐसा करके वो किसी का भला नहीं करेंगे ना उन आदिवासियों का जिनके लिए वो चिंतित हैं और ना ही अपनी विचारधारा का। इस संकीर्ण विचार के साथ और लोगों को अछूत घोषित करने की ख़तरनाक और सामंती प्रवृति के साथ कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं खड़ा किया जा सकता। हल्की सी चोट की जा सकती है धमाका नहीं किया जा सकता।

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Posted by on Jul 15 2010. Filed under ब्लॉग, मुद्दा, सुर्ख़ियां. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

14 Comments for “हंस की गोष्ठी में अरुंधती के न आने से आखिर क्या धमाका होगा?”

  1. अभिषेक

    लालू यादव से पैसे लेने का आरोप लगाने वाले नीलाभ से पूछना चाहिए कि वो बीबीसी में क्या कर रहे थे? यह सब जानते हैं कि बीबीसी किसके पैसे से चलती है? और मुस्लिम देशों को लेकर बीबीसी की नीति क्या रही है। कुछ समय पहले फलिस्तीन के मुद्दे पर बीबीसी की सारी बेईमानी सामने आ गई थी। सुना है कि नीलाभ दूरदर्शन से और ऑल इंडिया रेडियो से डॉक्यूमेंट्री भी बनाते हैं। जिस तरह बिहार सरकार का पैसा लालू का हो गया तो उसी तरह दूरदर्शन और रेडियो का पैसा भी तो सरकार का हुआ? तब क्यों नहीं कहा जाए कि नीलाभ भी सत्ता के एजेंट बन गए हैं?

  2. प्रभात राय

    नीलाभ को अपना रुख साफ करना चाहिए। आखिर वो लोग चाहते क्या हैं? अगर राजेंद्र यादव से लेकर चिदंबरम तक सब अपराधी हैं तो फिर बार-बार यह क्यों कहा जा रहा है कि नक्सलियों से बात होनी चाहिए? आखिर नक्सली बात किससे करेंगे? और क्या अरुंधती ने कभी किसी के साथ मंच साझा नहीं किया है? क्या वो टेलीविजन चैनलों पर डिबेट में शामिल नहीं हुई हैं?

    इसलिए यह नौटंकी बंद होनी चाहिए। और अगर यह नौटंकी जारी रखनी है तो फिर सीधे-सीधे कहो कि सिर्फ़ और सिर्फ युद्ध होगा। अगर युद्ध होगा तब फिर किसी के मारे जाने पर रोना-धोना क्यों? उसकी शहादत का जश्न मनाओ। कहो आज एक शहीद हुआ है और कल हम के सब जान देंगे।

  3. विजय कुमार

    बहुत बढ़िया…नीलाभ को ये भी चाहिए वो कि अरुंधति रॉय को बुकर प्राइज़ के करोड़ों रुपये वापस करने को भी कहें…या ये बताएं कि वो प्राइज़ किस साम्यवादी क्रांति के तहत दिया गया था…अरुंधति के पास राजेंद्र यादव के मुकाबले कई गुना ज्यादा धन होगा..और वो धन मेहनतकश मजदूर की, सर्वहारा की कमाई तो नहीं है…इसी पूंजीवादी व्यवस्था ने अरुंधति को धनवान, स्टार और ‘सेलेब्रिटी’ बनाया है…

  4. zinda hun mein

    ye hui na baat! Is hamam mein sub nange hein bhai!

  5. suneeti gupta

    @विजय कुमार जी, इस तर्क से तो टैगोर, अमर्त्य सेन, सी.वी.रमन, नार्लीकर, नायपाल, मदर टेरेसा, राजेंद्र पचौरी सभी नोबल पाने वाले पूंजीवाद के ‘दलाल’ हैं। और मगासेसे से सम्मानित महाश्वेता देवी, सुदीप पांडे, बाबा आमटे, सुंदरलाल बहुगुणा, राजेंद्र सिंह, सुवन्ना आदि भी ‘दलालों’ से कम नहीं हैं। बुकर पाने वाले अरविंद अडिग, रुश्दी वगैरह भी ऐसे ही हैं।
    अब लगता है इस देश का नाम जगमगाने के लिए राजेंद्र यादव, विश्वरंजन, अविनाश और आप जैसे ग्रेट लोग ही बाकी बचे हैं।
    अरुंधति उसी तरह से ‘सेलिब्रिटि’ नहीं है, जिस तरह से नजरुल, रित्विक घटक, सुकांत, भगत सिंह, अशफ़ाक ‘सेलिब्रिटि’ नहीं हैं। क्या म्यांमार की आन सांग सू की भी ‘पूंजीवाद’ की ‘सेलि्ब्रिटि’ है।
    हमाम में कौन नंगा है, ब्लाग को टीवी चैनल बनाकर ‘सनसनी’ छाप ‘बिग फाइट’ का कमर्सियल शो चाहने वाले आप जैसे लोग, या अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगा कर, बस्तर के जंगलों में दर-दर भटकती एक औरत, यह वक्त बतायेगा…!

    • प्रभात राय

      @suneeti gupta ji,

      वक़्त तो बहुत कुछ बताएगा। इसलिए इसकी चिंता छोड़ दीजिए कि वक़्त क्या-क्या बताएगा! अब आपने अरुंधती को नायपाल, राजेंद्र पचौरी, रुश्दी और अमर्त्य सेन की कैटेगरी में खड़ा कर दिया है। यह तो उनके साथ बहुत बड़ा धोखा है। कम से कम ये लोग किस विचराधारा की वकालत करते हैं यह तो जग जाहिर है। क्या अरुंधती भी उसी विचारधारा की वकालत करती हैं?

      वैसे एक बात और कहें कि अरुंधती ने राजेंद्र यादव को सत्ता का दलाल नहीं कहा। यह तो उनके नीलाभ जैसे उनके चंपू कह रहे हैं। जब वो राजेंद्र यादव को सत्ता का दलाल कह सकते हैं तो नीलाभ जैसों को दलाल क्यों नहीं कहा जा सकता? और जिस तर्क को हथियार बना कर वो राजेंद्र यादव को कस रहे हैं उसी तर्क के आधार पर अरुंधती का मूल्यांकन क्यों नहीं होना चाहिए?

  6. suneeti gupta

    @प्रभात राय जी, वक्त वैसे अभी भी बता रहा है. ज़रा हिंदी साहित्य के बाहर की आवाज़ सुने. लेकिन क्या आपको सच मेन लगता है कि महाश्वेता देवी किसी विचा्रधारा की वकालत नहीन करती? वे ‘फ़्री थिंकर’ हैं ? दूसरी बात ये कि ‘विचारधारा’ सिर्फ़ ‘राजनीति’ तक नहीं सिमटी होती. अरुंधति जिस विचारधारा के साथ हैं, उसमें सिर्फ़ राजनीति नहीं, पर्यावरण, जातीय स्वतंतत्रता, नस्ली और धार्मिक उत्पीडन का विरोध और अहिंसा की पक्षधरता शामिल है. मुझे तो लगता है कि अरुंधति आज संसार के सभी मनवतावादियों और लोकतंत्र के समर्थकों के पक्ष में खडी हैं. राजेंद्र यादव या उनके ‘चंपू’ नीलाभ कौन हैं, यह मुझे नहीं मालूम. हिंदी सहित्य में मै अनपढ हूं इसलिए माफ़ करिये.

  7. प्रभात राय

    @suneeti gupta ji,

    बहुत पेंचीदा बात कह दी आपने। राजनीतिक, जातीय, नस्ली और धार्मिक हिंसा का विरोध और अहिंसा की पक्षधरता। यह बहुत कॉम्प्लेक्स चीज है। एक देश को चलाना बहुत मुश्किल काम है। जब अरुंधती कश्मीर में मिलिट्री ऑक्युपेशन का विरोध करती हैं और उनकी राय के मुताबिक चला जाए तो कश्मीर अलग हो जाएगा। उसी तरह उत्तर पूर्व भी अलग हो जाएगा … भारत बचेगा क्या?

    नक्सलियों को जब वो प्रतिरोध के हक़ के आधार पर हथियारबंद गांधीवादी बताती हैं तब वो उनकी उस विचारधारा की वकालत कर रही होती हैं जिसे माओवाद कहते हैं। जब यही माओवादी आएंगे तो प्रतिरोध के तमाम स्वरों को वो बुरी तरह कुचल देंगे। यह माओवादियों का इतिहास बताता है। तो क्या अरुंधती यही चाहती हैं?

    दरअसल सभी चीजें ब्लैक एंड व्हाइट के तौर पर नहीं होती हैं। एक कॉम्प्लैक्स स्ट्रक्चर है। अरुंधती की मंशा पर कोई सवाल नहीं उठा रहा। लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि उनके सभी तर्कों को उसी तर स्वीकार भी कर लिया जाए।

  8. suneeti gupta

    यह ‘देश’ क्या शै है, जिसको फौज और पुलिस के जरिये चलाने की ‘काम्प्लेक्स’ जिम्मेदारी आपने और आपकी गवर्नमेंट ने उठा रखी है, प्रभात जी. वो देश किसका है? क्या ३० कार्पोरेट घरानों और १५ से २० करोड़ के लगभग अमीर कज़्यूमर, नये मध्यवर्ग का देश?
    अरुंधती राय ने कभी भी, कहीं भी ‘माओवाद’ की ‘विचारधारा’ का समर्थन नहीं किया है. (वैसे आप फिर ‘विचारधारा’ के अर्थ को तोड-मरोड़ कर अपनी बात दूसरों के मुंह में रखने की कोशिश कर रहे हैं.) हां, गरीबों, आदिवासियों पर ज़ुल्म ढाने वाली ‘जातीय-नस्ली-धार्मिक और अंधराष्ट्रवादी ‘ ताकतों की दानवी, लोभी, राष्ट्र-विरोधी हिंसा के खिलाफ़ उत्पीडित लोगों द्वारा प्रतिरोध में अपनाती गयी आत्मरक्षात्मक ‘हिंसा’ का समर्थन अरुंधति ने किया है. आप बताएं, अगर किसी के घर में जबरदश्ती कोई हिंसक डाकू लूटने-मारने के इरादे से हथियारबंद होकर घुस आये तो उस परिवार के बच्चों-महिलाओं-बूढ़ों द्वारा आत्मरक्षा में रसोई की बेलन, चौका, चाकू, हथौड़े के इस्तेमाल का आप समर्थन करेंगे या विरोध?
    काम्प्लेक्स कुछ भी नहीं है प्रभात जी, आपके तर्क भी बिल्कुल सीधे और जाने-माने हैं। चिदंबरम और गडकरी इसे ज़रा बेहतर तरीके से कहते हैं. छुपा कर. आप खुल्लम-खुल्ला. अगर कश्मीर या उत्तर-पूर्व की जनता बर्बर, भ्रष्ट सवर्ण हिंदुओं की गुलाम बनकर नहीं रहना चाहती तो क्या आप उन्हें फौज़ की ताकत के दम पर कुचल देंगे.
    अगर हिंदुस्तान आज टूट और बिखर रहा है तो उसकी असली वजह यही सोच है, जो आपके खत से सामने आयी है.

  9. प्रभात राय

    suneeti ji
    आप मेरे एक सवाल का जवाब दे दीजिए और उसके बाद हम बात आगे बढ़ाएंगे…
    अगर माओवादी सत्ता में आते हैं तो कश्मीर और उत्तर पूर्व को लेकर उनकी क्या नीति होगी? क्या वो उन्हें यह तय करने का हक़ देंगे कि वो भारत में रहना चाहते हैं या फिर आज़ाद होना चाहते हैं?

  10. suneeti gupta

    इस सवाल का जवाब ‘माओवादी’ ही दे सकते हैं. क्या आप सोचते हैं कि मैं या अरुंधति राय, मेधा पाटकर या कोई भी इस देश का नागरिक जो आदिवासियों समेत दूसरे गरीब और वंचित लोगों के उत्पीडन और दमन के विरुद्ध है, वह ‘माओवादी’ है. यही वह समझ है जो आप, चिदंबरम, गडकरी, विश्वरंजन को उस मनुष्य वि्रोधी ‘राष्ट्रवाद’ की ओर ले जाता है, जिसके बारे में जेफ़रसन का विश्वविख्यात बयान है. आपने सुना ही होगा : ‘Nationalism (patriotism) is the last refuge of scoundrels.”
    शैतानों के जब सारे तर्क खत्म हो जाते हैं, तो वे ‘राष्ट्रवाद’ की शरण में जाते हैं. वह कौन-सा ‘राष्ट्रवाद’ है प्रभात जी, जिसमें नदियां, पेड, जंगल, गरीब, आदिवासी, दलित, अल्प-संख्यक, साफ़ हवा कुछ भी बाकी न बचे.
    वैसे अब आप एक मेरे दो सवाल का जवाब दीजिये. क्या ‘माओवाद’ एक ऐसी ‘फ़ेक आइडेंटिटी’ नहीं है, जो मीडिया, कार्पोरेट, भ्रष्ट सत्ताधारियों, उच्च हिंदू जातियों ने अपने से असहमत और अपनी लूट-खसोट के सामने अड़चन बन रहे लोगों और समुदायों को खत्म करने के लिए गढा है?
    दूसरा सवाल – क्या कश्मीर और उत्तर-पूर्व में अब सिर्फ़ ‘टेरोरिस्ट’ और ‘अलगाववादी’ ही रहते हैं?

  11. प्रभात राय

    यह किसने कहा कि आप, अरुंधती या मेधा पाटकर या फिर कोई और जो आदिवासियों समेत दूसरे गरीब और वंचित लोगों के उत्पीड़न और दमन विरुद्ध है, वह माओवादी है। यह सरकार का नजरिया होगा, मेरा नहीं। रही बात देशभक्ति की तो आप Nationalism (patriotism) is the last refuge of scoundrels को अंतिम सत्य मान रही होंगी, मैं नहीं। बहुत से लोग scoundrels नहीं हैं वो भी इसमें यकीन करते हैं और उनके लिए यह बचाव का हथियार नहीं है।

    जहां तक माओवाद के फ़ेक आइडेंटिटी का सवाल है। यह पूरी तरह सही नहीं है। माओवाद अस्सी के दशक से मौजूद है। बस अंतर यह हुआ कि अब सत्ता ने उसे एक थ्रेट के तौर पर प्रोजेक्ट किया है। इसलिए कि वो जगह खाली कराई जा सके। यह प्रोजेक्ट क्यों किया गया है इसका सीधा सा जवाब है कि वह जगह अब चाहिए। देश के विकास के लिए वह जरूरी है। आप उसमें हिस्सेदारी की मांग कर सकते हैं। आप उसके जितने भी मॉडल हैं उसकी वकालत कर सकते हैं। चाहे वो कोऑपरेटिव मॉडल हो या फिर कोई और मॉडल। लेकिन यह नहीं हो सकता कि वो जगह वैसे ही छोड़ दी जाए।

    माओवाद एक राजनीतिक आंदोलन है। उसे सिर्फ़ प्रतिरोध के तौर पर देख कर आप उसकी अहमियत को ख़त्म कर रहे हैं। हिंसक प्रतिरोध उस आंदोलन का हिस्सा है और प्रतिरोध के इस तरीके में उनका पूरा यकीन है। लक्ष्य मौजूदा सत्ता को उखाड़ फेंकना है और एक ऐसी सरकार और समाज का निर्माण करना है जो उनके हिसाब से न्याय और बराबरी की अवधारणा पर टिकी हो। वो इसी मकसद से युद्ध लड़ रहे हैं। और जब लड़ाई होती है तो उसमें नैतिक-अनैतिक कुछ नहीं होता। युद्ध में नैतिकता को लाना मूर्खता से अधिक कुछ नहीं।

    तीसरी बात, जहां तक कश्मीर और उत्तर पूर्व का सवाल है… यह भी आपसे किसी ने नहीं कहा कि वहां सिर्फ़ और सिर्फ़ टेरोरिस्ट और अलगाववादी रहते हैं। यह आपकी धारणा होगी, मेरी नहीं। मैंने इतना कहा कि किसी इलाके के कुछ ताक़तवर लोगों के चाहने भर से उन्हें यह हक़ नहीं मिल जाता या फिर दिया जा सकता कि वह देश से अलग होने का फैसला सुना दें।

  12. chandan

    तुम लोग साले चूतिये हो .. और अरुंधती जैसे तुम्हारा चुतिया काट रहे हैं … .. यहीं बैठ के बहस करो .. उस-से ज्यादा कर भी नहीं सकते …

  13. [...] साथी अविनाश को और राजेंद्र यादव के बगलबच्चे समरेंद्र बहादुर को। नीलाभ के मुताबिक जनरल डायर यानी [...]

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