बांग्लादेश के संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ बहाल करने का आदेश
बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1972 के संविधान में एक बुनियादी सिद्धांत के रूप में शामिल ‘धर्मनिरपेक्षता’ को बहाल करने का आदेश दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के एक अपीलीय खंडपीठ ने 186 पृष्ठों के आदेश में बुधवार को कहा, “15 अगस्त 1975 को अस्तित्व में आए संविधान में से धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद और समाजवाद की अवधारणा को हटा दिया गया था जिसे अब बहाल किया जाएगा।”
15 अगस्त 1975 को ही देश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गई थी। मुजीब की हत्या के बाद बांग्लादेश में कट्टरपंथी राजनीति का दौर आया और सैन्य शासकों ने संविधान में संशोधन किए।
न्यायालय का मानना है कि सैन्य कानून की घोषणाओं द्वारा “एक संवैधानिक राष्ट्र नीति धर्मनिरपेक्षता को पीछे छोड़ दिया गया, हमारे स्वतंत्रता संग्राम की बुनियाद को नष्ट कर दिया गया और संविधान के अनुच्छेद 8 (1) और प्रस्तावना में निहित गणराज्य के मूल चरित्र को भी बदल डाला गया।”
सैन्य शासन के दौरान इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म घोषित किए जाने के संबंध में हालांकि न्यायालय का आदेश मौन है।
प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने एक संसदीय समिति के जरिए पिछले सप्ताह संविधान की समीक्षा की शुरू की है हालांकि ऐसे संकेत हैं कि इस्लाम बांग्लादेश का राष्ट्रीय धर्म बना रहेगा।
मूल रूप से संविधान में धर्म आधारित दलों के अस्तित्व पर प्रतिबंध है लेकिन हसीना ने पिछले सप्ताह संसद में कहा था कि जमात-ए-इस्लामी और इस्लाम आधारित दलों को प्रतिबंधित करने की सरकार की कोई मंशा नहीं है।
अटॉर्नी जनरल महबूबे आलम ने ‘द डेली स्टार’ समाचार पत्र से कहा कि ‘बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम’ शब्द संविधान की प्रस्तावना में बरकरार रहेंगे क्योंकि न्यायालय ने इस संबंध में कुछ नहीं कहा है।
पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्ष की नेता खालिदा जिया ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर वह बाद में अपनी प्रतिक्रिया देंगी।
उधर, ‘न्यू एज’ समाचार पत्र ने गुरुवार को लिखा कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से संसदीय समिति द्वारा संविधान की समीक्षा के सरकार के प्रयास में बाधा उत्पन्न हो गई है। (आईएएनएस)।
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