मकबरे में जूते मारकर होती है जियारत!

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के एक मकबरे में जियारत के लिए लोग चप्पल-जूतों का इस्तेमाल करते हैं। यहां आने वाले जायरीन (श्रद्धालु) चप्पल-जूतों से मकबरे में बनी कब्र को पीटते हैं। लोगों की मान्यता है कि इस अनोखी जियारत के जरिए वे सभी संकटों से मुक्त रहेंगे।

इटावा के बाहरी इलाके दतवली में स्थित �चुगलची का मकबरा� में जियारत का यह अनोखा तरीका एक परंपरा बन गई है। सैकड़ों वर्षो से यहां यह अनोखी परंपरा चली आ रही है। करीब 500 साल पुराना यह मकबरा सुनसान जगह पर है, वहां आस-पास आबादी नहीं है। वह चारों तरफ से ऊंची नक्कासीदार दीवारों से घिरा है लेकिन ऊपर छत नहीं है।

स्थानीय निवासी 71 वर्षीय ललई यादव कहते हैं , “जब भी में इस रास्ते से गुजरता हूं तो रुककर चुगलची के मकबरे में पांच जूते मारता हूं। दृढ़ विश्वास है कि ऐसा करने से बाधाएं टल जाती हैं। जो व्यक्ति लगातार एक महीने तक नियिमत रोज मकबरे पर जाकर जूते-चप्पलों से पिटाई करता है, उसके साथ-साथ उसके परिवार का भाग्य अच्छा हो जाता है। ”

मकबरे में बनी कब्र पर जूते मारने की इस परंपरा के पीछे एक कहानी भी प्रचलित है। स्थानीय 72 वर्षीय जगदेव शाक्य ने बताया कि इटावा रियासत के राजा सुमेर सिंह के यहां एक भोलू सईद नाम का कर्मचारी हुआ करता था। वह एक बार निकटवर्ती राज्य मध्य प्रदेश की भिण्ड रियासत घूमने गया उस समय भिण्ड और इटावा के मध्य अच्छे राजनैतिक संम्बन्ध थे।

बकौल शाक्य , “भोलू ने रातों-रात धनवान बनने के चाह में भिंड के राजा के मन में वैमनस्यता के ऐसे बीज बो दिए जिसके बाद दोनों राजाओं के बीच युद्ध छिड़ गया और बहुत बड़े पैमाने पर लोग मारे गए। बाद में राजा सुमेर ने युद्ध के कारणों की समीक्षा की तो चुगलखोर की करतूत सामने आई। उन्हें यह भी पता चला कि वह आस-पास की दूसरी रियासतों के राजाओं के कान भरके उन्हें सेना से जुड़ी गुप्त सूचनाएं भेज रहा है।”

स्थानीय निवासी वकील सिंह कहते हैं कि राजा ने अपने अधिकारियों से चुगलखोरी के लिए सजा के तौर पर भोलू को जूतों से पीट-पीट कर मारने के आदेश दिया। बाद में भोलू को रियासत के बाहरी इलाके में दफनाया दिया गया। राजा के निर्देश पर भोलू का मकबरा बनावाया गया। राजा ने फरमान जारी किया जो भी उस रास्ते से गुजरगे मकबरे में बनी कब्र पर पांच जूते मारेगा। इसके बाद से सिलिसलिा चल पड़ा जो आज भी जारी है।(आईएएनएस)।

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Posted by on Jul 29 2010. Filed under तीर-ए-नज़र. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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