नीलाभ जी बताइये, आप किसके दलाल हैं?

नीलाभ कौन है यह मैं नहीं जानता था। जब राजेंद्र यादव पर बहुत घटिये तरीके से नीलाभ ने लिखा और आरोप लगाया कि अरुंधती को बुला कर हंस के संपादक अपनी दुकानदारी चमकाना चाह रहे थे तो मुझे बुरा लगा। इसलिए कि मैं राजेंद्र यादव को तेरह साल से जानता हूं। अक्सर उनके दफ़्तर जाकर बैठता हूं और एक वक़्त में मैंने हंस के लिए लगातार लिखा भी था। मैं यह भी जानता हूं कि हंस जैसी पत्रिका निकालना और उसे छापते रहना आसान काम नहीं। जानता हूं कि राजेंद्र यादव ने कोई महल नहीं खड़ा किया है। यह भी कि अरुंधती बीते साल उनके कार्यक्रम में गईं थीं और उसके बाद भी राजेंद्र यादव की दुकानदारी चमकी नहीं थी। अगर चमकी होती तो यकीनन महल खड़ा हो गया होता।

इसलिए मैंने नीलाभ की भद्दी टिप्पणी का विरोध किया और कहा कि मूर्खता की हद तक वैचारिक संकीर्णता से कोई आंदोलन नहीं खड़ा होता। आंदोलन खड़ा करने के लिए थोड़ा उदार होना पड़ता है। लोगों की पहचान करनी पड़ती है कि किससे किस तरह का काम लिया जा सकता है… कौन कहां तक साथ निभा सकता है। लेकिन नीलाभ जैसों की समझ में आंदोलन का यह व्यवहारिक पहलू कभी आ ही नहीं सकता। वो लोग जड़ किस्म के निजी स्वार्थों में उलझे लोग हैं। वो बस गप लड़ा सकते हैं। और यही देख सकते हैं कि कौन किसकी दलाली कर रहा है।

मेरी यह सोच नीलाभ से पहली मुलाकात के बाद और साफ हो गई। पंद्रह जुलाई को वो इंडिया हैबिटेट सेंटर में मिले। बगल में निरुपम भाई थे। नीलाभ ने मुझसे परिचय होने के बाद पहला सवाल पूछा कि मैं क्या करता हूं। मैंने कहा जनतंत्र डॉट कॉम चलाता हूं। उन्होंने आगे पूछा कि वो तो ठीक है खर्चा कैसे चलता है। मैंने कहा कि जितनी जमापूंजी थी सब खर्च हो गई है। दोस्तों का उधार हो गया है और अब किसी से उधार मिलने की उम्मीद ख़त्म हो गई है तो अपने पिता की एफडी तुड़वा दी है। मेरे इस जवाब से उन्हें निराशा हुई होगी। और यह बात उन्होंने अपने ताज़ा लेख में जाहिर कर दी है।

उन्होंने कहा है कि “राजेन्द्र जी ने इस विवाद को बढ़ाने में एक नहीं दो ब्लौगों की मदद ली है. पर क्या करें जब पाठकों ने इन ब्लौग वालों को ही राजेन्द्र जी का दलाल कहना शुरू कर दिया।” यह लिखने का अंदाज होता है। दरअसल, खुद नीलाभ हमें राजेंद्र यादव का दलाल कहना चाह रहे थे लेकिन उन्होंने इसके लिए पाठकों का सहारा लिया। यहां नीलाभ से पूछना चाहिए कि उसमें कुछ पाठकों ने उन्हें भी दलाल घोषित किया है तो क्या वो दलाल हो गए हैं? और अगर हो गए हैं तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि वो किसकी दलाली कर रहे हैं और किस किस्म की दलाली कर रहे हैं?

बात मुद्दे की थी और मुद्दे पर रहनी चाहिए। खुद अरुंधती ने कहा था कि उन्होंने अभी हंस के सालाना कार्यक्रम में आने की पुष्टि नहीं की थी। यह बात नीलाभ के जरिए उन्होंने सबको बताई। तब नीलाभ से पूछा जाना चाहिए कि जब खुद अरुंधती ने हां नहीं कहा था तो गेस्ट लिस्ट फाइनल कैसे हो गई थी? यह सही है कि राजेंद्र जी अरुंधती को बुलाना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने बात भी की थी और उन्हें यह उम्मीद भी थी कि वो आएंगी। उन्हें नहीं आना था तो वो मना कर सकती थीं। उन पर न आने के लिए दबाव डालने की क्या जरूरत थी? इससे तो यही जाहिर होता है कि अरुंधती के नाम पर राजेंद्र यादव नहीं बल्कि मुहिम चलाने वाले अपनी दुकानदारी चमकाना चाहते थे और लगता है कि इसमें वो काफी हद तक कामयाब भी हुए हैं।

रही बात हंस के सालाना कार्यक्रम की तो सुनते हैं कि वह तय समय पर हो रहा है। अरुंधती के बगैर हो रहा है। अब देखना यह है कि अरुंधती के नहीं आने से क्रांतिकारी आंदोलन में कितना उबाल आता है? यह भी देखना है कि नीलाभ जैसे लोग उस आंदोलन में किस तरह की शहादत देते हैं?

Last 5 posts by समरेंद्र

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Posted by on Jul 30 2010. Filed under ब्लॉग, मुद्दा, सुर्ख़ियां. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

5 Comments for “नीलाभ जी बताइये, आप किसके दलाल हैं?”

  1. यह वक़्त पत्रकारिता के जनतंत्र का है यारो .मठाधीशी का टाइम ख़त्म . इसलिए मठाधीशी की परंपरा वाले पत्रकारों को ज़रा संभल कर रहना चाहिए. नीलाभ जी को समरेन्द्र को दलाल कहने की कोशिश करने की सोचने के पहले उसके बारे में जान लेना चाहिए था .बहुत सारे लोग जिस नौकरी को पाने के लिए बहुत कुछ करते हैं,यह उसी नौकरी को छोड़ कर पोर्टल चला रहे हैं. वेब पत्रकारिता में इस देश की हिन्दी पत्रकारिता के कुछ बहुत तेज़ तर्रार नौजवान शामिल हो चुके हैं , इस लिए कुछ भी लूज़ बोलने के पहले तौल कर बोलें. यह सब कबीरदास के वंशज हैं , और अपना घर जलाकर रोशनी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं . हमारी उम्र के लोगों को चाहिए कि इन बहादुर लोगों के सम्मान में साखोचार करें. इनकी निंदा करके हम पत्रकारिता का नुकसान कर रहे हैं.

  2. अरुण कुमार

    “आंदोलन खड़ा करने के लिए थोड़ा उदार होना पड़ता है। लोगों की पहचान करनी पड़ती है कि किससे किस तरह का काम लिया जा सकता है… कौन कहां तक साथ निभा सकता है।”
    – प्रतिबद्धता और संकीर्णता में फर्क है.

  3. nirupam

    “wo to thik hai, kharcha kaise chalta hai?” -ek pratibaddh vyakti ka vyavharik sawaal!!! pratibaddhata aur vyavharikta ka yah mel hairaan karta hai…

  4. अरे भाई नीलाभ जी ने गॉड आफ़ स्माल थिंग का हिन्दी में बेहतरीन अनुवाद किया। अरुन्धती जी से काफ़ी समय से जुड़े हुए है, लिहाजा उनका कुछ अरुन्धती जी के पक्ष में कहना जायज है, मुझे लगता है हल्ला काटकर आप लोग अपने ब्लाग की दुकान चलाना चाहते है!

  5. kuch log bina puri bahas ko jane hi apni ray vyakt kr dene ke liye itne utawale hote hai ki ve yeh bhi soch nahi pate ki hamari is galat bayani ka un logo par kya prabhav rahega jo pehle hi purva greh pale hue rahte hain.ase logo ko na to arundhati ke vicharo or saronkaron se koi matlab hota h,n hi rajendra yadav se.bs ve hawao mai shagufe uchal ke khush hote rehte h.nilabh ko ek sajag patrakar ke rup mai apna vaktye rakhna chahiye ,jiske liye jaruri h pehle dono paksho se baat karna.bina prui bahas ko jane savedansheela muddon pr baat kerne se nilabh ji ko bachna chahiye.

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