हंस की गोष्ठी में हंगामा, “चोर” जैसे भागे विभूति और आलोक मेहता
हंस की सालाना गोष्ठी हंगामेदार रही। पूर्व आईपीएस अधिकारी और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय और नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता गोष्ठी के बीच से “चोर” की तरह भागे। नई दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में राजेंद्र यादव समेत कुल छह वक्ताओं ने अपनी राय रखी। वरिष्ठ पत्रकार इरा झा, आदित्य निगम, विभूति नारायण राय, रामशरण जोशी और स्वामी अग्निवेश। मंच का धारदार संचालन वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेसर आनंद प्रधान ने किया। भाषण प्रक्रिया ख़त्म होने के बाद जब सवाल-जवाब का सिलसिला जैसे ही शुरू हुआ, विभूति नारायण राय मंच से उठ कर जाने लगे। जिसके बाद श्रोताओं ने उनसे रुकने की अपील की। आनंद प्रधान ने भी उनसे रुकने की अपील की। लेकिन विभूति नहीं रुके। उनको तेजी से दरवाजे की तरफ़ बढ़ता देख श्रोताओं ने कहा कि हमने आपको इतनी देर तक सुना है, आपको हमारे सवालों का जवाब देना चाहिए। मगर विभूति की रफ़्तार थमने की जगह और तेज हो गई। इसे देख सैकड़ों की संख्या में मौजूद श्रोताओं ने विभूति नारायण राय हाय-हाय, विभूति नारायण मुर्दाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए। और उन्हीं नारों के बीच ये पूर्व आईपीएस अधिकारी वहां से विदा हो गए।
हंस की गोष्ठी : हंगामा है क्यों बरपा
♦ गोष्ठी से “चोर” जैसे भागे विभूति-आलोक
♦ “मैं राज्य की हिंसा का समर्थक हूं”
♦ “लुच्चों” के बीच कुछ “शव” थे, कुछ “शावक”
♦ विभूति-आलोक से शर्मसार है हिंदी
उनसे ठीक पहले नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता को नज़रे चुरा कर बाहर जाना पड़ा। प्रेम चंद जयंति और हंस के 25वें वर्ष में प्रवेश के मौके पर आयोजित इस कार्यक्रम में आलोक मेहता के ख़िलाफ़ भी नारेबाजी हुई। “वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति” के मुद्दे पर चल रही इस बहस में उनके विरोध की भूमिका स्वामी अग्निवेश के भाषण के दौरान तैयार हुई। सरकार और नक्सलियों में बातचीत की मध्यस्थता कर रहे स्वामी अग्निवेश के भाषण में पत्रकार हेमचंद्र पांडे की हत्या का मामला उठा। हेमचंद्र पांडे नई दुनिया समेत कई अख़बारों में हेमंत पांडे के नाम से लिखा करते थे। सरकार ने उन्हें नक्सली घोषित करके हत्या की है। और जिस दिन हत्या की गई है और दिल्ली में पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस हत्याकांड के विरोध में प्रदर्शन किया। उसके अगले दिन नई दुनिया ने यह सफाई दी थी कि हेमचंद्र पांडे का उनसे कोई वास्ता नहीं था। यह मुद्दा स्वामी अग्निवेश ने उठाया तो आलोक मेहता मंच से सफाई देने जा पहुंचे। ग़लती मानने की जगह वो यहां भी अपने उस कदम को जायज ठहराने की कोशिश करने लगे। इससे नाराज पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों ने उनसे सवाल पूछना शुरू कर दिया।
वो अपनी कहानी कह रहे थे तभी लोगों ने पूछा कि आप सबकुछ जानते हैं फिर भी आप सरकार का समर्थन करते हैं? आपको मालूम है कि हेमंत पांडे के नाम से हेमचंद्र पांडे नई दुनिया में लिखता रहा लेकिन आपने तुरंत सफाई दी कि उसका आपसे कोई लेना-देना नहीं था। आलोक मेहता ने कहा कि कोई नाम बदल कर लिखेगा तो हमें क्या सपना आएगा कि वो कौन है? तब लोगों ने कहा कि आप सत्ता को यह दिखाना चाहते थे कि आप उसके साथ हैं। एक पत्रकार के साथ नहीं। उन्होंने कहा कि कानून उनका फैसला सही है। इसके बाद लोगों ने उनसे और तल्ख सवाल किये। पूछा कि वो सत्ता की दलाली क्यों कर रहे हैं?
अब आलोक मेहता के चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था। उसी बौखलाहट में वो एक और चूक कर बैठे। उन्होंने कहा कि स्वामी अग्निवेश सामाजिक कार्यकर्ता हैं उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता बने रहना चाहिए था। वो सरकार के झांसे में आ गए और सियासत करने लगे। नक्सलियों से बात कराने लगे। सरकार ने इसी का फायदा उठाया और स्वामी अग्निवेश का इस्तेमाल कर लिया। माओवादी नेता चेरुकरी राजकुमार उर्फ आज़ाद और स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडे की हत्या कर दी। आलोक मेहता ने यह भी बताया कि सरकार ने उनसे भी नक्सलियों से बातचीत कराने की गुजारिश की थी। लेकिन उन्होंने यह काम नहीं किया। इसके बाद श्रोताओं ने कहा कि दरबारियों जैसी भाषा बोलने से अच्छा है कि मंच से हट जाइये। आलोक मेहता शर्मिंदा होकर मंच से उतरे और फिर सीधे सभागार से बाहर चले गए।
((नोट - इस गोष्ठी की पूरी रिपोर्ट जनतंत्र पर थोड़ी देर में। साथ ही यह भी किस तरह स्वामी अग्निवेश ने हमारे देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम के झूठ से पर्दा उठाया। कैसे बातचीत को तैयार माओवादियों के प्रवक्ता को उठा कर क़त्ल किया गया ताकि बातचीत हो ही नहीं सके। कैसे मीडिया ने इस पूरे प्रकरण में दलाली की।))
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बहुत बढ़िया हुआ। इन दोनों के साथ ऐसा ही होना चाहिए था।
मैं भी वहां था…… जो हुआ वो ठीक नहीं था…… जिन लोगों ने किया वो लोकतांत्रिक आवाज को दबाना चाहते हैं……. एक बड़े अधिकारी और एक पत्रकार के साथ ऐसा बर्ताव बहुत बुरा है…. लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने देना चाहिए…. लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि जो लोग आलोक मेहता और विभूति का विरोध कर रहे थे…… उनमें से किसी का भी लोकतंत्र में यकीन है…… वो पागलों की भीड़ थी…. चीखते-चिल्लाते लोग …. मैं हैरान था.
Pramod is right. How people can behave like this? Mr. Mehta was trying to give his opinion and instead of listening him people were shouting like they were out of their minds. I have never seen this kind of debate and hope not to see it again.
जैसी करनी, वैसी भरनी. इन दोनों ने जीवन भर चाटुकारों को उठाया है, जो चाटुकार नहीं उन्हें दबाया है. जीवन भर सत्ता का सुख भोगा है. तो आम लोगों के बीच सम्मान कहां से मिलेगा? ठीक हुआ है इन दोनों के साथ. मेरा तो मानना है कि ये जिस भी सम्मेलन में जाएं, विरोध होना चाहिए. सिर्फ यही क्यों इनके जैसे जितने भी लोग हैं, सबका विरोध होना चाहिए, ये सब बहुत खतरनाक लोग हैं.
छिनार महिलाओं में और मंच बीच में छोड़कर चले जाने वालों में ज्यादा फर्क नहीं होता
May buttering, hypocrisy and wickedness be exposed repeatedly the same way to make it a regular feature of Indian Culture in stead of existing inhuman culture of falsehood that is based on befooling spirituality and superstitious astrology that has enslaved not only the people of India but also their brains in such a dark chamber where there is no window for the entrance of free air and light of values, dedication, honesty, truth and humanity!
विभूति नारायण राय और आलोक मेहता को शर्म आनी चाहिए। वो दोनों जहां-जहां जाए उनके साथ ऐसा ही बर्ताव होना चाहिए। हर जगह घेराव हो। जगह जगह नारे लगें। अगर ये किसी मंच पर बोलते हैं तो बोल कर जाने मत दो। उनसे घेर कर सवाल करो। वो भागे तो सवालों की बौछार कर दो। ताकि रात को सोने की कोशिश करें तो वो सवाल आंख के सामने नाचते रहें… ठीक वैसे ही जैसे हेम चंद्र पांडे की सूरत उनके चाहने वालों की आंखों के आगे नाचती है। ठीक वैसे ही जैसे उनके साथ हुई ज्यादती की बात उनके चाहने वालों को परेशान करती है। छोड़ो मत। सिर्फ यही दोनों क्यों? सत्ता के जितने दलाल हैं उन सभी से सवाल होना चाहिए…
विभूति जी को जाने की जल्दी भी तो हो सकती है …इन दिनों उनके खिलाफ एक मुहिम सी चल रही है -क्या यह स्थापना के विरुद्ध मुहिम है ?
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jo kuchh hua vo sharmnaak tha..vibhuti bhai ka kasoor sirf itna tha ki ve jaldi chale gaye bina shrotao ke sawalo ke jawab diye,sambhav hai unhe kanhee jana ho ,itnee si baat ke liye vibhuti narayan murdabad ke nare, choro ki tarah bhagne vale..sheershak .?.kyo bhai .sirf narazagi jatane bhar se kam nahee chal sakata tha ?..ek bhale vyakti aur behatar lekhak ke sath ye salook ?par shayad HANS ke karyakram ko vivadaspad banana is sabaka uddeshya raha hoga.varna maloom kaise padta ki hans ka karyakram tha.
अबे दुनिया को पागल समझ रखा है क्या? क्या वहां मौजूद लोगों को कुछ समझ में नहीं आता था। बहुत बढ़िया लिखा है। इन सबके बारे में ऐसे ही लिखा जाना चाहिए। मंच पर आए और भाषण दिए और चले गए। पब्लिक चूतिया है क्या? आगे से कोई भी भाषण देकर नहीं जाएगा। उन्हें सवालों का जवाब देना होगा। बताना होगा कि सत्ता की हिंसा का समर्थन करने के लिए उन्हें क्या कुछ मिला है? पैसा, पद वगैरह… वगैरह … क्या कुछ मिला है? विभूति ने वर्धा में छात्रों के साथ जो कुछ किया। दलितों के साथ जो कुछ किया … और लेखिकाओं के विरुद्ध जो कुछ कहा है वह उनकी सोच जाहिर करने के लिए काफी है। उन सभी का बहिष्कार होना चाहिए।
mr.tarun,apki bhasha dekhakar to aisa lagata hai ki aap aisi bahaso me bhag lene ke layak nahee hain.virodh ki bhi bhasha honi chahiye.abe tabe,gali ye sab yahan nahee chalata.kripaya bhavishya me dhyan de.
आपने विभूति की भाषा सुनी थी? या फिर लेखिकाओं के बारे में उनकी भाषा पढ़ी है? शायद नहीं… अगर आपने उनकी भाषा सुनी या फिर पढ़ी होती तो यह सलाह नहीं देते. वैसे आप ही जैसे हिंसक लोग सबसे पहले भाषा की तमीज और विरोध का तरीका समझाते हैं। लेकिन समझते तभी हैं जब आप लोगों से आपकी भाषा में बात की जाए।
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महत्वपूर्ण बात ये है कि विभूति नारायण राय ने जो कहा है उसके मूल का विवेचन किया जाय, केवल उन शब्दों को लेकर न उड़ा जाय जिसपर वो माफ़ी मांग चुके है. अगर ऐसा नहीं होता है तो इस पूरे बहस का कोई मतलब नहीं निकलेगा. दरअसल महिला लेखन ने स्त्री मुक्ति के नाम पर देहमुक्ति को ही स्त्री स्वतंत्रता का पर्याय मान लिया है वो स्वयं स्त्री विमर्श के आधारिक विचार को ही ख़ारिज करता है. आज जिस दौर में हम जी रहे है उस उत्तर आधुनिक, उत्तर पूंजीवादी बाज़ार ने हमे बुरी तरह ग्रस्त कर लिया है. बाज़ार इस स्त्री देह का इस्तेमाल खुद के लाभ के लिए कर रहा है , इस साजिश को स्त्री को समझना परेगा. आज स्त्रियों को पुरुषो
के खिलाफ केवल एक मोर्चे पर नहीं लड़ना है बल्कि उस बाज़ार के कुचक्र से भी लड़ना है जो मूलतः पुरुष – निर्मित है. अगर ये बाज़ार स्त्री का इस्तेमाल अपने मानको के अनुरूप करता है तो बाज़ार के सम्मुख एक सुभीता तो यह है कि वो स्त्रियों के प्रत्यक्ष आक्रमण से बचा रहेगा और साथ ही साथ स्त्रियों को छद्म स्वतंत्रता का आभास भी करा कर उनकी पक्षधरता भी पाता रहेगा और दूसरे स्त्रियों के शोषण के नए दरवाजे भी खोलता रहेगा. इस पूरे षड्यंत्री वैचारिक संरचना तंत्र को बहुत बारीकी से समझना होगा. इसलिए मेरा नम्र निवेदन है कि वी. एन. राय के इस साक्षात्कार को लेकर जो कौवा – रोर मचा हुआ है उसको अब समाप्त कीया जाये और उसके मूल में छिपे विचार को बहस के केंद्र में लाया जाये.
Uper alok mehta ke bare main jo likha aur kaha gaya hai wah tathay ke pare hai. jin logo ne alok mehta per tippadi ki hai kya unka kad itna bada hai.
rahi baat jantantra ke sampadak mahodaye ki khabar ki to wah koi niji khunnas nikal rahe hai. saayad alok ji ne unhe naukari nahi di hogi