अदालतों में लंबित मामलों की समीक्षा चाहती हैं राष्ट्रपति
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने देश की विभिन्न अदालतों में बकाया पड़े मामलों की समीक्षा करने का शनिवार को आह्वान किया। आंकड़े के अनुसार देश की अदालतों में बकाया मामलों की संख्या तीन करोड़ पहुंच गई है। उन्होंने लंबित मामलों को निपटाने के नए तरीकों पर जोर दिया। बकाया मामलों के आंकड़े की समीक्षा करने का आह्वान राष्ट्रपति ने तब किया, जब प्रधान न्यायाधीश एस.एच.कपाड़िया ने कहा कि बकाए मामलों में से 50 प्रतिशत मुकदमे केवल एक वर्ष पहले दायर किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि इन मामलों को ‘लंबित’ कहा जा सकता है ‘बकाया’ नहीं। उन्होंने कहा कि बकाया मामलों और लंबित मामलों में फर्क करने की जरूरत है। इसके बाद राष्ट्रपति ने कहा, “चूंकि प्रधान न्यायाधीश ने बकाया मामलों और लंबित मामलों के बीच अंतर करने के बारे में बात की है, लिहाजा मैं सोचती हूं कि हमें इन आंकड़ों की समीक्षा कर लेनी चाहिए।”
पाटील न्यायिक सुधारों पर भारतीय बार परिसंघ की ओर से आयोजित एक अखिल भारतीय संगोष्ठी में उद्धाटन भाषण दे रही थीं। उन्होंने कहा कि अदालती विलंब के कारण आम आदमी की न्याय पाने की कोशिश एक निराशाजनक अनुभव में बदल जाती है। अपने भाषण में पाटील ने न्यायिक जवाबदेही, पुराने कानून और उन्हें रद्द करने या उनमें सुधार करने जैसे कई सारे मुद्दों को उठाया।
उन्होंने कहा, “बेहतर कानूनों के बगैर बेहतर प्रशासन नहीं हो सकता। और जब तक पुराने कानून बने रहेंगे, तब तक बेहतर कानून नहीं आ सकते।” पाटील ने कहा, “न्यायिक जवाबदेही और न्यायिक आजादी का सहअस्तित्व होना चाहिए। न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित कराने के साधनों और तरीकों पर चर्चा की जा सकती है।”
इसके पहले न्यायमूर्ति कपाड़िया ने विधायी, न्यायिक और बार सुधारों का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सिर्फ न्यायिक सुधारों से समस्या नहीं सुलझेगी। उन्होंने कहा, “आप केवल एक पहिए पर गाड़ी को नहीं चला सकते।” उन्होंने कहा कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 24 के तहत लोक अभियोजकों की नियुक्ति में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेने की बाध्यता के नियम को सरकार द्वारा हटाए जाने के बाद से सरकारी वकीलों की गुणवत्ता में गिरावट आई है। उन्होंने कहा, “यह अधिकार क्यों वापस लिया गया, मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता।”
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