“लुच्चों” के बीच कुछ “शव” थे और कुछ “शावक”
स्वामी अग्निवेश ने हंस की गोष्ठी में एक संदर्भ का जिक्र किया था। जब हेमचंद्र पांडे की लाश को दिल्ली लाया गया, तो यह सवाल उठा कि आखिर उस लाश को रात भर रखेगा कौन। स्वामी अग्निवेश ने इस संदर्भ में बड़े मार्के की बात कही, जो जितनी सामान्य है, उतनी ही प्रासंगिक भी- तमाम लोगों ने शव को अपने यहां रखने से मना कर दिया। ‘ऐसे ही समय में लोगों की पहचान होती है।’
स्वामी जी ने भले ही शिष्टतावश उन लोगों के नाम नहीं गिनाये जिनकी ‘पहचान’ हेम पांडे के शव ने करा दी थी, लेकिन हंस की गोष्ठी में शनिवार को जो कुछ भी हुआ, उसने हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में कुछ ‘शवों और शावकों की पहचान’ करा दी।
आलोक मेहता और विभूति नारायण राय का नाम लेने का कोई मतलब नहीं। उनका भी नहीं, जिन्होंने इन दोनों को भरी सभा में ‘पहचनवा’ दिया। यह सब जगजाहिर हो चुका है। इन दोनों धुव्रों के बीच जो बचे, क्या उन पर किसी ने ध्यान दिया?
जब विभूति नारायण राय का सभागार के बाहर घेराव खत्म हो चुका था, तो राजेंद्र यादव के अतिबुद्धिजीवी वक्ता आदित्य निगम ने चुपके से किसी से कहा कि नारा लगाने वाले सभी ‘लुच्चे’ हैं। जाहिर है आदित्य निगम ही क्यों, यादव जी को भी उम्मीद रही होगी कि एक ‘शास्त्रीय गोष्ठी’ करवाने के बाद रसरंजन आदि होगा, बिल्कुल सीएसडीएस की तर्ज पर। ‘लुच्चों’ के कारण सब भरभंड हो गया। किसी ने पूछा भी, कि भइया ये आदित्य निगम कौन सा डिसकोर्स कर रहे थे। जवाब आया, ये डिसकोर्स नहीं इंटरकोर्स था।
खैर, बताते चलें कि ‘लुच्चा’ शब्द की उत्पत्ति लोंचने से हुई है, यानी वे लोग जो अपने बालों को लोंच कर जूड़ा या चुटिया बना लेते हैं, उन्हें लुच्चा कहा जाता है। आदित्य निगम की उर्दू जबान और भाषाई अभिजनवाद, साथ ही ढेरों विदेशी नाम टपकाने की अदा से यह उम्मीद कतई नहीं थी कि वह भाषा के साथ ऐसी लुच्चई कर डालेंगे।
जब विभूति नारायण का घेराव चल ही रहा था, तो उन पर बीस खंडों में अभिनंदन ग्रंथ लिख रहे भारत भारद्वाज तेजी से दौड़ते हुए आये। दो-तीन बूढ़ी महिलाओं के साथ वे थे, जिन्हें मैं शायद नहीं पहचानता। स्तब्ध महिलाओं और भारत भारद्वाज के बीच बातचीत से दो शब्द अचानक हवा में उछलकर आये – ‘नक्सली गुंडे’। भारत भारद्वाज के बारे में यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं लग सकती। वह तो तमाम ‘शवों’ के बीच ‘शावक’ भर थे।
इरा झा को सबने सुना कि कैसे उन्होंने आदिवासियों को अपराधी जाति घोषित कर दिया, हालांकि यह भी बहुत महत्वपूर्ण बात नहीं हो सकती। आखिर क्या वजह थी उन्हें वक्ता बनाने की? सिर्फ छत्तीसगढ़ में रह रहने भर से कोई नक्सली विशेषज्ञ हो जाता है क्या? स्त्री विमर्श को हंस के माध्यम से मुख्यधारा में लाने वाले राजेंद्र जी के लोकतंत्र में क्या कोई ऐसी स्त्री नहीं जो ‘वैदिकी हिंसा…’ पर बोल सके?
हंस की गोष्ठी : हंगामा है क्यों बरपा
♦ गोष्ठी से “चोर” जैसे भागे विभूति-आलोक
♦ “मैं राज्य की हिंसा का समर्थक हूं”
♦ “लुच्चों” के बीच कुछ “शव” थे, कुछ “शावक”
♦ विभूति-आलोक से शर्मसार है हिंदी
खैर, सर्वाधिक दिलचस्प और दारुण स्थिति नई दुनिया अखबार के प्रगतिशील चेहरों की थी जो अभी से ही बॉस के सवालों का जवाब देने की तैयारी में जुट गये थे। इनमें एक नामालूम-सा चेहरा बरसों बाद दिल्ली के किसी कार्यक्रम में उतराया था। यह कभी प्रभात खबर में हुआ करता था और वाया चंडीगढ़ अब नई दुनिया में आ चुका था। मनीष नाम के इस शावक ने छूटते ही मुझसे पूछा, ‘बॉस, ये कौन लोग थे जो नारा लगा रहे थे, जरा नाम बताइए न।’ कटते-कटते आलोक मेहता ने अपना एक एजेंट यहां छोड़ ही दिया था। सभागार से निकलते वक्त पिछली तीन-चार पंक्तियों को घूरती उनकी नजरों में लिखा था – ‘तुम्हें तो मैं देख लूंगा।’
आनंद प्रधान ने जब कार्यक्रम का संचालन शुरू किया, तो उनका स्वर बहुत सधा हुआ और पॉलिटिकली करेक्ट था। बाद में जो कुछ भी हुआ, उसने उनके लिए शायद जबरदस्त द्वंद्व पैदा कर दिया था। उनके चेहरे से हंसी गायब थी और वह एक संचालकीय मुस्कान को संभालने की पूरी कोशिश कर रहे थे। बड़ी समस्या थी। उन्हीं के संस्थान, पार्टी के लोग और जानने वाले नारे लगा रहे थे। दूसरी ओर सफेद हंस का काला चश्मा भी उन पर नजर रखे हुए था। संस्थान में उन्हीं के सहयोगी दिलीप मंडल की मानें, तो यह आयोजन हिंदी में ‘प्रवचन युग के अंत’ का सूचक था। लेकिन, दिक्कत यह थी कि प्रवचनकर्ता आज कठघरे में थे और आनंद प्रधान कहीं नहीं। काश, राजेंद्र जी ने उन्हें संचालक न बनाया होता।
इस आयोजन का एजेंडा श्रोताओं ने तय किया, इसे अंजाम तक भी श्रोताओं ने ही पहुंचाया। यह लोकतंत्र की जीत थी, लेकिन अफसोसनाक यह रहा कि जिसने सबसे अच्छी बातें कहीं और वह भी औचक आमंत्रित, उस पर बहस की गुंजाइश ही नहीं बन सकी। वह थे रामशरण जोशी। जाहिर है जोशी जी को अब लग रहा होगा कि वह न बोलते तो ही बेहतर होता।
इस सबके बीच कम लोगों ने ध्यान दिया कि पंकज बिष्ट बीच से ही उठ कर चले गये। विभूति नारायण राय जिस वक्त हंसराज रहबर के किस्से के हवाले से अघोषित आपातकाल को अतिरंजना ठहरा रहे थे, तो कॉफी हाउस का नाम आते ही बिष्ट जी का चेहरा बिगड़ गया। हो सकता है कि राय साहब की टिप्पणी का बिष्ट जी से कोई संबंध न हो, लेकिन कॉफी हाउस वाले रोमांटिसिज्म के प्रसंग ने शायद बिष्ट जी को नाराज कर दिया। वह उठकर कॉफी हाउस चल दिये।
एक बात और। आखिरी बात। पता चला है कि इस साल की हंस की गोष्ठी में सार्वजनिक कंपनी ओएनजीसी ने कुछ पैसा दिया था। और बैग बंटे सुलभ शौचालय वाले। भाई लोग पता करें कि कौन साहित्य प्रेमी है जो ओएनजीसी में अधिकारी भी है।
खैर, कुल मिला कर राजेंद्र जी की गोष्ठी इस बार भी हिट रही। मोगेंबो खुश तो बहुत होगा आज…
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छा गए गुरु। शव और शावकों का विवरण तो लाजवाब है। ये शावक ज्यादा खतरनाक हैं। आदित्य निगम ने जो कुछ कहा वो चुतियापे से अधिक कुछ नहीं था। आखिरी वाक्य ने उनके चेहरे पर मौजूद मुखौटे को उतार दिया। माओवादियों के हाथ में सत्ता आ जाएगी तो वो भी दमन का हथियार बनने को मजबूर होंगे। ऐसा लगा कि कोई शंकराचार्य धर्म की शिक्षा दे रहा है और कह रहा है कि कोई जरूरत नहीं है संघर्ष करने की। ये सारे के सारे आयातित बुद्धिजीवी भारी फ्रॉड हैं। ये शावक उन शवों से ज्यादा ख़तरनाक हैं।
भरत भारद्वाज की दुम बहुत तेज हिलती है. जब तक हंस में उन्हें पढ़ता रहा, ये नहीं लगा. लेकिन अब तो लगता है कि भरत भारद्वाज की पूंछ बहुत घनी है और विभूति के आगे बहुत तेज हिलती है.
maine kabhi naksal expert hone ka dava nahin kiya.adivasiyon par mai likh jaroor leti hoon par kaisa likhtee hoon yah to log tay karenge.baharhal mujhe bolne ka abhyas nahin hai,stage par baithkar hee maine badi himmat dikhai hai.mai hamesha aise mouke janboojhkar ganwa deti hoon par is bar …adivasi apradhi kaum nahin hai par apradh bahut hote hain bastar me.mirchi ke paudhe se lekar salphi ke jhad tak ke liye hatyayen hoti hain.par main police kee bhoomika par bol rahi thee.vahan .bata rahi thee ki kaise samvidhan,loktantra aur police bemani hai.police ko kabhi kam karna nahin pada seedhe sachche adivasiyon ne samarpan kar kaam aasan kar diya.par bhaiya mai vo jaroor samajhtee hoon jo chidambaram se lekar koi samajshastri,koi samajsevi ya koi bhee nahin samajh sakta.mera bachpan in adivasiyon ke sath gujra hai.aur ye mere sevak nahin sathi the.mere ghar par koi din aisa nahinjata tha jab kum se kum dus barah adivasi na thahren hon.unka khan7pan,unkee takleefen unka dard dillli me baithkar ya 15&20 chakkar lagakar nahin mahsoosa ja sakta.aaj nhee mer jyada samay bastar me guzar raha hai.mere pita bade samvaidhanik pad se retire hone ke bad delhi,bhopal,raipur me nahin jagdalpur me base hain.mujhe hairat hoti hai ki log hafte bhar ghoomkar bastar par report ya kitab kaise likh lete hain meri umra gujar gai.log kahte hain ki bastar par likhen kitab par mujhe lgta hai abhee bhee kahin janna bakee hai.mai apnee bat kah nahin pai sahi tareeke se kyoki maina nahin hoon adivasee jaisee hoon.par mai yahi kahne aai thee ki adivasee to poori kavayad me nadarad hai,koi uskee maezee kyon nahin janta.bastar ya naxal shanti oi nobal ya magsaysay samman pane ka vishay nahin hai insaniyat ka sawal hai.adivasiyon ke bare me mujhse jayad dard kise hoga? vaise sunnnewala mera dard samjh gaye honge.fir bhee aapko aisa lage to bhool maf karen.
इरा झा,
कहते हैं कि जिसके मन में जो होता है वो निकल ही आता है। आपके मन में भी आदिवासियों के लिए कोई दर्द वर्द नहीं है। आप तो उन्हें अपराधी कौम समझती हैं और यही बात उस सभा में बाहर आ गई। अब सफाई देने से कुछ नहीं होगा। सच सामने आ गया है।
वैसे कोई आदित्य निगम का जरा बैकग्राउंड बताएगा? वो क्या करता है? कहां काम करता है? गजब जीव निकला। ऐसे भूमिका बना रहा था जैसे कोई बहुत बड़ा कलाकार हो।
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भाई अभिषेक, गोष्ठी चाहे जैसी रही हो लेकिन रिपोर्टिंग बहुत उम्दा. क्या गजब रिपोर्टिंग की है. ग्रेट……..
really ,aapme wo kabiliyat hai jo aasman chune walo k paas hoti hai….itna behtarin aur bebak lekh dekh kar mai apne aap ko aapki tarif karne se rok nahi paya wish u all the best abhishek,s.r.f. gkp university