मैं राज्य की हिंसा का समर्थन करूंगा: विभूति

हिंदुस्‍तान में उत्तरपूर्व के अलावा छत्तीसगढ़ और कश्‍मीर वे जगहें हैं, जहां कानून हमेशा मुल्‍तवी रहता है। जम्‍हूरियत का मूल आधार आज कंसंट्रेशन कैंप हो गया है। राज्‍यसत्ताएं आज बहुत बारीकी से चीजों में फर्क करती हैं और वो जानती हैं इस पूरी जम्‍हूरियत का तानाबाना जम्‍हूरी अधिकारों को मुल्‍तवी करके ही कायम रखा जा सकता है। प्रेमचंद जयंती के मौके पर हंस की सालाना गोष्‍ठी में बोलते हुए सीएसडीएस के सीन‍ियर फेलो आदित्‍य निगम ने अपनी इन बातों को इतिहास और पुराण के बहुत सारे संदर्भों के साथ रखा। लेकिन उन्‍होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में जो साथी इनकलाब लाने की कोशिश कर रहे हैं – उनकी कोशिश देख कर ऐसा नहीं लगता कि अगर वे सत्ता में आते हैं, तो हालात बदल जाएंगे और राज्‍य ज्‍यादा मानवीय होकर सामने आएगा।

हंस की गोष्‍ठी का विषय था, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। गोष्‍ठी के शुरू में विषय को समझाते हुए राजेंद्र यादव ने कहा कि तीन स्रातों से की गयी हिंसा को हिंसा की कैटगरी में नहीं रखा जाता। यानी राजसत्ता, धर्म और विचारधारा की हिंसा को हिंसा नहीं माना जाता। इन तीनों के पास कालखंड की तीन सतरें हैं। धर्म के पास अतीत है। राजसत्ता के पास वर्तमान है और मार्क्सिज्‍म के पास भविष्‍य है।

हंस की गोष्ठी : हंगामा है क्यों बरपा

गोष्ठी से “चोर” जैसे भागे विभूति-आलोक
“मैं राज्य की हिंसा का समर्थक हूं”
“लुच्चों” के बीच कुछ “शव” थे, कुछ “शावक”
विभूति-आलोक से शर्मसार है हिंदी

पत्रकार इरा झा ने बस्‍तर के अपने पत्रकारीय अनुभवों को साझा किया। कहा कि बस्‍तर में संघर्ष का लंबा इतिहास है। वहां हर साल बारिश में दो-ढाई सौ लोग मारे जाते हैं। हर बारिश से पहले मांएं जानती हैं कि इस बार उनके बच्‍चों में से एक दो मारे जाएंगे। बस्‍तर के आदिवास‍ियों के पास न तो बुनियादी सुविधाएं हैं, न हम उनसे इंसानियत से पेश आते हैं। जिस जीवन को आदिवासी अपनी नियति समझ बैठे थे, नक्‍सलियों के जाने के बाद वे अपने अधिकार जानने लगे हैं। स्‍कूल, अस्‍पताल की अवधारणा उनके सामने साफ हुई है। इरा झा ने कहा कि यह सब देख कर सरकार ईर्ष्‍या से मरी जा रही है कि आदिवासी नक्‍सलियों के इतने करीब क्‍यों चले जाते हैं।

इरा झा ने कहा कि बरसों से आदिवास‍ियों को छला गया है। अधिकारी कभी उनके गांव में काम पर नहीं गये, हां परिवार के साथ पिकनिक मनाने जरूर गये। सरकार ने कभी आदिवासी का भरोसा जीतने की कोशिश नहीं की। हमें समझना होगा कि वो क्‍या वजह थी कि आदिवासियों को शहरी आततायी लगने लगे। इरा झा ने बताया कि बस्‍तर में ऐसे कई गांव हैं, जिसे नहीं पता कि देश क्‍या है, लोकतंत्र क्‍या है।

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के कुलपति और लेखक विभूति नारायण राय ने कहा कि जो लोग कहते हैं कि देश में इन दिनों अघोषित आपातकाल है, वे अतिरंजना में जी रहे हैं। अगर ऐसा होता, तो संसद से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर हम इस तरह भारतीय राज्‍य को कोस नहीं रहे होते। विभूति नारायण राय ने कहा कि राज्‍य की अपनी निर्मिति ही अलोकतांत्रिक है। राज्‍य असहमति का अधिकार नहीं देता। उन्‍होंने कहा कि कोई राज्‍य इतना लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकता कि वो अपने अस्तित्‍व के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष को इजाजत दे दे। इतिहास में किसी राज्‍य का ऐसा कोई चैप्‍टर नहीं है। यहां तक कि कम्‍युनिस्‍ट राज्‍यों का भी। विभूति नारायण राय ने कहा कि मैं हिंसा का समर्थक नहीं हूं – लेकिन अगर मुझे चुनना होगा तो मैं राज्‍य की हिंसा का समर्थन करूंगा। क्‍योंकि हम राज्‍य की हिंसा से तो मुक्‍त हो सकते हैं, माओवाद की हिंसा से कभी मुक्‍त नहीं हो सकते।

वरिष्‍ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा कि हिंसा अपने आप में कोई तटस्‍थ परिघटना नहीं है। हिंसा एक इफेक्‍ट है, एक प्रतिक्रिया। हिंसा के मूल आधार को समझे बिना हम हिंसा को पारिभाषित नहीं कर सकते। हमें जड़ को समझने की कोशिश करनी चाहिए और यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि कोई हिंसा क्‍यों करता है। उन्‍होंने कहा कि जिस देश की संसद में हर बार करोड़पति सांसदों की तादाद बढ़ जाती है और जिस देश में हर साल गरीबों की तादाद बढ़ जाती है, उस देश में हिंसा की वजहों को समझना बहुत आसान है। इस संदर्भ में उन्‍होंने सार्त्र की एक मशहूर पंक्ति का जिक्र किया कि एक किसान जब हथियार उठाता है तो वह मानवता का प्रतीक है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता स्‍वामी अग्निवेश ने अपने जीवन के कई अध्‍यायों के माध्‍यम से हिंसा के कई कई रूपों को बताया। सामाजिक, जातीय और लैंगिक विषमताओं की बारीकी से पहचान करायी। उन्‍होंने बताया कि बचपन में उन्‍हें बड़ी हैरान होती थी कि हमारी मां बचपन में हर महीने तीन दिन के लिए अ‍छूत क्‍यों हो जाती है, मामा क्‍यों नहीं होते। बड़ी बहन अछूत क्‍यों हो जाती है, बड़ा भाई क्‍यों नहीं होता। स्‍वामी अग्निवेश ने राज्‍य के बेपर्दा चेहरों की कई कहानियां सुनाते हुए कहा कि राज्‍य सारे उल्‍टे काम करेगा और संविधान की दुहाई भी देगा। उन्‍होंने दंतेवाड़ा में शांति जुलूस का जिक्र करते हुए कहा कि हम वहां इस नारे के साथ आगे बढ़ रहे थे कि “गोली से नहीं बोली से”, तो कई पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने हम पर नारा बनाया, “नक्‍सलियों के दलालों को, जूता मारो सालों को”। उन्‍होंने दंतेवाड़ा की एक प्रेस कांफ्रेंस की चर्चा करते हुए कहा कि वहां पत्रकारों से बात करते हुए उन्‍हें लगा कि वे पत्रकारों से नहीं, उद्योगपतियों के दलालों से बात कर रहे हैं। उन्‍होंने चिदंबरम की ओर से खुद को नक्‍सलियों से शांतिवार्ता के लिए मध्‍यस्‍थता का जिम्‍मा सौंपे जाने के बाद हुए ड्रामे का जिक्र करते हुए कहा कि किस तरह आजाद ने इस स्‍वागत करते हुए पत्र लिखा, लेकिन किस तरह उसे फर्जी एनकाउंटर में एक पत्रकार के साथ मार गिराया गया।

हंस की यह गोष्‍ठी दिल्‍ली दो के माता सुंदरी रोड पर मौजूद ऐवान-ए-गालिब के सभागार में हुई। संचालन वरिष्‍ठ मीडिया प्राध्‍यापक प्रोफेसर आनंद प्रधान ने किया।

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Posted by on Aug 1 2010. Filed under तीर-ए-नज़र, ब्लॉग, मीडिया, सुर्ख़ियां. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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