“लेखिकाओं में होड़ लगी है कि वो सबसे बड़ी छिनाल हैं”
विभूति नारायण राय। वो शख़्स जो पुलिस में ऊंचे पदों पर रहे। बहुत से प्रतगिशील लेखकों और विचारकों के मुताबिक पुलिसवाले सरकार के सुपारी किलर होते हैं। लेकिन विभूति ने अपने बारे में अपने हुनर से यह सोच नहीं बनने दी। वो प्रतगिशील विचारक कहलाने लगे। फिर इस पोजीशनिंग का लाभ उठा कर महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति भी बन गए। लेकिन शायद यहां उनसे चूक हो गई। अब धीरे-धीरे उनकी असली सोच सामने आ रही है। दलितों और आदिवासियों को लेकर उनकी सोच पर जनतंत्र डॉट कॉम और मोहल्ला लाइव पर लंबी बहस भी चली है। लेकिन ताज़ा मामला महिलाओं के बारे में उनकी सोच से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने की उनसे बड़ी कोई छिनाल नहीं है। नया ज्ञानोदय के सुपर बेवफाई विशेषांक के अगस्त अंक में एक इंटरव्यू में उन्होंने यह बात कही है। उसका कुछ हिस्सा हम जनतंत्र के पाठकों से साझा कर रहे हैं। आप आईपीएस अधिकारी से शिक्षाविद बने लेखक और विचारक विभूति नारायण राय का इंटरव्यू पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। – मॉडरेटर
सवाल – देखा जाए तो, बेवफाई एक नकारात्मक पद है, लेकिन इसका पाठ हमेशा रोमांटिक या लुत्फ देने वाला क्यों होता है?
विभूति - वर्जित फल चखने की कल्पना ही उत्तेजना से भरी होती है। यह मनुष्य का स्वभाव है। फिर यहां लुत्फ लेने वाला कौन है? मुख्य रूप से पुरुष। व्यक्तिगत सम्पत्ति और आय के स्रोत उसके कब्जे में होने के कारण वह औरतों को नचा कर आनंद ले सकता है। उन्हें रखैल बना सकता है। बेवफा के तौर पर उनकी कल्पना कर सकता है। पर जैसे-जैसे स्त्रियां व्यक्तिगत सम्पत्ति या क्रय शक्ति की मालकिन होती जा रही हैं धर्म द्वारा प्रतिपादित वर्जनाएं टूट रही हैं। और लुत्फ लेने की प्रवृति उनमें भी बढ़ रही है।
हिंदी साहित्य का विभूति-छिनाल अध्याय
♦ विभूति एक लफंगा है : मैत्रयी पुष्पा
♦ विभूति को बर्खास्त करो : कृष्णा सोबती
♦ छिनाल कहना लोकतांत्रिक हक़, इस्तीफ़ा मांगने वाले फासिस्ट : विभूति
♦ छिनाल कहा है तो विभूति को जाना होगा : कपिल सिब्बल
सवाल - हिंदी समाज से कुछ उदाहरण….
विभूति – क्यों नहीं। पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है। वह मुख्य रूप से शरीर केंद्रित है। यह भा कह सकते हैं कि यह विमर्श बेवफाई का विराट उत्सव की तरह है। लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है। मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथात्मक पुस्तक का शीर्षक “कितने बिस्तरों पर कितनी बार” हो सकता था। इस तरह के उदाहरण बहुत सी लेखिकाओं में मिल जाएंगे। दरअसल, इससे स्त्री मुक्ति के बड़े मुद्दे पीछे चले गए हैं। …..
इंटरव्यू की स्कैन्ड कॉपी
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विभूति नारायण राय को तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए। उनके ख़िलाफ़ महिला संगठनों को मोर्चा खोलना चाहिए। संसद में आवाज़ उठानी चाहिए। सत्र चल रहा है… इस मुद्दे पर हंगामा होना चाहिए। सरकार पर दबाव बढ़ाना चाहिए कि इस क्रूर, सामंती और मर्दवादी शख़्स को तुरंत वीसी के पद से हटाया जाए।
[...] गौरतलब है कि नया ज्ञानोदय को दिए एक इंटरव्यू में लेखिकाओं को छिनाल कहने पर विभूति चारों तरफ से घिर गए [...]
[...] लेखिकाओं में होड़ है सबसे बड़ी छिनाल क… ♦ विभूति एक लफंगा है : मैत्रयी पुष्पा ♦ [...]
[...] लेखिकाओं में होड़ है सबसे बड़ी छिनाल क… ♦ विभूति एक लफंगा है : मैत्रयी पुष्पा ♦ [...]
[...] लेखिकाओं में होड़ है सबसे बड़ी छिनाल क… ♦ विभूति एक लफंगा है : मैत्रयी पुष्पा ♦ [...]
[...] लेखिकाओं में होड़ है सबसे बड़ी छिनाल क… ♦ विभूति एक लफंगा है : मैत्रयी पुष्पा ♦ [...]
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महत्वपूर्ण
महत्वपूर्ण बात ये है कि विभूति नारायण राय ने जो कहा है उसके मूल का विवेचन किया जाय, केवल उन शब्दों को लेकर न उड़ा जाय जिसपर वो माफ़ी मांग चुके है. अगर ऐसा नहीं होता है तो इस पूरे बहस का कोई मतलब नहीं निकलेगा. दरअसल महिला लेखन ने स्त्री मुक्ति के नाम पर देहमुक्ति को ही स्त्री स्वतंत्रता का पर्याय मान लिया है वो स्वयं स्त्री विमर्श के आधारिक विचार को ही ख़ारिज करता है. आज जिस दौर में हम जी रहे है उस उत्तर आधुनिक, उत्तर पूंजीवादी बाज़ार ने हमे बुरी तरह ग्रस्त कर लिया है. बाज़ार इस स्त्री देह का इस्तेमाल खुद के लाभ के लिए कर रहा है , इस साजिश को स्त्री को समझना परेगा. आज स्त्रियों को पुरुषो
के खिलाफ केवल एक मोर्चे पर नहीं लड़ना है बल्कि उस बाज़ार के कुचक्र से भी लड़ना है जो मूलतः पुरुष – निर्मित है. अगर ये बाज़ार स्त्री का इस्तेमाल अपने मानको के अनुरूप करता है तो बाज़ार के सम्मुख एक सुभीता तो यह है कि वो स्त्रियों के प्रत्यक्ष आक्रमण से बचा रहेगा और साथ ही साथ स्त्रियों को छद्म स्वतंत्रता का आभास भी करा कर उनकी पक्षधरता भी पाता रहेगा और दूसरे स्त्रियों के शोषण के नए दरवाजे भी खोलता रहेगा. इस पूरे षड्यंत्री वैचारिक संरचना तंत्र को बहुत बारीकी से समझना होगा. इसलिए मेरा नम्र निवेदन है कि वी. एन. राय के इस साक्षात्कार को लेकर जो कौवा – रोर मचा हुआ है उसको अब समाप्त कीया जाये और उसके मूल में छिपे विचार को बहस के केंद्र में लाया जाये.