जन संस्कृति मंच अपने भीतर क्यों पाल रहा है “विश्वरंजन”…
विभूति नारायण राय और विश्वरंजन में क्या अंतर है? शायद कोई नहीं। दोनों आईपीएस अधिकारी हैं। दोनों का साहित्य में रुझान है। दोनों लिखते-पढ़ते हैं। और दोनों की साहित्य हलके में गहरी पैठ है। लेकिन दोनों को लेकर साहित्यकारों और सांस्कृतिक मंचों का रुख अलग-अलग है। खासतौर से जन संस्कृति मंच का। वो मंच जो दावा करता है कि उसका यकीन जन आंदोलन की सियासत में है। मार्क्स और लेनिन के विचारों में है। लेकिन अब जसम का मुखौटा उतर रहा है। मुखौटा हटने के बाद जो चेहरा है वो काफी विकृत, सामंती, मर्दवादी और सत्तालोलुप है।
यह बहुत कड़वा सच है। और इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए हम यहां कुछ वाकयों का सहारा लेंगे। उन वाकयों की वजह से वक्त के आइने में जसम का चेहरा साफ नजर आता है।
सबसे पहले हम आपको ले चलते हैं हंस के सालाना जलसे में। वहां जसम के एक बड़े नायक विभूति नारायण राय ने बड़ी ठसक के साथ एलान किया कि अगर हिंसा चुनने की बात हो, तो राज्य की हिंसा का समर्थन करेंगे। उनके मुताबिक राज्य की हिंसा से मुक्त हुआ जा सकता है। लेकिन माओवादी और इस्लामिक हिंसा से मुक्ति कभी नहीं मिलेगी। यह लाइन सत्ता की लाइन है। सोनिया, मनमोहन और चिदंबरम की लाइन है। विश्वरंजन और विभूति जैसे लोग न केवल इस पर अमल करते हैं बल्कि सत्ता और बुद्धिजीवियों के बीच की कड़ी का काम भी करते हैं ताकि दमन के विरुद्ध उठने वाली आवाजों को दबाया जा सके।
अपने उसी भाषण में विश्वरंजन के खिलाफ प्रदर्शन करने की सलाह देने वाले लोगों को विभूति नारायण राय ने खुलेआम धमकी दी। उन्होंने कहा कि यहां मौजूद कुछ बुद्धिजीवी सलाह दे रहे थे कि विश्वरंजन आएंगे तो काली पट्टियां लगा कर विरोध होगा और उन्हें जूतों की माला पहनायी जाएगी। राय ने तल्खी से कहा कि ऐसा कहने वाले ये भूल रहे हैं कि विश्वरंजन के साथ भी लोग आएंगे और वो नंगे पांव नहीं होंगे। मतलब साफ है। विभूति और विश्वरंजन की न केवल भाषा एक है बल्कि वो एक दूसरे के विरोध में उठने वाली आवाजों को अपने विरोध में उठने वाली आवाज मानते हैं। एक दूसरे की छवियों को तार्किक आधार मुहैया करा कर रक्षा करने की कोशिश करते हैं। आम लोगों, दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध सत्ता की इस साजिश में ये दोनों बराबर शामिल हैं। इसलिए इन्हें अलग करके देखना एक रणनीतिक भूल है।
अब दूसरा उदाहरण। बीते साल प्रमोद वर्मा स्मृति पुरस्कार दिया गया। इसमें कृष्णमोहन को भी सम्मानित किया गया। जिस संस्था ने उन्हें सम्मानित किया, उसमें विश्वरंजन भी एक अध्यक्ष हैं। इसके बाद काफी हंगामा मचा। और कुछ समय बाद जन संस्कृति मंच ने कृष्णमोहन को बाहर का रास्ता दिखा दिया। कहा गया कि जसम का कोई भी साथी हत्यारों के साथ नहीं दिखाई देगा। जितने भी लोग माओवादियों के नाम पर आदिवासियों के नरसंहार को गलत मानते हैं और राज्य की हिंसा का विरोध करते हैं … सभी ने जसम के इस फैसले का स्वागत किया। लेकिन यहां सवाल उठता है कि जब विश्वरंजन जसम की नजर में एक अपराधी हैं तो फिर विभूति भगवान कैसे हो सकते हैं? एक ही चाल, चरित्र और बर्ताव के दो अलग-अलग लोगों के प्रति जसम का रवैया अलग-अलग कैसे हो सकता है? यहां कौन सी वजहे हैं और वो कौन से स्वार्थ हैं, जो जसम को विभूति का गुलाम बनाते हैं?
जसम को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। वह क्यों अपने भीतर एक “विश्वरंजन” को पाल रहा है और उसे बचा रहा है और क्यों दूसरे विश्वरंजन को हत्यारा करार दे रहा है? जो साहित्यकार और संवेदनशील शख्स जसम में हैं लेकिन उसकी इस नीति का समर्थन नहीं करते हैं उन सभी से अपील है कि वो बिना डरे सच सामने रखें। जसम को चंद लोगों के निजी स्वार्थों की भेंट नहीं चढ़ने दें। विभूति को जसम से बाहर करने के लिए दबाव बनाएं। इस तानाशाही का विरोध करें और जरूरत पड़े तो जसम से इस्तीफा दें।
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जसम जैसे संगठन और व्यक्तियों के “जनांदोलनों” का सिरा इसी तरह “सत्ताओं” के “हरम” में जाकर खत्म होता है समरेंद्र जी। कुछ जरूरी सवाल उठाए हैं आपने। लेकिन जब व्यक्ति और सिद्धांत को व्यवहार में अलगा दिया जाता है, तो आपके सामने कोई उम्मीद नहीं बचती।
बतौर सिद्धांत जसम अपने सबसे ज्यादा क्रांतिकारी होने की घोषणा खुद ही अक्सर करता रहता है। लेकिन व्यवहार में इससे जुड़े लोगों के चरित्र और मुनाफे पर आधारित संबंध कायम करने की प्रवृति की पड़ताल कर लीजिए, सब परतें खुल कर सामने आ जाएंगी। एक उदाहरण बहुवचन पत्रिका के कर्ताधर्ताओं का है। इससे आगे जाकर इस तथाकथित क्रांतिकारी लेखक संगठन के ऊपर से लेकर नीचे तक के पदाधिकारियों के निजी पक्ष का अध्ययन कर लीजिए, अफसोस और गुस्से के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा।
विश्व रंजन के अक्स के रूप में विभूति नारायण जैसे लोग इनके लिए एक मुनाफादायी संबंध हैं, और यह अकारण नहीं है कि विभूति को बचाने के लिए एक चालाक राजनीति (यों राजनीति को चालाक होना ही चाहिए) का सहारा लिया गया और कुछ लोग अब भी अपने रवैए को जस्टीफाई करने में लगे हैं।
जब विभूति की रोटी किसी संगठन या व्यक्ति के लिए जरूरी हो तो उसके मनोविज्ञान में भी तो विभूति के निष्कर्ष ही घुले होंगे न…
अरविंद जी,
आप जो कह रहे हैं वो सही है। लेकिन मुझे अब भी लगता है कि चंद लोग जसम जैसी संस्था को बंधक नहीं बना सकते। जब बाकी लोग उनसे जवाब मांगेंगे तो उन्हें जवाब देना ही पड़ेगा। हंस की गोष्ठी से चोर की तरह आलोक मेहता और विभूति नारायण राय को भागना पड़ा तो उसमें सीपीआई (एमएल) से जुड़े लोगों की बड़ी भूमिका थी। एमएल और जसम से किसी न किसी रूप में जुड़े कई लोग विभूति से सवाल पूछना चाहते थे। और जब विभूति पीठ दिखा कर भागने लगे तो नारेबाजी शुरू हो गई। मुझे यकीन है जसम के असली कार्यकर्ता एकदिन विभूति को संस्था से भी बाहर का रास्ता दिखा देंगे। न केवल विभूति बल्कि उनके जैसे तमाम लोगों को….
संस्था व्यक्तियों से बनती है समरेंद्र जी। मैं भी इसकी पुरानी छवि की ही वापसी की सदिच्छा रखता हूं और इस उम्मीद में हूं कि चंद स्वार्थी और धनलोलुप और बेईमान महत्त्वाकांक्षाओं के शिकार कैरिअरिस्ट लोगों की वजह से इसका नाश नहीं हो। भाषा सिंह ने थोड़ी हिम्मत की है, उन्हें और लोगों के साथ की जरूरत है। खुल कर उन पाखंडी और दोहरे चरित्र वाले लोगों के विरुद्ध खड़ा होना होगा, जिनके चलते जसम जैसे संगठन की यह हालत हो गई है। हाल के दिनों में इसने कुछ इस तरह के लोगों को अपने बीच जगह दी है…
मेरी एक छोटी सी जिज्ञासा है कि क्या क्या कोई आइ,पी.एस. अधिकारी हो कर भी किसी लेखक संघ का सदस्य हो सकता है?
राजीव जी, शिक्षा जैसे एक दो महकमों को छोड़ कर कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक संगठन का सदस्य नहीं नहीं हो सकता। लेकिन किसी सांस्कृतिक संगठन का हो सकता है।