“हिंदी प्रोफेसरों ने हिंदी का खाना खराब किया है”
हिंदी समाज का कोई संगठित चेहरा हमारे सामने नहीं है, इसलिए उसकी कोई बड़ी पहल हमें कभी नजर नहीं आती। इसलिए हमारी साहित्यि पत्रिकाओं और हमारे साहित्य के गुनीजन बड़ी तादाद में हमें नजर नहीं आते। कवि मंगलेश डबराल ने मंगलावार की शाम, इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में बहसतलब चार के मंच से बोलते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने मराठी के कथाकार भालचंद्र नेमाडे के नये उपन्यास हिंदू का जिक्र करते हुए कहा कि तीन खंडों के इस उपन्यास का पहला भाग आया है और देखते ही देखते इसकी पांच हजार कॉपी बिक गयी है। हिंदी में ऐसा कभी संभव ही नहीं हुआ।
मंगलेश डबराल ने कहा कि कहने को हिंदीभाषियों की संख्या 45 करोड़ है – लेकिन हिंदी साहित्य को पढ़ने-समझने वाले ज्यादातर विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग के प्रोफेसर है – जिन्होंने दरअसल हिंदी का खाना खराब किया है। उन्होंने कहा कि हमारे बड़े लेखकों ने बहुत प्रतिबद्धता के साथा साहित्यिक पत्रकारिता की है। प्रेमचंद ने तीन पत्रिकाएं निकालीं – माधुरी, हंस और जागरण। परसाई ने भी वसुधा और मतवाला मंडल से एक माहौल बनाया। इन तमाम लोगों के समय तक हिंदी पत्रकारिता में भरी-पूरी साहित्यिक सुरुचि थी, लेकिन बाद की पत्रकारिता मास मीडिया में बदल गयी। फिर तो सनसनी ही सनसनी बची, साहित्य नहीं बचा।
मंगलेश डबराल ने करगिल युद्ध का उदाहरण देते हुए एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त का जिक्र खुलेआम किया कि कैसे सेना के अधिकारियों के मना करने के बावजूद उन्होंने मोर्चे पर फ्लैश का इस्तेमाल किया और जिसकी वजह से पाकिस्तानी सरहद से गोली चली और हमारे कुछ जवानों को हमसे छीन लिया। मंगलेश डबराल ने कहा कि मास मीडिया की पत्रकारिता का सामाजिक दायित्व न्यून है, जबकि हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएं अभी भी सरोकारों की बात करती है।
कवयित्री अनामिका ने पूरी दुनिया के किस्से बताते हुए और हिंदी पत्रकारिता के पुराने वक्तों की याद करते हुए कहा कि परंपरा को समझे बगैर हम किसी भी तरह की नयी पहलकदमी नहीं ले सकते। हम अपने वर्तमान को भी नहीं समझ सकते। अभी प्रिंट से लेकर वेब तक के हर मोर्चे पर लोगों के पास कहने को इफरात बातें हैं। हर जगह सजग लोग हैं, जो बड़े सृजनात्मक काम करना चाहते हैं। अनामिका ने ऐसे सजग लोगों का एक गुरिल्ला समूह तैयार करने की जरूरत को अपने वक्तव्य में रेखांकित किया।
कथाकार और समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि हिंदी समाज जितना बड़ा है, उतना ही अनपढ़ है। शिक्षा फैल रही है और अंग्रेजी ने बहुत सारा स्पेस हमारे समाज में ले लिया है। पूरा दृश्य ऐसा है – जैसे हमारा समाज अस्मिताविहीन समाज हो। पंकज बिष्ट ने कहा कि हिंदी की कुछ पत्रिकाएं ऐसी रहीं, जिसका सम्मान हिंदी क्षेत्र के बाहर भी रहा। उन्होंने इस क्रम में धर्मयुग का जिक्र किया, जिसकी प्रसार संख्या चार लाख तक पहुंची। पंकज जी ने बताया कि मालिकों को जब तक लगता रहा है कि हिंदी समाज की मुख्यधारा में आ सकती है, उन्होंने धर्मयुग, सारिका और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं निकाली – लेकिन जैसे ही लगा हिंदी का खेल खत्म है, उन्होंने अपने को समेट लिया। पंकज बिष्ट ने कहा कि आज भले धर्मयुग नहीं है, लेकिन सैकड़ों ऐसी छोटी-छोटी पत्रिकाएं हैं – जो छोटे-छोटे शहरों से निकल रही है। इनका निरंतर निकलते रहना बताता है कि हिंदी समाज बहुत व्यग्रता से अपने माध्यम तलाश रहा है।
पंकज बिष्ट ने कहा कि हिंदी के बारे में अक्सर लोग कहते हैं कि इसमें किताबें नहीं बिकतीं। हिंदी मर रही है। लेकिन सच तो ये है कि दुनिया भर में साहित्य का स्थान घटा है। दूसरी भारतीय भाषाओं का हाल भी हिंदी से अलग नहीं है।
कुछ बुनियादी सवाल पत्रकार और विचारक मनीषा ने उठाये। उन्होंने कहा कि साहित्य हाशिये पर क्यों चला गया, क्योंकि साहित्य का गलियारा वन वे हो गया है। लेखक ये समझना ही चाहते कि पाठकों के मन में क्या है। वो क्या चाहता है? उन्होंने कहा कि टेलीविजन पर हमने सास-बहू के सीरियल को खूब गाली दी – लेकिन एकता कपूर के उसी सीरियल को लाखों लोगों ने देखा। उसने रिकॉर्ड तोड़ टीआरपी दी, क्योंकि एकता कपूर को पता था कि दर्शक क्या चाहता है। हमारे लेखकों को भी पाठक की सुध लेनी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि नये मीडिया माध्यमों में ये सुविधा है कि वहां पाठक जैसे चाहे, जब चाहे रिएक्ट कर सकता है और उसका रिएक्शन दर्ज भी हो सकता है लेकिन पुराने माध्यमों के साथ ये सुविधा नहीं है। बल्कि पाठकीय प्रतिक्रियाओं को भी चापलूसी तक सीमित कर दिया गया है। मनीषा ने कहा कि जमाना आगे बढ़ रहा है और हमारे लेखक अभी भी गांव की पुरानी पगडंडियों, नदियों की संवेदनाओं में उलझे हुए हैं। अगर ऐसा ही रहा, तो साहित्य का हाशिया और बड़ा होगा।
इसके बाद सवाल-जवाब का लंबा दौर चला। लीलाधर मंडलोई, रमणिका गुप्ता, अजय नावरिया, रंजीत वर्मा, आशीष कुमार अंशु, विनीत कुमार ने अपने सवाल पूछे। बहसतलब की शुरुआत हमेशा की तरह पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन से हुई, जिसे इस बार तैयार किया मध्यप्रदेश के सिंगरौली में रह रहे युवा कथाकार राकेश बिहारी ने। यात्रा बुक्स की प्रकाशक नीता गुप्ता ने साहित्यिक पत्रकारिता पर आयोजित इस बहसतलब के कुछ संदर्भ बिंदु सबसे पहले रखे और आखिर में पेंग्विन हिंदी के संपादक निरुपम ने श्रोताओं, दर्शकों को धन्यवाद दिया।
ऑडिएंस में इस बार सलमा ज़ैदी, अचला शर्मा और परवेज़ आलम, गिरधर राठी, नमिता गोखले, मैत्रेयी पुष्पा, अजय कुमार और ओम थानवी शामिल थे। राजेंद्र यादव अपनी अस्वस्थता के चलते नहीं आ पाये। उन्हें बहसतलब चार में वक्ता की हैसियत से शामिल होना था।
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hain] ka purana shouk hai.Sahityakaron ki kshudra gutbaji ne bhi hindi ka khana kharab kiya hai balki
jyada hi.