परम्परा की लूट है, लूट सके सो लूट!

छ्म्मकछल्लो को अपने देश के रीति रिवाज़ पर बडा नाज है। जब अपने लोगों को इस रीति नीति के पालन में तत्परता से जुटे देखती है तब उसका दिल बाग-बाग होने लगता है। आजकल बाग-बाग बोलने में खतरा है, क्योंकि बाग में हरियाली होती है। हरा रंग धरती के सुख समृद्धि का प्रतीक था। मगर अब यह केवल रंग हो गया है. रंग को भी एक खास सम्प्रदाय से जोड दिया गया है। पहले छ्म्मकछल्लो गाती थी- कुसुम रंग साडी, साडी में गोटा लगी. कुसुम रंग का अर्थ केसरिया, चम्पई होता है। राजस्थान में लोग गाते हैं-‘केसरिया बालमा, पधारो म्हारो देश रे.” अब कुसुम, केसर या चम्पई बोलने में बडा खतरा है। वैसे ही बाग-बाग बोलने में. कब कौन आकर आपको देशद्रोही ठहरा दे, इसका कोई भरोसा नहीं।

देश से, देश की परम्परा से प्रेम करने के अपने तरीके हैं। ढेर सारे, जैसे आज से कोई पचीस साल पहले बिहार में एक परम्परा ने जन्म ले लिया था- पकडौआ विवाह की परम्परा. दहेज के अतिरेक ने कम पैसेवाले बेटीवालों को मज़बूर कर दिया था अच्छे विवाह योग्य वर का अपहरण करके जबरन उसकी शादी करवा देने का. बाद में उसके दुष्परिणाम सामने आने पर धीरे धीरे वह परम्परा खत्म सी हो गई। अभी रोमेन झा ने उस पर एक फिल्म भी बना दी- “अंतर्द्वंद्व”. किसका और कैसा “अंतर्द्वंद्व”., यह फिल्म देखकर आपको पता चलेगा। फिल्म में तो लिख दिया गया कि यह एक सच्ची कहानी पर आधारित है. मगर रोमेन झा ने यह बताना ज़रूरी नहीं समझा कि अब यह परम्परा इतिहास का हिस्सा हो गई है। ‘कांजीवरम”’ फिल्म भी सच्चाई पर आधारित है, मगर इसके साथ घटना के काल, पात्र समय सभी का विवरण है और यह भी कि कब इस प्रथा का उन्मूलन हुआ।

पकडुआ विवाह की परम्परा भले ही आज की घटना लगे, मगर है तो अब बीती बात। इसे फिल्मकार दिखा सकते थे। न बताने का खामियाजा बिहार को इस रूप में भोगना पडेगा कि बिहार से अलग राज्य और देश के लोग यही समझेंगे कि बिहार में अभी भी वैसी परम्परा है। चेन्नै के हॉल में इस फिल्म को देखते हुए छम्मकछल्लो ने महसूस किया। यानी वैसे ही बिहार को बढिया नाम देने से हम चूकते नहीं हैं, अब उस खाज में एक खुजली यह भी। प्रवेश भारद्वाज ने भी इस विषय पर एक फिल्म बनाई है ”’नियति’”. छ्म्मकछल्लो ने भी इस पर एक कहानी लिखी थी बरसो पहले, जो तब के मुंबई जनसत्ता के ‘सबरंग’ में छपी थी। उसे फिर कभी आपके सामने परोसा जाएगा। लोग कहते हैं, फिल्मकार ज़्यादा तेज हैं, हम कहते हैं, लेखक अधिक। तभी तो आपने देखा कि जिस जिगोलो पर छ्म्मकछल्लो की कहानी तीन साल पहले छप चुकी थी, उस जिगोलो पर रिपोर्ट टीवीवाले आज दे रहे हैं।

जिस पकडुआ विवाह पर दस साल पहले कहानी लिख दी गई थी, उस पर आज फिल्म बनी और रष्ट्रीय पुरस्कार पा भी गई। छम्मकछल्लो के साथ तो और भी अजब गजब हो जाता है। उसने छम्मकछल्लोकहिस नाम से ब्लॉग कई साल पहले से चलाया तो ‘देव डी’ में अनुराग कश्यप ने अपनी हीरोइन की चैट ही छम्मकछल्लो के नाम से करवा दी।

यह सब परम्परा है, बौद्धिक परम्परा की अमानतदारी, खयानतदारी हमेशा रहती है जारी। इसलिए छम्मकछल्लो अपने देश की इन सभी परम्पराओं पर नाज़ करती है।

एक परम्परा है, किताबें ले कर दो मत. लौटा ही दिया तो बुद्धिजीवी क्या कहलाए? आज ही छम्मकछल्लो अपने एक सहयोगी से कह रही थी कि किताबें लौटाने के लिए थोडे ना होती हैं. दरअसल वे छम्मकछल्लो की पत्रिका देर से लौटाने के लिए उससे क्षमा मांग रहे थे। वे अच्छे हैं, बेहद अच्छे, मगर अभी तक वे बुद्धिजीवी के स्तर तक नहीं पहुंच सके, इसलिए पत्रिका व किताब दोनों ही लौटा दी.
अपनी एक और परम्परा है, अपना घर साफ हो, गली हमारी थोडे ही है। इस परम्परा का हम जी भर कर पालन करते हैं। अपनी चीज़ हो तो खूब हिफाज़त से रखते हैं, दूसरे की चीज़ पर कैसी मरव्वत? सारा प्रयोग उस पर कीजिए। आपको पूरी छूट है।

वैसी ही एक परम्परा है, अपनी बहन बीबी को घर के अंदर रखिए, मगर दूसरों की बहन बीबी पर अपना पूरा अधिकार जताइए. अपने लिए सीता जैसी बीबी चाहिए, मगर तितली जैसी हसीना पर दिल फिर से बाग-बाग हो जाता है। ओए जी, मेरी रक्षा करना आप पाठको, दिल बार बार बाग-बाग हुआ जा रहा है। अब अपनी परम्पराएं हैं ही ऐसी। तितलियों पर भंवरे की तरह उडनेवाले देश के सच्चे वीर बांकुरों से ज़रा आप पूछकर देखिए कि क्या वे इस तितली को जीवन संगिनी बनाएंगे तो वे ऐसे छूटेंगे जैसे किसी ने जबरन उसी तितली से इनको राखी बंधवा दी हो।

एक परम्परा है, स्त्रियों को हमेशा अपने से कम करके आंको। सामंती सोच की यह धार अभी तक नहीं मिटी है, भले देश 64 साल पहले आज़ाद हो गया। बेटियों को पुश्तैनी ज़मीन में हिस्सा मत दो, भले इसके लिए कानून बन गए हैं. दहेज के नाम पर चाहे जितनी बलि ले लो, कानून के रखवाले आपका कुछ भी नहीं बिगाड सकते। चाहे तो कोई कोरे कागज़ पे मुझसे करा ले सही ये सब हमारे देश की कुछ महान परम्पराएं हैं। हम इनके बरक्स कुछ भी करना पसंद नहीं करते। करेंगे तो हमारी परम्परा, हमारी संस्कृति खाक में न मिल जाएगी? आखिर हम क्या देंगे अपनी अगली पीढी को? हरी भरी धरती, साफ पानी, साफ हवा, प्रदूषण रहित वातावरण,प्रेम करने, समझने की आज़ादी, स्वस्थ भोजन, खुला आसमान- यह सब कुछ तो दे नहीं सकते. तो यही कुछ चंद परम्पराएं दे आएं? आखिर देने का कुछ तो धर्म निभाएं ना हम परम्परावाले भी।

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Posted by on Sep 1 2010. Filed under मुद्दा, सुर्ख़ियां. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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