मराठी सिनेमा में ज्यादा हिप्पोक्रेसी है-सचिन कुंडलकर
सचिन अपनी मां की बात करते हैं जो कि उनके मोबाइल यूट्यूब पर लग जा गले देखने की डिमांड से शुरू होती है। सचिन बताते हैं कि उस वीडियो में हीरोइन का हीरो के प्रति अपील खुलकर फिल्माया गया है। पूरा एप्रोच बोल्ड है जो कि अब सिर्फ एक मुहावरा बनकर रह गया है। मां उसे देखती है। इस मामले में मैं समझता हूं कि हमारा सिनेमा बहुत प्रोग्रेसिव है। मतलब कि सहज तौर पर दर्शक इस स्तर पर भी जुड़े हैं लेकिन सिनेमा के स्तर पर एक दूसरी बड़ी समस्या सामने आती है।
हमारे जीने का जो अंदाज है, जो व्यवहार है, मुझे लगता है कि सिनेमा के स्तर पर उसके कोई भी प्वाइंट का रिफ्लेक्शन हम नहीं दे रहे हैं। इस मामले में कोई गुड इग्जांपल हमें दिखाई नहीं देता। भाषा को लेकर यहां जबरदस्त समस्या है। मुझे समझ नहीं आता कि भाषा को लेकर हम इतने शर्माये हुए क्यों हैं? सचिन ने इस संदर्भ में अकेले हो जाने की चिंता भी जाहिर की और कहा कि इस मामले में मराठी सिनेमा में ज्यादा हिप्पोक्रेसी है।
भाषा को लेकर जो सवाल सचिन ने उठाये, उसे लेकर लंबी बहस चली, जिसमें अनुराग कश्यप, सुधीश पचौरी और सुभाष वर्मा सक्रिय तौर पर शामिल हुए। अनुराग कश्यप ने कहा कि अंग्रेजी में जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं वही अगर हिंदी में आ जाए तो वल्गर हो जाता है। अंग्रेजी में फक शब्द कॉमन है लेकिन वही शब्द अगर हिंदी में आये तो हमारी भाषा में जो मोरैलिटी है, उसकी वजह से हम खुल नहीं पाते।
यहां तक आते-आते भाषा, संस्कृति और उसे लेकर दारोगागिरी का सवाल एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्थी करने लग जाते हैं और बहस का जो क्रम एक के बाद एक वक्ता का चला आ रहा था, वो थोड़ी देर के लिए भंग होता है जिसमें विनोद अनुपम से आउटलुक की पत्रकार और जानी-मानी फिल्म समीक्षक की असहमति और चंद्रप्रकाश द्विवेदी से सुधीश पचौरी की इन्क्वाइरी पूरी बहस में गर्मी पैदा करती है।
नम्रता जोशी
विनोद अनुपम ने चाहे जिस सदिच्छा से सिनेमा में स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर अराजक शब्द का इस्तेमाल किया हो लेकिन उसका जो अर्थ हममें से अधिकांश लोगों ने समझा, वो वाकई दिक्कत पैदा करनेवाला रहा। उनके हिसाब से स्त्रियां अगर परिवार, मर्यादा के ढांचे के भीतर रहकर अपनी इच्छा और आजादी की बात करती है तब तो वो सही है, गाइड की नायिका को वो इसलिए बेहतर मानते हैं। लेकिन वही जब इन मर्यादाओं को तोड़कर अपनी आजादी की बात करती है तो वो अराजक है। विनोद अनुपम से सबसे बड़ी असहमति यहीं पर आकर बनती है कि वो संबंधों के सांस्थानिक रूपों को बचाये रखने को अंतिम मर्यादा का हिस्सा मानते हैं। नम्रता जोशी इससे साफ तौर पर असहमत नजर आयीं। उनका कहना है कि आपने जो अराजकता शब्द इस्तेमाल किया है… उससे दिक्कत है। वो अपने में औरत नहीं है, जो कि मुझे परेशान करता है। जैसे ही वो जकड़न तोड़ना चाहती है, तो हम अराजकता का ठप्पा लगा देते हैं। जब तक दीवार तोड़ेगें नहीं तो फिर नयी चीजें बनेंगी कैसे।
नम्रता जोशी की इस असहमति को विनोद अनुपम ने नियंत्रण शब्द शामिल कर एक बैलेंस बनाने की कोशिश की और कहा कि हम मुक्त होने के संदर्भ में कभी भी नियंत्रण की बात शामिल नहीं करते।
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