राख हो चुके राममंदिर मुद्दे में आग लगाने की कोशिश

सलीम अख्तर सिद्दीकी ने यह लेख हमें 25 सितंबर को ही भेजी थी।लेकिन बहसतलब -5 में अतिव्यस्तता के कारण इसे प्रकाशित नहीं कर सके।इसके लिए क्षमाप्रार्थी ।लेख की प्रासंगिकता आज के संदर्भ में ज्यादा है इसलिए हम पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं…मॉडरेटर

भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है। वह चाहती है कि फैसला पक्ष में आए या विपक्ष में, लेकिन आए जरुर। फैसला किसी भी रुप में आए, भाजपा इसे कैश करने की चाहत रखती है। यदि कोर्ट 29 या 30 सितम्बर को कोई फैसला देती है तो भाजपा उसे भुनाने की कोशिश जरुर करेगी। भाजपा को यह डर भी सताने लगा है कि अब फैसला कानूनी पेचिदगियों में उलझ कर लम्बे अरसे तक लटक सकता है। इसीलिए भाजपा फैसला आए या नहीं, राममंदिर मुद्दे को एक बार फिर आजमाना चाहती है। इसलिए भाजपा के कोर ग्रुप ने लालकृष्ण आडवाणी को राख हो चुके राममंदिर मुद्दे में आग लगाने की इजाजत दे दी है। दरअसल, भाजपा का उदय इसी राममंदिर मुद्दे को हवा देकर और हजारों बेकसूर लोगों की जान लेकर हुआ था। जब नब्बे के दशक में लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या तक रामरथ यात्रा लेकर चले थे तो वो केवल रथयात्रा ही नहीं थी-मौत का तांडव करता ऐसा लश्कर था, जो जहां से गुजरता था वहां आग और खून की होली शुरु हो जाती थी। साम्प्रदायिकता की आग पर उन्होंने जमकर रोटियां सेंकी थी। अब इसे दुर्भाग्य कहें या कुछ और कि सिकी हुई रोटियां अटलबिहारी वाजपेयी के हिस्से में आयी, लालकृष्ण आडवाणी टापते रहे गए थे। जब 1998-99 में केन्द्र में भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता दिया गया था तो बहुत सारे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को साम्प्रदायिक लालकृष्ण आडवाणी मंजूर नहीं थे।

आरएसएस ने अटल बिहारी वाजपेयी के ‘खांटी संघी’ चेहरे पर एक उदारवादी का मुखौटा लगाकर तैयार किया हुआ था। सरकार बनवाने के लिए उन्हें आगे कर दिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी की खासियत यह थी कि वे बोलते कुछ थे और करते कुछ और थे। यह नहीं भूलना चाहिए कि आखिर अटल बिहारी वाजपेयी भी तो खाकी निक्करधारी हींं हैं। वे भला सभी स्यंवसेवकों की तरह आरएसएस की नीतियों से कैसे अलग जा सकते थे ? उसी मुखौटे से संघ परिवार ने ‘अछूत’ माने जाने वाली भाजपा को कुछ सत्ता के भूखे ‘समाजवादियों’ में स्वीकार्य कराकर भाजपा की सरकार बनवा दी थी। अटल बिहारी वाजपेयी नाम के शख्स का मुखौटा भी तब ही उतर गया था, जब वे 5 दिसम्बर 1992 को जमीन को समतल करने और वेदी के लिए जमीन लेने की बात कहकर अपनी मंशा जाहिर कर रहे थे। क्या किसी को याद पड़ता है कि कभी अटल बिहारी वाजपेयी ने सघ की मर्जी के बगैर कोई कदम उठाया हो ? याद कीजिए 2002 का गुजरात नरंसहार। नरसंहार के बाद जब वाजपेयी विदेश यात्रा पर जा रहे थे, तो उन्होंने रुंधे गले से कहा था कि ‘मैं क्या मुंह लेकर विदेश जाउंगा।’ विदेश यात्रा से आने के बाद शायद आरएसएस की फटकार का नतीजा था कि विदेश यात्रा से कुछ ही दिन बाद हुए भाजपा के गोवा अधिवेशन में वाजपेयी का ‘सुर’ बदला हुआ था।

बहरहाल, लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री न बनने का दुख आज तक सालता है। वाजपेयी के नेपथ्य में चले जाने के बाद आरएसएस ने वाजपेयी की तरह लालकृष्ण आडवाणी के चेहरे पर उदारवादी का मुखौटा लगाने की कवायद की। इस कवायद के चलते आडवाणी कराची जाकर मौहम्मद अली जिनाह की मजार पर मत्था टेक आए और साथ ही जिनाह को धर्मनिरपेक्ष की उपाधि से नवाज डाला। इसके पीछे शायद संघ की सोच यह रही हो कि इस कवायद से भारत का मुसलमान और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों में आडवाणी को स्वीकार्यता मिल जाएगी। यह कहना गलत होगा कि आडवाणी जिनाह को धर्मनिरपेक्षता का तमगा आरएसएस की मर्जी के बगैर ही दे आए होंगे। यहां भी आडवाणी का दुर्भाग्य रहा कि दांव उल्टा पड़ गया। संघी विचारधारा के लोगों में आडवाणी खलनायक बन गए। मजबूरी में संघ को आडवाणी को भाजपा के अध्यक्ष पद से चलता करना पड़ गया।

2009 के चुनाव के वक्त संघ के ‘मुखौटा’ अटलबिहारी वाजपेयी अप्रसांगिक हो चुके थे। मजबूरी में भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी को प्रधामंत्री पद के लिए आगे करके चुनाव लड़ा। जब यह सवाल उठा कि आडवाणी की उम्र ज्यादा है तो उन्होंने कसरत शुरु कर दी और चुनावी पोस्टरों में ‘ही मैन’ टाइप की तस्वीरें खिंचवा कर चस्पा करा दी गयीं। लेकिन आडवाणी की किस्मत में प्रधानमंत्री पद नहीं था। 2009 की हार ने भाजपा को गहरे अवसाद में डाल दिया। अवसाद इतना गहरा था कि भाजपाई आपस में लड़ने भिड़ने लगे। संघ ने मोहन भागवत के मौहल्ले मे रहने वाले संघ कैडर के उस नितिन गडकरी को भाजपा का अध्यक्ष बना दिया, जिसे अध्यक्ष बनने से पहले तक भागवत के मौहल्ले वाले ही जानते थे। उन्होंने अपनी पहचान बनाने के लिए ऐसे-ऐसे बयान दिए, जिससे भारतीय राजनीति शर्मसार हुई।

24 सितम्बर को अयोध्या की विवादित जगह के मालिकाना हक के आने वाले फैसले से मृतप्रायः पड़े विवादित बाबरी मसजिद/राम मंदिर मुद्दे को गर्माने का मौका भाजपा को मिल रहा था। लेकिन रमेश चंद त्रिपाठी नाम के आदमी ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। दरअसल, भाजपा के पास राजनीति करने के लिए कोई आर्थिक या सामाजिक मुद्दा नहीं है, इसीलिए वह बार-बार राममंदिर की ओर ही देखती है। इसमें उसकी गलती भी नहीं है। जब 1984 में भाजपा मात्र दो सीटें लेकर दफन होने की कगार भी थे, तब राममंदिर मुद्दे ने ही उसे दफन होने से बचाया था। ये अलग बात है कि भाजपा के नेताओं ने भाजपा को दफन होने से रोकने के लिए हजारों लोगों को दफन करा दिया और हजारों को चिता पर जलवा दिया था।
इस देश के लोगों ने भाजपा की करनी और कथनी का फर्क देख लिया है। इसलिए अब यदि आडवाणी रथयात्रा निकलेंगे तो उनके साथ चन्द ऐसे लोग होंगे, जिनकी आंखों पर पट्टी बंधी होगी। कल्याण सिंह अभी अयोध्या होकर आए हैं। उनके साथ कितने लोग थे ? उन्हें भी पता चल गया होगा कि 1992 से अब तक सरयू नदी में बहुत पानी बह चुका है।

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Posted by on Sep 30 2010. Filed under ब्लॉग, मुद्दा. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

2 Comments for “राख हो चुके राममंदिर मुद्दे में आग लगाने की कोशिश”

  1. shankar upadhyay

    jannab jara muslim socha se bahar nikal kar bhart ko ek bhartiya akho se dekho ge to pata chaleha , apka ye lekh kure daan ke layak bhi nahi hai

  2. vivek

    jai sri ram jai ho sri ayodhya dham

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