बिहार में लोहिया के चेलों के राज में ‘लालों’ का जलवा
बिहार चुनाव में इस बार ‘लालों’ या पुत्रों-पुत्रियों की चांदी है। वैसे न तो पहली बार हो रहा है, न आखिरी बार। लेकिन जो पार्टियां इस बात पर गर्व करती थीं कि उनके यहां पारिवारिक संपर्कों के आधार पर टिकट नहीं बांटा जाता वे भी पीछे नहीं रहीं। बात करें नीतीश कुमार के जेडी-यू की तो उसके लिस्ट में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों-जगन्नाथ मिश्र और राम सुंदर दास के दुलारों का नाम अहम है। यूं जगन्नाथ मिश्र के बेटे पहले भी इसी पार्टी से विधायक रह चुके हैं। नीतीश मिश्र को फिर से झंझारपुर से टिकट दिया गया है जबकि रामसुंदर दास के बेटे संजय कुमार को राजपाकड़ विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है। जेडी-यू ने जहानाबाद के सांसद जगदीश शर्मा के बेटे राहुल शर्मा को घोसी से टिकट दिया है। घोसी वहीं सीट है जहां से शर्मा खानदान 1977 से लगातार जीत रहा है। पिछली लोकसभा में चुन लिए जाने के बाद जगदीश शर्मा ने अपनी पत्नी को वहां से निर्दलीय जितवा दिया था। नीतीश कुमार, इस ताकतवर क्षत्रप के दुस्साहस पर कुछ नहीं कर पाए थे। अब उनके बेटे को टिकट दिया गया है। नीतीश सरकार के एक दूसरे कद्दावर मंत्री नरेंद्र सिंह के बेटे अजय प्रताप सिंह को जमुई से जेडी-यू टिकट मिला है। इससे पहले अजय के भाई अभय प्रताप सिंह वहां के विधायक थे जिन्होंने कुछ महीनों पहले अपनी पुत्री और पत्नी की हत्या के बाद आत्महत्या कर ली थी। जेडी-यू ने तस्लीमुद्दीन के सुपुत्र सरफराज आलम को जोकीहाट से टिकट दिया है, जो पिछली बार आरजेडी के टिकट पर खेत रहे थे।
मजे की बात ये है कि पार्टी ने अपने सुशासन और अपराध-मुक्त छवि को ताक पर रखते हुए कुछ अपराधियों के भाई और पत्नियों को टिकट से नवाजा है। तकनीकी तौर पर इसमें कोई खामी नहीं है, लेकिन व्यावहारिक बात सभी जानते हैं। पार्टी ने कई आपराधिक मामलों में फंसे विधायक शशि कुमार राय के भाई नंद कुमार राय को बरुराज से टिकट दिया है तो फुलपरास से हत्या के आरोपी पूर्व विधायक देवनाथ यादव की पत्नी गुलजार देवी को टिकट दिया है। जेडी-यू एक मामले में सचमुच अलग पार्टी दिखती है कि इसने बेटे तो बेटे, नेताओं के बाप को भी बुढ़ापे में टिकट से नवाज दिया। पार्टी ने लोकसभा सांसद महेश्वर हजारी के पिता रामसेवक हजारी को टिकट दिया है तो उधर सांसद विश्वमोहन शर्मा की पत्नी सुजाता देवी भी टिकट पाने वालों की लिस्ट में है।
जेडी-यू ने पूर्व नौकरशाह और सांसद रहे सैयद शहाबुद्दीन की बेटी परवीन अम्मानुल्लाह को साहिबपुर कमल से टिकट दे दिया है। परवीन के पति अफजल अम्मानुल्लाह आईएएस हैं और नीतीश सरकार में गृह सचिव का ओहदा संभाल चुके हैं। कहा जाता है कि ये वहीं अम्मानुल्लाह हैं जिन्होंने रथयात्रा के दौरान आडवाणी की गिरफ्तारी में अहम भूमिका निभाई। परवीन भी गुजरात मसले पर बीजेपी की घनघोर आलोचना कर चुकी हैं और उनके पिता सैयद शहाबुद्दीन तो बाबरी मस्जिद आन्दोलन के सूत्रधारों में रहे हैं। लेकिन मजे की बात ये है कि वहीं परवीन आज एनएडीए की उम्मीदवार हैं, बीजेपी की ताऱीफ भी कर रही हैं। नीतीश कुमार ने बीजेपी को चिढ़ाना बंद नहीं किया है!
हलांकि पार्टी के आन्तरिक समीकरण की वजह से जेडी-यू ने मुजफ्फरपुर के कद्दावर सांसद कैप्टन जयनारायण निषाद के लाल को टिकट नहीं दिया। उधर गोपाल गंज के सांसद पूर्णमासी राम के बेटे विजय कुमार राम को भी टिकट नहीं दिया। विजय कुमार राम ने कांग्रेस में जुगाड़ लगाई और हरसिधी से टिकट पा गए। दूसरी तरफ कांग्रेस ने निषाद की बहू को हाजीपुर से टिकट दे दिया।
हलांकि ऐसा भी खूब हुआ कि पिता जेडी-यू या आरजेडी में जुगाड़ नहीं लगा पाए तो पुत्र ने विपक्षी पार्टी से टिकट झपट ली। अब ऐसा ही उदाहरण है सांसद महाबली सिंह और जगदानंद सिंह के बेटों का। जेडी-यू सांसद महाबली सिंह के बेटे को आरजेडी ने टिकट दे दिया है। आरजेडी ने दरभंगा के पूर्व सांसद अली अशरफ फातमी के बेटे फराज फातमी को केवटी से टिकट दिया है। उधर आरजेडी के कद्दावर सांसद जगदानंद के बेटे बीजेपी से बक्सर सीट के लिए उम्मीदवार बन गए। आरजेडी ने दूसरे नेता पुत्रों को भी खूब तरजीह दी है। लालू के खास रहे रघुनाथ झा के बेटे अजीत झा को आरजेडी ने फिर से शिवहर से उम्मीदवार बनाया है। दूसरी तरफ पूर्व मंत्री सीताराम सिंह के बेटे राणा रणधीर को आरजेडी ने मधुबन सीट पर टिकट से नवाजा है।
इधर लोजपा सुप्रीमों रामविलास पासवान के दो भाई मैदान में है। पूर्व सांसद रामचंद्र पासवान और पशुपति पारस दोनों विधायक बनने के लिए ताल ठोक रहे हैं। रामचंद्र पासवान कुशेश्वर स्थान से मैदान में है जबकि पारस अलौली से। पासवान की एक रिश्तेदार सरिता देवी सोनबरसा से टिकट पा गई हैं। लोजपा के राज्यसभा सांसद साबिर अली की पत्नी यास्मीन अली, नरकटिया गंज से टिकट पा गई हैं तो पार्टी के उपाध्यक्ष सुरजभान सिंह के साले रमेश सिंह विभूतिपुर से मैदान में है। लोजपा ने गोविंदगंज से राजू तिवारी को मैदान में उतारा है जिनके भाई राजन तिवारी हत्या के आरोप में बंद हैं।
बिहार चुनाव में राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों का लिस्ट देखकर लगता है कि लोहिया के शिष्यों ने जमकर खानदानवाद की पैरवी की है। नीतीश कुमार ने कई बार ये इम्प्रेशन देने की कोशिश की कि उनके पार्टी में परिवार के आधार पर टिकट नहीं बांटा जाता, लेकिन ये बाते हवाई साबित हुई। कुल मिलाकर, कुलीनों का कुनबा बढ़ने वाला है।
Last 5 posts by सुशांत झा
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बिहार के भोजपुरिया इलाके में एक कहावत है ” हल के पालो में खेत जोतते समय अगला बैल जिस रास्ते चलता है पिछले सारे बैल उसी रास्ते का अनुसरण करते है” व्यवस्था कि भी वही कहानी होती है , लेकिन मनुष्य बैल नहीं होता, सुधार तब होगा जब इंसान बैल को आदमी बना दे. परन्तु पहल करने वाले में इतनी इमानदारी तो हो.
lohiya kai chalai vilakshan jantu hain…inhonai communiston se batchodi(demogogy) seekhi hai aur congressiyon sai seekha hai kisi bhi tarah satta mai bane rahnai ka haramipan…koi chela congress kai sath milkar satta mai hai to koi BJP kai saath…ek zamanai main ye CPI kai sath bhi satta mai thai samvid sarkar ke samay…koi VP singh ke sath mantri bana, koi devgoda kai saath aur koi Vajpeyee kai saath…lohiya ke sattalolup chelon ki lal topi ko lal salam!!!!
नेता कितने नीचे गिर चुके हैं ये बताने की ज़रूरत नहीं है. सबने खुद को महाराज मानते हुए अपने बच्चों को टिकट दिया है लेकिन इनको सबक सिखाने की ज़िम्मेदारी तो सिर्फ जनता जनार्दन की है. अगर जनता चेत जाए तो समझ लीजिए इस सबकी ज़मानत ज़ब्त हो जायेगी वरना स्यापा तो करना ही है.