चोर गरजने लगे और पत्रकार दुम हिलाने लगे

कॉमनवेल्थ गेम्स। ये शब्द सुनाई देते ही करोड़ों-अरबों रुपये के भ्रष्टाचार की बात सबसे पहले जेहन में आती हैं। कनॉट प्लेस में हुई लीपा-पोती और अबतक कटी हुई टेलीफोन लाइनें अफरा-तफरी की गवाही देती हैं। पार्लियामेंट स्ट्रीट से लेकर नई दिल्ली में फुटपाथ पर पैदल यात्रियों के चलने की जगह पर खड़े किए गए लोहे के बेतुके बाड़ बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं। यह भी कि पैसे की हवस में अफ़सरों और नेताओं ने वाहियात योजनाओं में पैसा पानी की तरह बहाया है और जो पैसा उन्होंने बहाया… बर्बाद किया है, वो उनके बाप का नहीं था बल्कि इस देश की जनता का था।

आप दिल्ली में जिधर भी जाइये आपको अधूरी योजनाओं की तस्वीरें मिल जाएंगीं। बाहरी इलाकों की बात छोड़ दीजिए, गोल मार्केट से कनॉट प्लेस और संसद मार्ग से होते हुए एक बार नई दिल्ली घूमने की देर है, जगह-जगह भ्रष्टाचार के नमूने नज़र आने लगते हैं। लेकिन इन तमाम गोरखधंधों के बीच सुरेश कलमाडी ताल ठोंक रहे हैं, शीला दीक्षित वाहवाही बटोर रही हैं और खेल मंत्री एम एस गिल मीडिया पर गरज रहे हैं। और तो और मीडिया का एक तबका भी राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत भ्रष्टाचार के नंगे खेल पर पर्दा डालने में जुटा है और कह रहा है कि सुरेश कलमाडी ने मणिशंकर अय्यर को जवाब दे दिया है। करारा जवाब दिया है!

दरअसल, यह सबकुछ विकृत मानसिकता की देन है। एक ऐसी मानसिकता जिसमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद के नाम पर सारे कुकर्म किए जाते हैं। वरना कोई वजह नहीं थी कि जो भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे हैं उन्हीं की अगुवाई में ये खेल कराए जाते और फिर एक बेहद घटिए उद्घाटन समारोह को ऐसे बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता जैसे पूरी दुनिया में कभी ऐसे अद्भुत खेल आयोजन नहीं हुए हों।

यहां उन तमाम लोगों से पूछा जाना चाहिए था कि उस कॉमनवेल्थ गेम्स के उद्घाटन समारोह में ऐसी कौन सी अद्भुत बात थी, जिसे देख कर वो सभी खेलों पर उठाए जाने वाले सवालों को लेकर शर्मिंदगी महसूस करने लगे?

सुरेश कलमाडी और शीला दीक्षित ने ऐसा कौन सा इतिहास रच दिया जिससे उन सभी को भ्रष्टाचार के आरोपी कहने की जगह हीरो के तौर पर पेश किया जाने लगे? खेलों के उद्घाटन समारोह में निकाली गई झांकी, २६ जनवरी की परेड में निकलने वाली झांकियों के दोयम दर्जे के संस्करणों के अधिक नहीं थी, फिर इतना गुणगान तो आयोजन सच में भव्य हो जाता तब ये पत्रकार क्या करते? ए आर रहमान ने पांच करोड़ रुपये में इतना बेहुका थीम सॉन्ग पेश किया… अगर वो सच में एक महान रचना कर देते तब ये पत्रकार क्या कहते?

कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर हुए भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे तमाम पत्रकारों से पूछा जाना चाहिए कि मेलबर्न में जो आयोजन 5200 करोड़ रुपये में हुए थे चार साल बाद ठीक दिल्ली में हो रहे उसी आयोजन में 31000 करोड़ रुपये कैसे खर्च हुए? और उसके बाद भी इतनी अफरा-तफरी क्यों नज़र आ रही है? क्यों कनॉट प्लेस से लेकर शहर की ज्यादातर इमारतें भद्दी नज़र आती हैं? और क्यों सड़कों पर गड्ढे नज़र आते हैं?

बात इतनी सी नहीं है। खेलों से ठीक पहले उन तमाम मजदूरों को एनसीआर से बाहर भगा दिया गया जिन्होंने दिन-रात मेहनत करके शीला दीक्षित और सुरेश कलमाडी की टीम के गुनाहों को ढंकने की कोशिश की। उन मजदूरों पर पुलिस ने इसलिए जुल्म ढाए कि उनके पास फोटो पहचान पत्र नहीं थे। जिस देश में लोगों के पास खाने को पैसे तक नहीं हों वहां पुलिस द्वारा फोटो पहचान पत्र की मांग करना और मजदूरों को परेशान करना कितनी शर्मानक बात है, यह उन संपादकों से पूछा जाना चाहिए जो शीला दीक्षित और सुरेश कलमाडी के तलवे चाटने में व्यस्त हैं।

ये खेल हो रहा है क्योंकि इसे टाला नहीं जा सकता था। जैसे भी होता ये आयोजन होना था। और खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं तो इसके लिए खिलाड़ियों की तारीफ होनी चाहिए। लेकिन इसके आधार पर भ्रष्टाचारियों को क्लीनचिट देने की किसी भी कोशिश का विरोध किया जाना चाहिए। अगर कोई पत्रकार और मीडिया संस्थान शीला दीक्षित, सुरेश कलमाडी और एम एस गिल जैसे लोगों का बचाव कर रहा है और उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहा है तो यह समझा जाना चाहिए कि वो भी इस अभूतपूर्व लूट में शामिल है। इस देश की गरीब जनता के हिस्से के पैसे में उसने भी सेंध लगाई है।

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Posted by on Oct 10 2010. Filed under ब्लॉग, मुद्दा, सुर्ख़ियां. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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