पहला चरण कहानी स्पष्ट कर देगा

लगभग सभी सर्वेक्षणों ने नीतीश कुमार को बढत दे दी है।कुछ ने उन्हें पूर्ण बहुमत दे दिया है तो किसी किसी ने बहुमत के नजदीक बताया है लेकिन एक बात जो साफ दिख रही है वो ये कि बिहार में कांग्रेस एक बार फिर से जिंदा हो रही दिखती है।बिहार के समीकरण ने बड़े बड़े राजनीतिक पंडितों की नींद हराम कर दी है।
इतना तय है कि नीतीश इमेज के स्तर पर मजबूत हैं ।लेकिन वे जातिय समीकरण में इस बार थोड़े कमजोर दिखते हैं।पार्टी संगठन के स्तर पर भी उनके पार्टी में काफी अंतर्कलह है ।इस मोर्चे पर लालू मजबूत हैं।टिकट वितरण में भी लालू के उम्मीदवार ज्यादा मजबूत हैं। हां ,रामविलास के पास अच्छे उम्मीदवार का टोटा है ।कुल मिलाकर नीतीश देखें तो नीतीश अकेले ही सभी सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि लालू के साथ उनकी इमेज और उम्मीदवार दोनो हैं।
नीतीश के पास नीतिगत फायदे तो हैं लेकिन इस बार जातिगत समीकरण और पार्टी का अंतर्कलह उनके पक्ष में नहीं है इसलिए यह कह पाना खासा मुश्किल है कि वे फिर से सरकार बना हीं लेंगे।
कुछ महीने पहले यह तक यह मुकाबला सिर्फ नीतीश और लालू के बीच था। लेकिन अचानक ही अब नीतीश और उनके समीकरणों के बीच मुकाबला हो गया है । नीतीश कुमार इस बात से ज्यादा परेशान हैं कि उनके विरोधी विकास के मुद्दे के बजाय जातिगत मुद्दे को हवा देकर उन्हें पटकने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। हालांकि वे भी जातिय कार्ड खेल रहे हैं लेकिन इसे अपने चुनाव का आधार नहीं बनया है । अब ताजा अनुमान यह लगाया जा रहा है कि नीतीश 123 के जादुई आंकड़े से कुछ पीछे रह जायेंगे।विश्लेषक यह मान रहे हैं कि यदि वे 100 के आंकड़े तक भी पहुंच गये तो इस स्थिति में होंगे की सरकार बना लें। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे इस आंकड़े तक पहुंच पायेंगे।
पिछली बार लालू राबड़ी के 15 साल के शासन से त्रस्त जनता ने नीतीश को झोली भरकर वोट दिया था लेकिन इस बार परिस्थितियां ऐसी नहीं है। इस बार नीतीश को राजपूत, ब्राह्मण ,भूमिहार और कोयरी का पूरा समर्थन नहीं मिल रहा है। हां छोटी जातियों में उनकी पकड़ मजबूत जरूर है।
इसलिए जातिगत समीकरण में उन्हे कोई ज्यादा बढत नहीं है लेकिन इमेज एवं अन्य मुद्दों में वे अपने विरोधियों से कोसो आगे हैं। बिहार ने सड़क निर्माण और कानून व्यवस्था के क्षेत्र में बेहतर विकास किया है,स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर करने की ठोस पहल की गई है । बिहार ने बड़े निवेशकों को अपने यहां बुलाने की हरसंभव कोशिश की है लेकिन यह औऱ बात है कि इसमें उसे सफलता नहीं मिली है।
यह देखना अब बेहद दिलचस्प होगा कि क्या जातिगत उन्माद को विकास का मुद्दा हरा पाता है । ऐसा नहीं है कि जातिय समीकरण केवल बिहारी समाज में ही व्याप्त है देश के अन्य हिस्सों में भी चुनवों में जाति महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
यादव -मुस्लिम बहुल, उत्तर-पूर्वी बिहार में होने वाले पहले चरण के मतदान के पहले कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे पार्टी जातिगत समीकरणों को तोड़ती है। नीतीश किसी तरह मुकाबले को एकतरफा बनाना चाहते हैं जबकी लालू अपनी वर्तमान राजनीतिक हालात को ध्यान में रखते हुए त्रिकोणीय रूप देना चाहते हैं।
लालू अच्छी तरह जानते हैं कि विकास औऱ नीतगत मुद्दों पर वे नीतीश से पार नहीं पा सकते। इसलिए कांग्रेस की एंट्री का स्वागत कर रहे हैं लेकिन जिस तेवर औऱ आक्रमकता के साथ के साथ कांग्रेस आगे बढ रही है उससे इस बात की संभावना बढी है कि मुस्लिम के साथ कहीं यादव वोटरों में भी कांग्रेस सेंधमारी न कर दे।लालू एक हद तो चाहेंगे की कांग्रेस कुछ अल्पसंख्यक वोट पा ले ताकि वे वोटर नीतीश के पाले में न जाये । लेकिन इस संभावना ने लालू की नींद खराब कर दी है कहीं कांग्रेस ने सेंधमारी ज्यादा कर दी तो फिर अन्य चरणों के लिए उनकी हवा खराब हो जायगी।
पहला चरण कहानी स्पष्ट कर देगा।यदि कांग्रेस अल्पसंख्यकों में सेंध लगाने में सफल हो गई तो उसे इसका फायदा अन्य चरणों मे होगा।ऐसे में यह संभव है कि सवर्णों का वोट भी उसे मिले ।और अगर ऐसा हुआ तो इसका ज्यादा फायदा लालू को होगा।लेकन यदि कांग्रेस ऐसा करने में सफल नहीं हो पाई और अल्पसंख्यक वोट नीतीश के पाले में गया तो फिर लालू के लिए आगे की डगर बहुत मुश्किल होगी।
कांग्रेस और नीतीश इस बात को अच्छी तरह समझ रहें हैं।और लालू से बेहतर इसे कौन समझ सकता है। उन्हें तो जातिगत समीकरण को भांपने में पीएचडी हासिल है।इसी संभावना के तहत कांग्रेस ने पहले चरण के पहले हीं अपने सारे हॉट गन्स इस्तेमाल कर लिए हैं।मनमोहन सिंह , सोनिया गांधी , राहुल गांधी सबने खम ठोक दिया है। अब गेद जनता के पाले में है ।
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