जब आप सा कोई आता है तो हमारी बेचारगी और बढ जाती है मिस्टर ओबामा!
दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति कुछ ही दिनों में भारत के दौरे पर आयेंगे । भारत में तैयारियां काफी जोर-शोर से की जा रही हैं। भारतीय और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी एक दूसरे से मिलकर ओबामा के दौरे को ऐतिहासिक बनाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं।
जिस दिन ओबामा मुंबई या दिल्ली में होंगे इन दोनों शहरों को छावनी में तब्दील कर दिया जाएगा। मुंबई में जिस रूट से वे गुजरेंगे दुकाने बंद रहेंगी। भिखारियों को सड़कों से हटा दिया जाएगा। कर्फ्यू सा माहौल होगा। ताज होटल के सारे कमरे बुक कर दिये जाएंगे। ओबामा के साथ उनकी सुरक्षा के लिए एफबीआई के सात सौ सदस्य भी आयेंगे।
संसद भवन की सजावट में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है । ओबामा, संसद को संबोधित करने वाले हैं इसलिए उन्हें लगना चाहिए कि सबसे बड़े लोकतंत्र का संसद भवन कितना खुबसूरत है। शुक्र है कि सांसदों को चकाचक दिखने के लिए सरकार ने कोई ड्रेस कोड लागू नहीं किया है ।
ओबामा आ रहे हैं यही किसी राष्ट्रीय पर्व से कम है क्या ? मनमोहन सिंह को अमेरिकी राष्ट्रपति ने पहला राजकीय अतिथि बनाया था उस एहसान का बदला चुकाने का वक्त आ गया है।
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े पूंजीवादी देश के कदमों में लोटने के लिए बेचैन है।
ओबामा अपने प्रिय नेता महात्मा गांधी की समाधी पर फूल चढाने राजघाट भी जायेंगे। अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि अमेरिकी स्निफ़र डॉग्स बापू की समाधी पर पहले से चढे फूलों को सुंघेंगे कि नहीं, जैसा कि जॉर्ज बुश के भारत दौरे के समय हुआ था।
ओबामा यदि भारत सरकार के पास यह फरमान भेजें कि सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनज़र जितने दिन वे भारत में रहेंगे उस दिन राष्ट्रीय छुट्टी घोषित कर दिया जाये,तो यकीन मानिए सरकार को हां करने में नैनो सेकंड का समय भी नहीं लगेगा।
आखिर, इस दमघोंटू स्वागत के बिना पर भारत, आबामा से क्या मांगना चाहता है ? वीजा मसले पर छुट चाहता है या एनपीटी पर बगैर हस्ताक्षर किये उच्च तकनीक पर लगे प्रतिबंध को हटवाना चाहता है या इस उम्मीद में है कि चीन की दादागिरी से अब सिर्फ अमेरिका ही उसे बचा सकता है?
खबर है कि अमृतसर नहीं आने से सिख समुदाय ओबामा से नाराज है और अब मांग कर रहा है कि यदि अमृसर नहीं जा सकते तो दिल्ली के ही किसी गुरूद्वारे में चलें जायें। ओबामा के अमृतसर जाने, न जाने से देश के सेहत पर क्या असर पड़ने वाला है?
भारत अब चीन के सामने सीना चौड़ा करने के लिए भी अमेरिकी प्रशासन की तरफ टकटकी लगाये हुए है।
दक्षिण एशिया में भारत अपनी स्थिति समझ रहा है । भारत यह भी जानता है कि चीन के विरूद्ध अमेरिका उसे इस्तेमाल करना चाहता है। लेकिन रीढ़विहीन भारतीय प्रशासन में इतनी हिम्मत कहां है कि वह पाकिस्तान के खिलाफ वह अमेरिका का इस्तेमाल कर सके।
अभी भारत इस स्थिति में है कि आतंकवाद और अन्य आर्थिक मसले पर विशेष कूटनीति का प्रयोग कर वह अमेरीका से अपनी बात मनवा सकता है। लेकिन ,जो सरकार, पाकिस्तान के साथ मिलकर डबल गेम खेल रहे अमेरिकियों को फटकार तक नहीं लगा सकती वह नए समीकरण का इस्तेमाल क्या करेगी?
आठ –नौ फिसदी के विकास दर का झुनझुना लेकर दुनिया भर का भ्रमण कर रहे भारतीय प्रतिनिधी सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट की दक्षिणा मांग रहे हैं। क्या इससे कभी स्थायी सीट का जुगा़ड़ संभव है ? भारत यह जानबूझकर नहीं समझना चाहता कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलने में सबसे बड़ी बाधा अमेरिका ही है। जब कभी अमेरिका भारत को चीन के साथ विश्व की उभरती महाशक्ति का खिताब देता है, गदगद भारत को इस बात का भी होश नहीं रहता कि वह अपने हितों का भी ख्याल रखे।
भारतीय नेताओं की तरह ओबामा भी बयान बहादुर हो गये हैं। ऐसा अब उनके ही देश वाले मानते हैं। गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे अमेरिका के लिए भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार है। नए परिदृश्य में भारत से ज्यादा अमेरिका को भारत की जरूरत है। अपनी शक्ति को पहचाने बगैर ओबामा के घुटने तक झुकने से भी भारत को कुछ नहीं मिलने वाला।
अपनी आवभगत में इतना खर्च करवा कर इस अमीर नेताओं के गरीब देश पर क्या एहसान करेंगे ओबामा ? जितना खर्च उनकी सुरक्षा पर हो चुका, उतने में कई शहर आबाद हो जाते।(सिर्फ एक उदाहरण, 150 करोड़ का अत्याधुनिक डिवाइस पार्लियामेंट में लगाया गया है इससे सांसदों से लेकर मंत्री तक को उससे गुजरना पड़ेगा)
भारत को जो देना था मनमोहन सिंह को बुलाकर वहीं दे देते या जो लेना था हुक्म कर देते!
हम भी आपकी सुरक्षा चाहते हैं मिस्टर ओबामा और यह भी चाहते हैं कि आप सुरक्षित आयें और सुरक्षित जायें । लेकिन आप भारत से भी ज्यादा असुरक्षित देश की यात्रा कर चुके हैं और कोई हो हल्ला नहीं हुआ। लेकिन गुलाम मानसिकता से ग्रसित इस देश में जब भी कोई आप सा आता है तो आम आदमी की बेचारगी और बढ जाती है।
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